पं. किसन लाल शर्मा
न्ब्ञश्आजह््डिन्ता ज्ल्ड्ब्ति | त्लंकाधिपति रावण के रहस्थ-चमत्कार भरे जीवनवृत्त के साथ ही शिवोपासना लव खिशिनन तंत्र साधनाओं की जानकारी
वह राक्षस था--रक्ष संस्कृति का रक्षक...विश्व को जीतना चाहता था वह! देव उसके बंदी थे, उसने अपने जिन बल से तीनों लोकों पर विजय पा ली थी। वह परम विद्दान था...ज्ञाता था अंग-उपांगों चारों वेदों का। फिर भी दुष्कर्मों में प्रवृत्त हुआ। अभिमान ने भटका दिया उसे या फिर जब विजय की मूर्च्छा टूटी तब तक काफी आगे बढ़ चुका था वह-- पीछे जाना असंभव था।
राम के हाथों मृत्यु को वरण किया--यह समझदारी थी उसकी।
शस्त्र-शास्त्र ज्ञाता लंकाधिपति रावण के जीवन में उतार-चढ़ाव की अनूठी गाथा है इस ग्रंथ में।
शिवोपासक दशकंधर, अजेय, राक्षसराज, महान योद्धा, वेदांतविग्रह, लंकाधिपति, शासक, देव-मुनि विरोधी, मायावी, तंत्र-मंत्र के परम ज्ञाता, औषध विज्ञान के रहस्यों के जानकार, दैवज्ञ रावण के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं की झलक।
सरल- के भाषा में संग्रह करने एक प्राचीन ग्रंथ
ड़ सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन
प्रकाशक :
मनोज पब्लिकेशन्स
76, मेन रोड, बुराड़ी, दिल्ली-]0084
फोन : 2764446, 276व349, 276546 मोबाइल : 986842494
ईमेल : #70(9॥73॥0]|2५/॥८०8४0॥5.007 (707 07॥76 5॥0[|0770 ४५ 0७। ५४४/०5॥४७) वेबसाइट ;: ४४४४४४.३३॥०]|0५७७०॥|॥८०8075.८0॥77
शोरूम :
मनोज पब्लिकेशन्स
।583-84, दरीबा कलां, चांदनी चौक, दिल्ली-0006
फोन : 23262474, 2326826, मोबाइल : 988753569
जा कॉपीराइट एक्ट के अंतर्गत इस पुस्तक की सामग्री तथा रेखाचित्रों के अधिकार “मनोज पब्लिकेशन्स, 76, मेन रोड, बुराड़ी, दिल््ली-84” के पास सुरक्षित हैं, इसलिए कोई भी सज्जन इस पुस्तक का नाम, टाइटल-डिजाइन, अंदर का मैटर व चित्र आदि आंशिक या पूर्ण रूप से तोड़-मरोड़कर एवं किसी भी भाषा में छापने व प्रकाशित करने का साहस न करें, अन्यथा कानूनी तौर पर हर्जे-खर्चे व हानि के जिम्मेदार वे स्वयं होंगे।
चेतावनी: पुस्तक में दी गई सामग्री का उद्देश्य आपको विषय की जानकारी देना मात्र है। इसमें दी गई साधनाओं व औषधि संबंधी जानकारी को हमने प्रामाणिक प्राचीन स्रोतों से लिया है। हमने प्रयास किया है कि कोई त्रुटि न हो, फिर भी इसे नकारा नहीं जा सकता। इसलिए इन साधनाओं और औषधियों के निर्माण में किसी अनुभवी साधक व वैद्य का परामर्श जरूर लें। किसी भी तरह की हानि के लिए लेखक, प्रकाशक किसी तरह से उत्तरदायी नहीं होंगे।
किसी भी प्रकार के वाद-विवाद का न्यायक्षेत्र दिल्ली ही रहेगा।
|5५8॥0 : ०978-8-833-050-5 नौवां संस्करण : 207
रावण संहिता : पं. किसनलाल शर्मा
राबणसंहिता
शस्त्र- शास्त्रज्ञ, मायावी दशानन के जीवन चारित के साथ शिवोपासना, उड़्ीश-क्रियोड्रीश तंत्र, अर्क प्रकाश कुमार तंत्र एवं ज्योतिष संबंधी कुछ विशेष योय
हू. |/ दिया, + «| ]
ज्योतिष महामहोपाध्याय पंडित किसनलाल शर्मा
प्रनोज पब्लिकेशन्स
पुस्तक के बारे में
“काले और सफेद तानों-बानों से बुनी होती जिंदगी की चादर,” यह बात जिसने भी कही है, साधारण-सी लगने पर भी गुहय दार्शनिक रहस्यों पर आधारित है। मनुष्य शरीर का मिलना गवाह है इस बात का कि पुण्य भी हैं और पाप भी।
लंकापति रावण की जन्मकण्डली |
रावण ऋषि पुत्र था। वह पुलस्त्य का पोता था और विश्रवा का पुत्र। उसकी मां राक्षसराज सुमाली की बेटी थी। राक्षस गुह् विद्याओं के जानकार थे। वे जानते थे कि ऋषि वीर्य को किस विशिष्ट काल में धारण कराने पर राक्षसों के हितों का साधक जन्म लेगा। उसी समय कैकसी ने विश्रवा से प्रणय-याचना की थी। रावण और कुंभकर्ण का जन्म राक्षसों की हित-रक्षा के लिए राक्षस प्रमुखों द्वारा करवाया गया था; ऐसा कहना गलत न होगा।
तप और अहं का सम्मिश्रण था राक्षसों में। रावण भी इससे अछूता कैसे रह सकता था। अपने जीवन में उसने सिर्फ विजय को ही याद रखा, हार को तो उसने दुःस्वप्न की तरह भूलने की ही कोशिश की।
शास्त्रों का परम ज्ञाता था रावण, फिर क्या विष्णु के रामरूप में अवतार लेने की बात उससे छिपी थी? विद्वानों का ऐसा मत है कि इस बात को जानते हुए ही रावण ने राम से विरोध किया। सा शरीर की विवशता थी, इसीलिए अपमानित करके उसने विभीषण को राम के पास भेज
या।
अपनी गलतियों को जानते हुए भी उन्हें अस्वीकारना रावण की विवशता थी--देवताओं से समझौता उस जाति के हित और सम्मान की रक्षा नहीं करता था; जिसमें उसका जन्म हुआ था, 8 विजय अभियान का नेतृत्व उसके हाथों में था। योद्धा को भी तो योगी की गति प्राप्त
|
प्रकाश भेद डालता है, घने अंधकार को। यह सिद्धांत अनुभव सिद्ध है, लेकिन इतिहास की इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि बुराई ने सदा ही अच्छाई को ढका है। “पाप से घृणा करो, पापी से नहीं,” ऐसा कहने के बाद भी क्या हम ऐसा कर पाते हैं? शायद नहीं! तभी तो रावण की तमोगुणी राक्षसी वृत्तियों की कालिमा ने उसके उजले पक्ष को ढक दिया। इस ग्रंथ में शस्त्र-शास्त्र ज्ञाता महाबली रावण के उसी उजले पक्ष को उजागर किया गया है।
यह ग्रंथ पांच खंडों में विभाजित है। प्रथम खंड में है रावण का संपूर्ण जीवन वृत्त। इसे मूल संस्कृत के साथ सरल हिंदी में दिया गया है। मूल को जहां से उद्धृत किया गया है, उसके अनुसार यह अंश वाल्मीकीय रामायण का अंश है। मूल का परित्याग हमने इसलिए नहीं किया ताकि संस्कृत भाषा का साहित्यिक आनंद भी पाठक ले सकें। दूसरे खंड में उन साधनाओं की चर्चा है, जो शिवोपासना से संबंधित हैं। प्रणव व पंचाक्षर साधना के साथ ही इसमें लिंग स्थापना और शिवपूजन की शास्त्रीय विधियां दी गई हैं। तीसरे खंड में तंत्र-मंत्र साधनाओं के रहस्यों को उजागर किया गया है। तंत्र का एक भाग है वनस्पतियों के चमत्कारी प्रयोग। तंत्र का यह भाग आयुर्वेद से संबंधित होता हुआ भी उससे बिलकुल भित्न है। रावण तंत्र का ज्ञाता था। वह जानता था कि यदि बच्चे स्वस्थ एवं नीरोग नहीं होंगे, तो कोई भी समाज सशक्त नहीं होगा। इसीलिए उसने जहां स्वस्थ, रोगमुक्त तथा दीर्घायु बनाने वाले अंकोँ की चर्चा की, वहीं नवजात शिशुओं व उनकी माताओं के स्वास्थ्य के भी नुस्खे दिए। योद्धा के लिए औषधि ज्ञान जरूरी है, रावण उसका भी परम ज्ञाता था। इस ग्रंथ के चतुर्थ खंड से उसके इसी औषधि संबंधी ज्ञान का संकेत मिलता है। पंचम खंड में ज्योतिष के विशेष योगों की चर्चा है। इस खंड में ऐसी सामग्री का समावेश नहीं किया गया है, जो “भृगु संहिता' जैसे ग्रंथों में प्राप्त हैं। विदित हो कि बाजार में उपलब्ध “लाल किताब” का संबंध भी रावण से ही है। इस पुस्तक में ज्योतिष, हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र का समावेश है। यदि आपकी रुचि ज्योतिष में है, तो यह पुस्तक आपके लिए उपयोगी है--इसमें नयापन है।
सटीक और उपलब्ध पूर्ण जानकारी देना हमारा उद्देश्य है। इस कसौटी पर यह ग्रंथ खरा उतरे, यही हमारा प्रयास रहा है। हम कहां चूके हैं, इसकी जानकारी का स्वागत है। संशोधित संस्करण में अवश्य सुधार किया जाएगा।
उचित मूल्य और उच्चतम गुणवत्ता में इसे प्रकाशित करने के लिए श्री सावन गुप्ता को साधुवाद! आशीर्वाद!
“वेद विद्या भवन' --पंडित किसनलाल शर्मा 4484, शुक्रवार पेठ,
पुणे-400002
दूरभाष : 447/266, 530960
विषय सूची
रावण चरित
[] रावण का कुल (] दादा महर्षि पुलस्त्य [] सौतेले भाई वैश्रवण [_] वैश्रवण का लंका वास [] असुरों की उत्पत्ति [] राक्षसियों को वरदान [] लंकानगरी [] असुरों द्वारा उत्पीड़न [] राक्षसों का विनाश [(] युद्ध का तांडव [] राक्षस सेना क्षुब्ध हुई [] विष्णु द्वारा वज्र प्रहार [] सुदर्शन चक्र का कमाल [] राक्षसों का नाश [] पाताल लोक को पलायन [] धनाध्यक्ष कुबेर [] दशग्रीव का जन्म ([] कुम्भकर्ण द्वारा घोर तप [] रावण को कई वरदान [] कुम्भकर्ण का दुःखी होना [] दशानन का संदेश [] लंका से प्रस्थान [] रावण का राजतिलक (] रावण का विवाह (] कुम्भकर्ण निद्रा में अभिभूत [] धर्मपालन की शिक्षा [] घमंड में चूर दशानन (] यक्षों-असुरों में घमासान युद्ध [] रावण को उपदेश [] रावण की विजय ([] क़ुद्ध रावण [] रावण द्वारा शिव स्तुति [] वेदवती द्वारा आत्मदाह [] सीताजी का अवतरण []] राजा मरुत पराजित [] रावण अयोध्या में [] रावण को शाप [] नारद के वचन [] रावण का यमलोक पर आक्रमण [] रावण पर वाण वर्षा [] यमराज का क्रोधित होना (] ब्रह्माजी का हस्तक्षेप [] कवच दैत्यों से मित्रता (] वरुण-पुत्रों से संघर्ष [] रावण द्वारा दुराचार [] साध्वी स्त्रियों द्वारा रावण को शाप [] मेघनाद का यज्ञ अनुष्ठान [] कुम्भीनसी का अपहरण [] रावण मधुपुरी पहुंचा [] रम्भा से यौन समागम [] नलकूबर ने भी रावण को शाप दिया [] इंद्र लोक पर चढ़ाई [] तुमुल युद्ध आरम्भ [] सावित्र युद्ध में कूदे [] इंद्र-पुत्र जयंत ने मोर्चा संभाला [] मेघनाद की माया [] रुद्रों से युद्ध (] इंद्र- रावण में जबरदस्त टक्कर [_] इंद्र का अपहरण ([] ब्रह्माजी ने रावण को समझाया []] इंद्र का पूर्वकालीन दुष्कृत्य (] अहल्या का स्पष्टीकरण [] रावण माहिष्मती पुरी पहुंचा (| नर्मदा में स्नान [] शिवलिंग की पूजा [] सहस्र भुजाधारी राजा अर्जुन [] अर्जुन के योद्धाओं से संघर्ष [] राजा अर्जुन का राक्षसों पर कहर [] रावण का बंदी बनना [] दशानन की रिहाई का अनुरोध [] वानरराज बालि को ललकारा [_] रावण शिकंजे में [] बालि से मित्रता [.)] अपहृत सीताजी की खोज [_] रावण, कुंभकर्ण एवं मेघनाद का अंत
हे ह + ऋ< न न (9: 62220
४ हल थ् भर २३२ 5 )
शिव उपासना
[] पंचाक्षर मंत्र एवं पंचावरण पूजन [] शिवयोगी के प्रकार [] शिवज्ञान का प्राकट्य [] शिवभक्तों के पूजन की महत्ता [] षडध्वशोधन विधि []] योग विवेचन (] श्रीशिवपंचाक्षर स्तोत्रम् [] शिवताण्डव स्तोत्रम् [] द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम् [] बारह ज्योतिर्लिंगों का परिचय [] शिव- लीला
तृतीय खंड
तंत्र-मंत्र साधना
[] तंत्र एक समग्र साधना (] तंत्र में भक्ति तत्त्व [] शुद्ध सत्व भाव [] भेद और अभेदवादी तांत्रिक दृष्टियां [] तंत्र की वैज्ञानिक प्रामाणिकता [] तंत्र और योग [] शिव साधना की विशिष्ट पद्धति []] मंत्र जप साधन []] विभिन्न मुद्राएं [] उपासना रहस्यम् [] विभिन्न सिद्धियों का स्वरूप [] तांत्रिक साधना विविध सोपान
[] उड्डीश तंत्र (पूर्वार्द्ध) [] प्रायोगिक षटकर्म
[] उड्डीश तंत्र (उत्तरार्द्ध)
क्रियोड्डीश तंत्र --प्रथम: पटल: द्वितीय: पटल:, तृतीय: पटल:, चतुर्थ: पटलः:, पंचम: पटल:, षष्ठम: पटल:, सप्तम: पटल:, अष्टम: पटल:, नवमः: पटल:, दशम: पटल:, एकादश: पटल:, द्वादश: पटल:, त्रयोदश: पटल:, चतुर्दशः पटल:, पंचदश: पटल:, षोडश: पटल:, सप्तदश: पटल:, एकोनविंशतितम: पटल: (]] देवी-साधना मंत्र
अर्क चिकित्सा
[] अ्थार्कप्रकाशे प्रथमं शतकम् [] अथार्कप्रकाशे द्वितीयं शतकम् [] अशथार्कप्रकाशे तृतीयं शतकम् [] अथार्कप्रकाशे चतुर्थ शतकम् [] अथार्कप्रकाशे पंचमं शतकं [] अथार्कप्रकाशे षष्ठमं शतकम् [] अथार्कप्रकाशे सप्तमं शतकम् [] अथार्कप्रकाशे अष्टमं शतकम् [] अथार्कप्रकाशे नवमं शतकम् [] अथार्कप्रकाशे दशमं शतकम्
[] कुमार तंत्र पंचम खंड ज्योतिष योग
[] नक्षत्र एवं राशियां [] ग्रह एवं उनकी प्रकृति [] लग्न [] फल-विचार, समयावधि और महादशा ([] ग्रहों की महादशाओं के सामान्य फल (] विभिन्न ग्रहों के योग
का खंड रावण चरित
रावण जीवनवृत्त
स खण्ड में सबसे पहले लंकाधिपति रावण के परिवारजन, पूर्वजों, उनके स्वयं के जन्म तथा
जीवनवृत्त का उल्लेख किया गया है। दशरथ पुत्र रामचन्द्र ने रावण के जीवनवृत्त के बारे में महर्षि अगस्त्य से प्रश्न किया था, तब अगस्त्य जी ने उन्हें जो उत्तर दिया था, उसी को यहां पर प्रस्तुत किया जा रहा है--
रावण का कुल
अगस्त्य उवाच-- शृणु राम तथा वृत्तं तस्य तेजाबलं महत् । जघान् शत्रून् येनासौ न च वध्य: सशत्रुभि: ।।।। अगस्त्य जी ने कहा-- हे राम! इन्द्रजीत (मेघनाद) के महान बल-साहस का तेज सुनो, जिसके द्वारा वह अपने शत्रुओं को मार गिराता था और कोई शत्रु उसे नहीं मार पाता था। तावत् ते रावणस्येदं कुल जन्म च राघव | वरप्रदानं च तथा तस्मै दत्तं ब्रवीमि ते ।।2।। है राघव! इसका पूर्ण वर्णन करने से पहले मैं आपको रावण के कुल और वर-प्राप्ति के संबंध में बताता हूं।
दादा महर्षि पुलस्त्य
पुरा कृतयुगे राम प्रजापति सुतः प्रभु: । पुलस्त्यो नाम ब्रह्मर्षि: साक्षादिव पितामह: ।।3।। हे राम! प्राचीन समय में सतयुग में प्रजापति ब्रह्माजी के एक पुत्र “पुलस्त्य' थे। वह ब्रह्मर्षि पुलस्त्य ब्रह्माजी के समान ही तेजस्वी और शूरवीर थे। नानुकीर्त्या गुणास्तस्य धर्मतः शीलतस्तथः । प्रजापते: पुत्र इति वक्तुं शक््यं हि नामतः ।॥4।। उनके गुण, शील और धर्म का पूर्ण वर्णन करना संभव नहीं लगता। उनके विषय में केवल इतना कहना ही पूर्ण है कि वह प्रजापति ब्रह्माजी के पुत्र थे। प्रजापति सुतत्वेन देवानां वललभो हि सः । इष्ट: सर्वस्य लोकस्य गुणैशुश्रेमहामति: ।।5।। वह प्रजापति ब्रह्माजी के पुत्र होने के कारण सभी देवताओं के प्रिय थे। वह गुणवान, बुद्धिमान, सर्वप्रिय तथा श्रेष्ठ थे।
सतु धर्म प्रसंगेन मेरो: पार्श्व महागिरे: । तृणाबिद्धाश्रमं गत्वाप्यवसन्मुनिपुड़वः ।॥6।। एक बार वह धार्मिक यात्रा के लिए महागिरि सुमेरु पर्वत के पास राजर्षि तृणविन्दु के आश्रम में गए और वहीं पर रहने लगे। तपस्तेपे स धर्मात्मा स्वाध्याय नियतेन्द्रिय: । गत्वा55श्रमपदं तस्य विष्नं कुर्वन्ति कन्यका: ।।॥7।। वह दानवीर-धर्मात्मा तपस्या करते हुए, स्वाध्याय और जितेंद्रिय में संलग्न रहते थे। परन्तु कुछ कन्याएं उनके आश्रम में पहुंच कर उनकी तपस्या में विघ्न पैदा करती थीं। ऋषि पन्नगकन्याश्च राजर्वितनयाश्न या: । क्रीडन्त्योप्सरसश्वैव तं देशमुपपेदिरे ।।8।। राजर्षियों, नागों और ऋषियों की कन्याएं तथा कुछ अन्य अप्सराएं भी खेल-खिलाव करती हुईं उनके आश्रम के क्षेत्र में प्रवेश कर जाती थीं। सर्वर्तुषूपभोग्यत्वाद् रम्यत्वात् काननस्य च । नित्यशस्तास्तु त॑ देशंगत्वा क्रीडन्ति कन्यका: ।।9।। सभी ऋतुओं में यह वन रमणीय तथा सेवनीय था। अतः वे सभी कन्याएं हर रोज वहां जाकर भिन्न-भिन्न प्रकार की क्रीड़ाएं करती थीं। देशस्य रमणीयत्वात् पुलस्त्यो यत्र स द्विज: । गायन्त्यो वादयन्त्यश्व लासयन्त्यस्तथैव च ।।0।। जिस स्थान पर ब्राह्मण श्रेष्ठ पुलस्त्यजी रहते थे, वह तो अत्यधिक रमणीय था। अतः सभी कन्याएं उस स्थान पर पहुंच कर प्रतिदिन नृत्य, गायन, वादन करती थीं। मुनेस्तपस्विनस्तस्य विषघ्नं चक्कुरनिन्दिता: । अथ रुष्टो महातेजा व्याजहार महामुनि: ।।॥। अपनी इन विभिन्न गतिविधियों द्वारा वे सभी कन्याएं मुनि के तप में बाधा एवं विध्न पैदा करती थीं। इस कारण ही एक दिन महामुनि महातेजस्वी कुछ क्रोधित हो उठे। यामे दर्शनमागच्छेत् सागर्भ धारयिष्यति । तास्तु सर्वा: प्रतिश्रुत्य तस्य वाक््यं महात्मन: ।।2॥।। अतः उन्होंने यह घोषणा कर दी कि कल से मुझे इस स्थान पर जो कन्या दिखाई पड़ेगी, वह गर्भवती हो जाएगी। उनके इस वाक्य को सुनकर वे सभी कन्याएं भयभीत हो गईं। ब्रह्मशापभयाद् भीतास्तं देशं नोपचक्रमु: । तृण बिन्दोस्तु राजर्षेस्तनया न शूणोति तत् ।॥3॥। उस ब्रह्मशाप के भय से डरकर उन्होंने उस आश्रम क्षेत्र में जाना छोड़ दिया। किन्तु राजर्षि तृणविन्दु की कन्या ने ऋषि के इस शाप को नहीं सुना था। गत्वा55श्रमपदं तत्र विचचार सुनिर्भया । ना चापश्यच्च सा तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम् ।।4।। वह कन्या अगले दिन भी बिना किसी भय के उस आश्रम में जाकर विचरण करने लगी।
उसने देखा कि वहां उसकी कोई भी अन्य सखी नहीं है। तस्मिन् काले महातेजाः प्राजापत्यो महानृषि: । स्वाध्यायमकरोत् तत्र तपसा भावितः स्वयम् ।।5।। उस समय वहां प्रजापति के पुत्र महातेजस्वी महान् ऋषि पुलस्त्यजी अपनी तपस्या में संलग्न होकर वेदों का स्वाध्याय कर रहे थे। सातु वेदश्रुतिं श्रुत्वा दृष्टवा वै तपसो निधिम् | अभवत् पाण्डुदेहा सा सुव्यंजित शरीरजा ।।6।। उनकी वेदों की आवाज सुनकर वह उसी ओर चली गई और वहां उसने तपोनिधि मुनिजी का दा । महर्षि पुलस्त्यजी को देखते ही उस कन्या का शरीर पीला पड़ गया और वह गर्भवती गई। वभूव च समुद्रिग्ना दृष्टवा तद्दोषमात्मतः । इदं मे किंखििति ज्ञात्वा पितुर्गत्वा55श्रमे स्थिता ।7।। उस भयंकर दोष को अपने शरीर में देखकर वह राजकन्या घबरा गई। तदुपरान्त वह यह सोचती हुई कि मुझे यह क्या हो गया है, अपने पिता के आश्रम में जा पहुंची। तांतु दृष्टवा तथाभूतां तृणबिन्दुरथाब्रवीत् | किं त्वमेतत्वसदृशं धारयस्यात्मनो वपु: ।।8॥। कन्या की स्थिति को देखकर तृणविन्दु ने पूछा--तुम्हारे शरीर की यह दशा कैसे हो गई? सा तु कृत्वाञ्जलिं दीना कन्योवाच तपोधनम् | न जाने कारण तात् येन मे रूपमीदृशम् ।।9।। उस समय उस दीनभावापन्न कन्या ने अपने तपस्वी पिता से हाथ जोड़कर कहा--हे तात! मैं उस वजह को नहीं जानती जिसके कारण मेरा शरीर ऐसा हो गया है। किं तु पूर्व गतास्म्येका महर्षेर्भावितात्मन: । पुलस्त्यस्याश्रमं दिव्यमन्वेष्टं स््वसखीजनम् ।।20।। कुछ समय पहले अपनी सखिवयों को ढूंढ़ती हुई मैं महर्षि पुलस्त्य के आश्रम में गई थी। न च पश्याम्यहं तत्र कांचिदभ्यागतां सखीम् । रूपम्य तु विपर्यासं दृष्टवा त्रासादिहागता ।।24॥। परन्तु वहां पर मैंने अपनी किसी भी सहेली को नहीं पाया। उस समय ही मेरा शरीर ऐसा विकृत हो गया। यह देखकर मैं भय के कारण यहां चली आई हूं। तृणबिन्दुस्तु राजर्षिस्तपसा द्योतितप्रभ: । ध्यानं विवेश तच्चापि अपश्यदृषिकर्मजम् ।।22।। राजर्षि तृणविन्दु अपनी घोर तपस्या के कारण स्वयं प्रकाशित थे। जब उन्होंने अन्तर ध्यान होकर देखा तो उन्हें यह ज्ञात हुआ कि यह सब कुछ ऋषि पुलस्त्य के कारण हुआ है। सतु विज्ञाय तं शापं महर्षेर्भावितात्मन: । गृहीत्वा तनयां गत्वा पुलस्त्यमिदमब्रवीत् ।।23।। महर्षि के शाप को जानने के बाद वे अपनी पुत्री के साथ महामुनि पुलस्त्यजी के आश्रम में
जा पहुंचे और उनसे कहने लगे। भगवंस्तनयां मे त्वं गुणै: स्वैरेव भूषिताम् । भिक्षां प्रतिगृहाणेमां महर्षे स्वयमुद्यताम् ।।24।। हे भगवान! यह मेरी पुत्री अपने गुणों से विभूषित है। हे महर्षि! इसे आप स्वयं अपने आप प्राप्त होने वाली भिक्षा के रूप में ग्रहण कर लें तपश्चरणयुक्तस्य श्राम्यमाणेन्द्रियस्य ते । शुश्रूषणपरा नित्यं भविष्यति न संशय: ।।25।। आप तपस्या तथा आराधना करने के कारण थकान का अनुभव करते होंगे। यह आपकी सेवा में संलग्न रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। तंब्रुवाणं तु तद् वाक््यं राजषिं धार्मिक तदा । जिघृक्षुरत्रवीत् कन्यां बाढमित्येव स द्विज: ।।26।। धर्मात्मा राजर्षि के इस कथन पर, ब्रह्मर्षि पुलस्त्यजी ने उस कन्या को ग्रहण करने की इच्छा प्रकट करते हुए कहा--बहुत अच्छा। दत्वा तु तनयां राजा स्वमाश्रमपदं गत: । सापि तत्रावसत् कन्या तोषयन्ती पतिं गुणै: ।।27।। उस समय राजर्षि तृणविन्दु अपनी कन्या को महर्षि को सौंपकर अपने आश्रम लौट पड़े। उसके बाद वह कन्या अपने गुणों और बुद्धि की सहायता से अपने पति को संतुष्ट रखने का प्रयास करती हुई वहां रहने लगी। तस्यास्तु शीलवृत्ताभ्यां तुतोष मुनिपुड़वः । प्रीत: स तु महातेजा वाक्यमेतदुवाच ह ।॥28।। उस कन्या ने अपने सदाचरण और शील व्यवहार से मुनिश्रेष्ठ को संतुष्ट कर दिया। उसके कारण एक दिन महातेजस्वी मुनिवर पुलस्त्य ने प्रसन्न होकर उससे कहा। परितुष्टोडस्मिसुश्रोणि गुणानां सम्पदा भृशम् । तस्माद् देवि ददाम्यद्यपुत्रमात्मसमं तव ।।29।। हे सुन्दरी! मैं तुम्हारे गुणों और व्यवहार के संपत्ति रूपी भण्डार से बहुत प्रसन्न हूं, अतः हे देवी! मैं तुम्हें अब एक ऐसा पुत्र प्रदान करूंगा जो ठीक मेरे जैसा ही होगा। उभयोर्व॑शकर्तारं पौलस्त्य इति विश्रुतम् । यस्मात् तु विश्लुतो वेदस्त्वयेहाध्यतो मम ।।30॥। माता-पिता दोनों के कुलों की प्रतिष्ठा को बढ़ावा देने वाला वह बालक “पौलस्त्य” के नाम से प्रसिद्ध होगा। जब मैं वेद-पाठ कर रहा था, उस समय विशेष रूप से तुमने उसे श्रवण किया था। तस्मात् सविश्रवा नाम भविष्यति न संशय: । एवमुक्ता तु सा देवी प्रहृष्टेनान््तरात्मना ।।3॥। अतः उस बालक का नाम 'विश्रवा' होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। महर्षि के यह कहने पर वह देवी अत्यन्त प्रसन्न हुई। अचिरेणैव कालेनासूत विश्रवसं सुतम् | त्रिपु लोकेषु विख्यातं यशोधर्मसमन्वितम् ।।32॥।।
कुछ समय के बाद उस देवी ने विश्रवा नामक पुत्र को जन्म दिया जो धर्म, यश एवं परोपकार से समन्वित होकर तीनों लोकों में अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ। श्रुतिमान् समदर्शी च व्रताचाररतस्तथा । पितेव तपसा युक्तो हाभवद् विश्रवा मुनि: ।।33।। “विश्रवा' नाम के यह मुनि वेदज्ञ, व्रत, आचारों और समदर्शी का पालन करने वाले ठीक अपने पिता के समान ही महान् तेजस्वी थे। अथ पुत्र: पुलस्त्यस्य विश्रवा मुनिपुड्रव: । अचिरेणैव कालेन पितवे तपसि स्थित: ।॥34॥। महर्षि पुलस्त्य के यह पुत्र मुनिश्रेष्ठ विश्रवा कुछ ही वर्ष बाद पिता की भांति तपस्या करने में संलग्न हो गए सत्यवान् शीलवान् दान्तः स्वाध्यायनिरतः शुचि: । सर्वभोगेष्वसंसक्तो नित्यधर्मपरायण: ।।35।। वे सत्यवादी, सदैव ही धर्म में तत्पर रहने वाले, स्वाध्यायी, पवित्र, परायण, जितेन्द्रिय एवं शीलवान् आदि सभी प्रकार के गुणों से संलिप्त थे। ज्ञात्वा तस्य तु तद् वृत्तं भरद्वाजो महामुनि: । ददौ विश्रवसे भार्या स्वसुतां देववर्णिनीम् ।।36।। महामुनि विश्रवा के इन महान गुणों तथा सदतवृत्तों के बारे में जानकारी पाकर महामुनि भारद्वाज ने देवाड़नाओं के समान अपनी सुन्दर कन्या का विवाह उनके साथ कर दिया। प्रतिगृह्मतु धर्मेण भरद्वाजसुतां तदा । प्रजान्वीक्षिकया बुद्धया श्रेयो ह्वास्य विचिन्तयन् ।।37।। मुनिश्रेष्ठ धर्मज्ञ विश्रवा ने महर्षि भारद्वाज की कन्या को प्रसन्नतापूर्वक तथा धर्मानुसार ग्रहण किया। फिर जन-प्रजा के हित-चिन्तन करने वाली बुद्धि द्वारा जन-कल्याण की कामना करते हुए मुदापरमया युक्तो विश्रवा मुनिपुड़व:ः । स तस्यां वीर्यसम्पन्नमपत्यं परमादभुतम् ।।38।। उन्होंने उस कन्या के गर्भ से एक पराक्रमी तथा अदभुत पुत्र उत्पन्न किया, जो उनके समान ही समस्त गुणों से सम्पन्न था।
सौतेले भाई वैश्रवण
जनयामास धर्मज्ञ: सर्वर्ब्रह्मगुणै्वतम् । तस्मिज्जाते तु संहृष्ट: स बभूव पितामह: ।।39।। उस बालक में सभी ब्राह्मणोचित्त गुण विद्यमान थे। बालक के जन्म से महर्षि पितामह पुलस्त्य मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए। दृष्टवा श्रेयस्करीं बुद्धि धनाध्यक्षो भविष्यति । नाम चास्याकरोतु प्रीतः सार्थ देवर्षिभिस्तदा ।40।।
उन्होंने अपनी तपस्याशक्ति द्वारा ध्यान करके देखा तो उनको ज्ञात हुआ कि यह बालक आगे चलकर धनाध्यक्ष होगा तथा कल्याणप्रद बुद्धि वाला होगा। इस बात को जानने के बाद महर्षि पुलस्त्य ने प्रसन्न होकर अन्य देवर्षियों के साथ मिलकर उस बालक का नामकरण कर दिया। यस्माद् विश्रवसो&5पत्यं सादृश्याद् विश्रवा इव । तस्माद् वैश्रवणो नाम भविष्यत्येष विश्रुत: |।4।। वे बोले कि मेरे पुत्र विश्रवा का यह पुत्र उसके गुणों के समान ही है, अतः यह “वैश्रवण” नाम से सुप्रसिद्ध होगा। सतु वैश्रवणस्तत्र तपोवनगतस्तदा | अवर्धताहुति हुतो महातेजा यथानल: ।42॥। इसके पश्चात् वैश्रवण (जो कुबेर नाम से प्रसिद्ध हुए) उस तपोवन में रहते हुए हवनकुण्ड में प्रज्यलित आग के समान महा तेजस्वी और तपस्वी के रूप में बढ़ने लगे। तस्याश्रमपदस्थस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मन: । चरिष्ये परमं धर्म धर्मो हि परमागति: ।।43।। आश्रम में रहते हुए महात्मा वैश्रवण के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि वे वहां उत्तम धर्म का आचरण करें, क्योंकि धर्म-कर्म का काम ही परमगति है। स तु वर्ष सहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने । पवित्रतो नियमैरुग्रैश्षकार सुमहत्तप: ।।44।। उन्होंने उस महावन में रहकर कठोर तपस्या करने का निश्चय किया तथा उन्होंने अत्यंत कठोर नियमों में बंधकर एक सहसख्र वर्षों तक कठोर-महान तपस्या की। पूर्णे वर्ष सहसख्रान्ते तं त विधिमकल्पयत् । जलाशी मारुताहारो निराहा स्तथैव च ।45॥।। एक वर्ष पूरा हो जाने पर वह तपस्या करने की नयी-नयी विधि का प्रयोग करते थे। वह केवल पानी पीकर ही रहते थे। बाद में केवल हवा को ही अपना भोजन बना लिया। अंत में उन्होंने बिना कुछ खाए-पिए घोर तपस्या की। एवं वर्ष सहस्नाणि जम्मुस्तान्येकवर्षवत् | अथ प्रीतो महातेजा: सेन्द्रै: सुरगणै: सह ।।46।। गत्वातस्याश्रमपदं ब्रह्मेदं वाक्यमब्रवीत् | परितुष्टो5स्मि ते वत्स कर्मणानेन सुव्रत ।॥47।। इस प्रकार उन्होंने अनेक वर्षों को एक वर्ष की भांति ही बिता दिया। उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर इन्द्र तथा अन्य देवताओं ने ब्रह्माजी के साथ उस आश्रम में पहुंचकर कहा--हे वत्स! तुम बहुत ही उत्तम धर्म का पालन कर रहे हो। मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूं। वरं वृणीष्व भद्रं ते वराईस्त्वं महामते । अथाब्रवीद वैश्रवण: पितामहमुपस्थितम् ।।48॥। हे महामने! तुम्हारा कल्याण हो। हे भद्र! तुम कोई वरदान मांगो, क्योंकि तुम इस वरदान के पात्र हो। यह सुनकर वैश्रवण ने अपने पास खड़े पितामह से कहा-- भगवंल्लोकपालत्वमिच्छेयं लोकरक्षणम् |
अथाब्रवीद् वैश्रवर्ण परितुष्टेन चेतसा ।।49॥। है भगवान्! मैं जनता की रक्षा करने के लिए उनका लोकपाल बनना चाहता हूं। वैश्रवण के मुंह से निकले इन शब्दों को सुनकर प्रजापति ब्रह्माजी का मन अत्यधिक प्रसन्न हो गया। ब्रह्मासुरगणै: सार्थ बाढमित्येव हृष्टवत् । अहं वै लोकपालानां चतुर्थ सृष्टमुद्यत: ॥50।। उस समय ब्रह्माजी ने देवताओं के साथ मिलकर कहा--बहुत अच्छा! मैं भी सृष्टि के चौथे लोकपाल की तैयारी में था। यमेन्द्रवरुणानां च पदं यत् तव चेप्सितम् । तदगच्छ वत धर्मज्ञ निधीशत्वमवाप्लुहि ।।5॥। जिस प्रकार यम, वरुण तथा इन्द्र को लोकपाल के पद प्राप्त हैं, उसी तरह का पद तुम्हें भी मिलेगा। तुम इस पद को स्वीकार करके निधियों के स्वामी या प्रतिनिधि बन जाओ। शक्राम्बुपयमानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि । एतच्च पुष्पक॑ नाम विमान सूर्यसंनिभम् ।॥52॥। प्रति गृहणीष्व यानार्थ त्रिदशै: समतां व्रज । स्वस्ति ते$स्तु गमिष्याम: सर्व एव यथागतम् ।॥53।। उन्होंने कहा--वरुण, यम तथा इन्द्र की तरह तुम चौथे लोकपाल होगे। सूर्य के समान यह जो तेजस्वी “पुष्पक” नाम का विमान है, इसे तुम अपनी सवारी के रूप में ग्रहण अर्थात् स्वीकार करो और देवताओं के समान बन जाओ। हे तात! तुम्हारा कल्याण हो। जिस प्रकार हम सब आए थे, अब उसी प्रकार जा रहे हैं। कृतकृत्या वयं तात दत्त्वा तव वरद्वयम् । इत्युक्त्वा स गतो ब्रह्मा स्वस्थानं त्रिदशै: सह ।॥54।। तुमको यह दो वरदान देकर हम अपने को कृत-कृत समझते हैं। इतना कुछ कहने के बाद प्रजापति ब्रह्माजी अन्य देवताओं को साथ लेकर देव लोक की ओर चल दिए। गतेषु ब्रह्म पूर्वेषु देवेष्व्ध नभस्तलम् । धनेश: पितरं प्राह प्राउजलि: प्रयतात्मवान् ।।55॥। भगवंल्लब्धवानस्मि वरमिष्टे पितामहात् | निवासनं न मे देवो विदधे स प्रजापति: ।।56।। ब्रह्माजी तथा अन्य देवताओं के चले जाने के बाद वैश्रवण ने अपने दोनों हाथों को जोड़कर अपने पिता से विनम्रतापूर्वक कहा--हे भगवान्! मैंने आज पितामह ब्रह्माजी से अभीष्ट वरदान प्राप्त किया है, लेकिन प्रजापति ब्रह्माजी ने मेरा कोई निवास स्थान नहीं बताया। तं पश्य भगवन् कंचिन्रिवासं साधु मे प्रभो । नच पीडा भवेद् यत्र प्राणिनो यस्य कस्यचित् ।॥57।। अतः अब आप ही मेरे लिए निवास स्थान की खोज कीजिए, जो अच्छा हो तथा जहां मेरे रहने से किसी भी प्राणी को कोई कष्ट न हो। एवमुक्तस्तु पुत्रेण विश्रवा मुनि पुंगव: । वचन प्राह धर्मज्ञ श्रूयतामिति सत्तम ।।58॥।
दक्षिणस्योददधेस्तीरे त्रिकूटो नाम पर्वतः । तस्याग्रे तु विशाला सा महेन्द्रस्य पुरी यथा ।59॥। मुनिश्रेष्ठ विश्रवा ने अपने पुत्र के इन शब्दों को सुनकर कहा-हे धर्मज्ञ! हे साधु! तुम मेरी बात सुनो! दक्षिणी समुद्र तट पर “त्रिकूट” नाम का पर्वत है। उस पर्वत पर एक विशाल नगरी बसी हुई है, जो इन्द्रपुरी अमरावती के समान ही सुन्दर तथा आकर्षक है। लड़का नामपुरी रम्या निर्मिता विश्वकर्मणा । राक्षसानां निवासार्थ यथेन्द्रस्यामरावती ।॥60॥। “लड़का” नामक उस रमणीय पुरी को विश्वकर्मा ने असुरों के निवास के लिए बनाया था। वह इन्द्र की अमरावती पुरी की तरह ही है। तत्र त्वं वस भद्रें ते लड़कायां नात्र संशय: । हेम प्राकारपरिखा यन्त्र शस्त्रसमावृता ।।6।। हे भद्र! उस लड़का में जाकर तुम निःसंदेह बस जाओ। वह नगरी यंत्र और शस्त्रों से सुरक्षित तथा स्वर्ण की चहारदीवारी से युक्त है।
वैश्रवण का लंका वास
रमणीया पुरी सा हि रुक््मवैदूर्यतोरणा । राक्षसै: सा परित्यक्ता पुरा विष्णुभयार्दितैः: ।/62।। स्वर्ण और नीलम निर्मित कारकों वाली वह रमणीय नगरी है। पूर्वकाल में भगवान् विष्णु के भय के कारण असुर इसे त्याग कर चले गए थे। शून्यांरक्षो गणै: सर्वे रसातलतलं गतै: । शून्य सम्प्रति लड़का सा प्रभुस्तस्या न विद्यते ।/63।। वे समस्त असुर रसातल की तलहटी में चले गए थे। उस समय से वह लड्का नगरी अब तक सूनी पड़ी है। उसका कोई स्वामी नहीं है। स त्वं तत्र निवासाय गच्छ पुत्र यथा सुखम् । निर्दोषस्तत्र ते वासो न बाधस्तत्र कस्यचित् ।।64।। अतः: हे पुत्र! तुम वहां सुखपूर्वक रहने के लिए प्रस्थान करो। वहां रहने में न तो किसी प्रकार की विधघ्न या बाधा है और न ही कोई दोष है। एतच्छुत्वा स धर्मात्मा धर्मिष्ठें वचन पितुः । निवासयामास तदा लड़का पर्वतमूर्धनि |॥65॥। अपने पिता द्वारा धर्मयुक्त वचनों को सुनकर धर्मात्मा वैश्रवण ने त्रिकूट पर्वत पर बसी हुई उस लड्कापुरी नामक नगरी में जाकर रहना शुरू कर दिया। नैर्क्नतानां सहसैस्तु हृष्टे: प्रमुदितैः सदा । अचिरेणैव कालेन सम्पूर्णातस्य शासनात् ।॥66।। वैश्रवण अर्थात् कुबेर के उस स्थान पर जाकर रहते ही वह नगरी कुछ ही दिनों में हृष्ट-पुष्ट एवं सहसों नैर्ऋ़्तों (असुरों की एक जाति) से भर गई। वे सभी वहां धर्मात्मा वैश्रवण के अधीन
सुखपूर्वक रहने लगे। सतु तत्रावसत प्रीतो हृष्टै: ने्रतर्षभ: । समुद्र परिखायां स लड़कायां विश्रवात्मज: ।।67।। समुद्र की तरह खाई वाली उस लड़कापुरी में विश्रवा के पुत्र धर्मात्मा वैश्रवण असुरों के स्वामी बनकर सुख के साथ रहने लगे। काले काले तु धर्मात्मा पुष्पकेण धनेश्वर: । अभ्यागच्छद् विनीतात्मा पितरं नातरं च हि ।॥68॥। समय-समय पर विनीत स्वभाव वाले धर्मात्मा वैश्रवण पुष्पक विमान में बैठकर अपने माता- पिता से मिलने चले जाते थे। सदैव गन्धर्वगणैरभिष्ट् तस्तथाप्सरोनृत्य विभूषितालय: । गभस्तिभि: सूर्य इवावभासयन् पितु: समीपं प्रययौ स वित्तप: ।॥69।। गन्धर्वगण तथा देवता उनकी स्तुति किया करते थे। उनकी नगरी का भवन सुंदर अप्सराओं के नृत्य से विभूषित रहता था। सूर्य के समान प्रकाशित धर्मात्मा वैश्रवण एक बार स्वयं अपना प्रकाश बिखेरते हुए अपने पिता के पास गए। श्रुत्वागस्त्येरितं वाक््यं रामो विस्मयमागत: । कथमासीत् तु लड्कायां सम्भवो राक्षसा पुरा |।70।। भगवान् रामचन्द्र को महामुनि अगस्त्य के वाक््यों को सुनकर बड़ा विस्मय हुआ। वह यह सोचने लगे कि पूर्वकाल में लड्का में राक्षसों की उत्पत्ति कैसे हुई थी। ततः शिर: कम्पयित्वा त्रेताग्नि सम विग्रहम् । तमगस्त्य॑ मुहुर्दृष्टवा स्मयमानो5भ्यभाषत ।।7॥। इसके बाद रामचन्द्रजी ने अपना सिर हिलाते हुए त्रिविध अग्नियों के समान तेजस्वी शरीर वाले महामुनि अगस्त्यजी की ओर देखा तथा कहा-- भगवन पूर्वामप्येषा लड़का55सीत् पिशिताशिनाम् । श्रूत्वेवे भगवद्वाक्यं जातो मे विस्मय: पर: ।।72।। है भगवान्! यह सुनकर मुझे बहुत आश्वर्य हो रहा है कि यह लड्कापुरी पहले मांसभक्षी असुरों का निवास स्थल थी।
असुरों की उत्पत्ति
पुलस्त्यवंशादुदभूता राक्षसा इति नः श्रुतम् । इदानीनन्यतश्वापि सम्भव: कीर्तितस्त्वया |73।। मैं तो केवल यही सोचता था कि असुरों की उत्पत्ति पुलस्त्यजी के कुल से ही हुई है, परन्तु आपने किसी अन्य कुल से भी असुरों का उत्पन्न होना बताया है। रावणात् कुम्भकर्णाच्च प्रहस्ताद् विकटादपि । रावणस्य च पुत्रेभ्य: कि नु ते बलवन्त्तरा: ।|74।। उन्होंने कहा--क्या वे सभी राक्षस रावण, कुम्भकर्ण, प्रहस्त, विकट तथा रावण के पुत्रों से
बढ़कर भी बलशाली थे। क एषां पूर्वको ब्रह्मन कि नामा च बलोत्कट: । अपराधं च कं प्राप्य विष्णुना द्राविता: कथम् ।।75।। हे ब्रह्मान! इन असुरों का पूर्वज कौन था और उस अपार बलशाली का नाम क्या था? विष्णुजी ने उनके कौन से अपराध को देखकर उन्हें मार भगाया था? एतद् विस्तरत: सर्व कथयस्व ममानघ । कुतूहलमिदं महां नुद भानुर्यथा तमः ।॥76।। हे निष्पाप! इन सभी बातों के बारे में आप मुझे विस्तारपूर्वक बताइए। जिस प्रकार सूर्य अंधकार का नाश करता है, उसी भांति आप मेरे इन प्रश्नों का निवारण कीजिए। राघवस्य वच: श्रुत्वा संस्कारालंकृतं शुभम् । अथ विस्मयमानस्तमगस्त्य: प्राह राघवम् ।|77।। अगस्त्यजी को मन में यह सोचकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि सर्वज्ञ होते हुए भी राघव मुझसे यह सब कुछ क्यों पूछ रहे हैं? उसके बाद उन्होंने कहना शुरू किया-- प्रजापति: पुरा सृष्टठवा अप: सलिलसम्भव: । तासां गोपायने सत्त्वानसृजत् पद्मसम्भव: ।।78।॥। पूर्वकाल में जल द्वारा उत्पन्न हुए कमल पर प्रकट प्रजापति ब्रह्माजी ने सर्वप्रथण जल की सृष्टि की। उसके बाद उसकी रक्षा करने के लिए विभिन्न प्रकार के जल-जीव उत्पन्न किए। ते ते सत्वा: सत्त्वकर्तारें विनीतवदुपस्थिता: । कि कुर्म इति भाषन्त:ः क्षुत्पिपासाभयार्पिता: ।।79।। यदि जल-जीव भूख और प्यास के कारण व्याकुल हों तो क्या करें? वे जल-जीव यह कहते हुए अपने उत्पन्नकर्ता ब्रह्माजी के पास विनीत भाव से जाकर खड़े हो गए। प्रजापतिस्तु तान् सर्वान् प्रत्याह प्रहसन्निव । आभाष्य वाचा यत्नेन रक्षध्वमिति मानद ।।80।। हे सम्मानदायक राघवेन्द्र! ब्रह्माजी ने उन सबको हंसकर संबोधित करते हुए कहा--यत्न करके इस जल की रक्षा करो। रक्षामिति तत्रान्यैर्यक्षाम इति चापरै: । भुड़िक्षताभुडिक्षतैरुक्तस्ततस्तानाह भूतकृत् ।8॥। इस बात को सुनकर भूखे-प्यासे जीव-जन्तुओं में से कुछ ने कहा--हम इस जल की रक्षा करेंगे। कुछ ने कहा--हम इस जल का यक्षण (पूजन) करेंगे। तत्पश्चात् ब्रह्माजी बोले-- रक्षाम इति यैरुक्तं राक्षसास्ते भवन्तु वः । यक्षाम इति यैरुक्त यक्षा एव भवन्तु व: ।।82।। तुम सबमें से जिन्होंने 'रक्षण” करने की बात कही है, वे सभी 'राक्षस' नाम से प्रसिद्ध होंगे तथा जिन्होंने 'यक्षण' की बात कही है, वे सब “यक्ष' के नाम से प्रसिद्ध होंगे। इस प्रकार वे जीव 'राक्षस' तथा “यक्ष' दो जातियों में विभक्त हो गए। तत्र हेति प्रहेतिश्व भ्रातरौ राक्षसाधिपौ । मधुकैटभसंकाशौ बभूवतुररिदंमौ ।।83।।
उनमें से 'हेति” और “प्रहेति” नाम के दो भाई राक्षस जाति के राजा (स्वामी) बने। वे मधु- कैटभ के समान शत्रुओं का दमन करने में शक्तिशाली थे। प्रहेतिर्धार्मिकस्तत्र तपोपवनगतस्तदा । हेतिदरिक्रियार्थे तु परं यत्नमपाकरोत् ।।84॥। उनमें प्रहेति राजा धर्मात्मा था, अत: वह तपस्या करने के उद्देश्य से तपोवन में चला गया। लेकिन हेति राजा ने स्त्री को पाने के लिए बहुत प्रयत्न किया। सकालभगिनी कन्यां भयां नाम महाभयाम् | उदावहमेयात्मा स्वयमेव महामति: ।॥85॥। वह बहुत अधिक बुद्धिमान और आत्मबल से सम्पन्न था। उसने काल की कुमारी बहन (भया) से स्वयं याचना करके विवाह किया, जो स्वयं ही महाभयानक थी। स तस्यां जनयामास हेती राक्षसपुंगव: । पुत्र पुत्रवतां श्रेष्ठो विद्युत्केशमिति श्रुतम् ॥86।। उसने राक्षसराज हेति के द्वारा एक पुत्र को जन्म दिया। “विद्युत्केश” नाम के उस पुत्र के कारण हेति पुत्रवानों में श्रेष्ठ समझा जाने लगा। विद्युत्केशो हेति पुत्र: स दीप्तार्कसमप्रभ: । व्यवर्धत महातेजास्तोयमध्य इवाम्बुजम् ।87।। उसका पुत्र विद्युत्केश प्रदीप्त सूर्य के समान प्रकाशवान था। वह परम तेजस्वी बालक जल में कमल की तरह दिन-रात बढ़ने लगा। स यदा यौवन भद्रमनुप्राप्तो निशाचर: । ततो दारक्रियां तस्य कर्तु व्यवसितः पिता ।॥88॥। श्रेष्ठ निशाचर विद्युत्केश जब युवावस्था में पहुंचा तो उसके पिता ने उसका विवाह करने का निश्चय किया। संध्यादुहितरं सो5थ संध्यातुल्यां प्रभावतः । वरयामास पुत्रार्थ हेतु राक्षस पुंगव:ः ।।89।। उसने उसकी माता के समान प्रभावशालिनी सन्ध्या की पुत्री का उसके लिए चयन किया। अवश्यमेव दातव्या परस्मै सेति संध्यया । चिन्तयित्ना सुता दत्ता विद्युत्केशाय राघव ।॥90।। सन्ध्या के मन में यह विचार आया कि मुझे अपनी पुत्री का विवाह तो करना ही है, फिर विद्युत्केश के साथ ही क्यों न हो जाए। यह निर्णय कर उसने अपनी पुत्री विद्युत्केश को सौंप दी। संध्यायास्तनयां लब्ध्वा विद्युत्केशो निशाचर: । रमते स तथा सार्ध॑ पौलोभ्यां मध्ववानिव ।॥9।। विद्युत्केश ने सन्ध्या की पुत्री को पाकर उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया, जैसा इन्द्र पुलोम-पुत्री शची के साथ करते थे। केनचित्त्वथ कालेन राम सालकटड्कटा । विद्युत्केशाद् गर्भभाप धनराजि रिव्ययर्णवात् ।।92।।
हे राम! जिस प्रकार मेघों की पंक्ति समुद्र से जल ग्रहण करती है, उसी प्रकार संध्या की पुत्री 'सालकटड्कटा' ने विद्युत्केश द्वारा गर्भ धारण किया। ततः सा राक्षसी गर्भ घनगर्भसमप्रभम् | प्रसूता मन्दरं गत्वा गड़ा गर्भमिवाग्निजम् ।।93।। तत्पश्चात् उस राक्षसी ने मन्दराचल पर्वत पर जाकर विद्युत जैसी कान्ति वाले पुत्र को जन्म दिया, जिस प्रकार गंगा ने अग्नि के द्वारा छोड़े गए शिव के तेज समान रूपी गर्भ (कुमार कार्तिकेय) को उत्पन्न किया था। समुत्सुज्य तु सा गर्भ विद्युत्केशरतार्थिनी । रेमे तु सार्ध पतिना विस्मृत्य सुतमात्मजम् ।॥94।। फिर वह पति विद्युत्केश के साथ रति-क्रीड़ा करने के लिए नवजात शिशु को छोड़कर चल पड़ी तथा पुत्र का ध्यान भुलाकर अपने पति के साथ रमण करने लगी। उत्सृष्टस्तु तदा गर्भो धनशब्द समस्वन: । तयो शिशु: शरदर्कसम द्युति: ।॥95।। उस माता द्वारा वहां छोड़ा गया बालक बादलों की भांति गरजने लगा। तत्पश्चात् उस बालक के शरीर की कान्ति शरदकालीन सूर्य की भांति प्रतीत होने लगी। निधायास्ये स्वयं मुष्टिं रुरोद शनकैस्तदा । ततो वृषभमास्थाय पार्वत्या सहित: शिव: ।।॥96।। वह नवजात बालक अपने हाथों को मुंह में डालकर धीरे-धीरे रोने लगा। उस समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ बैल पर बैठे हुए थे। वायुमार्गेण गच्छन् वै शुश्राव रुदितस्वनम् । अपश्यदुमया सार्ध रुदन्तं राक्षसात्मजम् ।॥97।। वे दोनों वायुमार्ग से जा रहे थे, तभी उन्हें वहां एक बालक के रोने की आवाज सुनाई दी। तब उन दोनों ने उस राक्षस-पुत्र की ओर देखा। कारुण्यभावात् पार्वत्या भवस्त्रिपुरसूदनः । त॑ राक्षसात्मजं चक्रे मातुरेव वय: समम् ।॥98।। पार्ववीजी की उस बालक के प्रति करुणा एवं ममता उत्पन्न हुई। इस पर शिवजी ने उस बालक को उसकी मां की आयु के समान वयस्क बना दिया। अमरं चैव त॑ कृत्वा महादेवोक्षरो5व्यय: । पुरमाकाशगं प्रादात् पार्वत्या: प्रियकाम्यया |॥99॥। पार्वती का प्रिय होने के कारण उन्होंने उस राक्षस-पुत्र को एक नगर के समान के आकार का आकाशचारी विमान देकर, अमर भी बना दिया।
राक्षसियों को वरदान
उमयापि वरो दत्तो राक्षसीनां नृपात्मज । सद्योपलब्धिगगर्भस्य प्रसूतिः सद्य एव च ।।400।।
सद्य एव वय: प्राप्तिं मातुरेव वयः समम् ।।0॥।
हे राजपुत्र! इसके पश्चात् पार्वतीजी ने यह वरदान दिया कि आज से राक्षसियां शीघ्र ही गर्भ धारण कर लिया करेंगी और उनके द्वारा जन््मा बालक उसी समय शीघ्रता से अपनी मां की आयु के बराबर वयस्क बन जाएगा। ततः सुकेशो वरदान गर्वित:, श्रियं प्रभो प्राप्य हरस्य पार्श्चतः । चचार सर्वत्र महान् महामतिः, खगं पुरं प्राप्य पुरंदरो यथा ।।]02॥। वरदान के बल से गर्वित तथा भगवान शिव के एऐश्वर्य को प्राप्त करके, वह सुकेश नामक राक्षत आकाशचारी विमान में विराजमान होकर, देवराज इन्द्र की भांति सारी जगह विचरण करने लगा। सुकेश धार्मिकं दृष्टवा वरलब्धं च राक्षसम् । ग्रामणी नाम गन्धर्वो विश्वावसुसम प्रभ: ।।॥03॥।। हक को विश्वासु के समान तेजस्वी, धार्मिक एवं वर प्राप्त देखकर “ग्रामणी” नाम की गन के तस्य देववती नाम द्वितीया श्रीरिवात्मजा । त्रिषु लोकेषु विख्याता रूपयौवनशालिनी ।।04।। तां सुकेशाय धर्मात्मा ददौ रक्ष: श्रियं यथा । वरदान कृतैश्वर्य सा त॑ प्राप्य पतिं प्रियम् ।।05।। अपनी पुत्री 'देववती” को जो लक्ष्मी के समान दिव्य स्वरूप वाली थी और रूप-यौवन के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी--राक्षसरों की राजलक्ष्मी की भांति उसे सुकेश के हाथों सौंप दिया अर्थात् उसका विवाह राक्षस पुत्र सुकेश के साथ कर दिया। वह देववती नामक कन्या भी वरदान के रूप में मिले ऐश्वर्य की भांति पति को पाकर-- आसीद् देववती तुष्टा धन॑ प्राप्येव निर्धन: । स तया सह संयुक्तो रराज रजनीचर: ।।06।। इस प्रकार संतुष्ट अर्थात् तृप्त हो गई, जैसे किसी निर्धन व्यक्ति को धन का ढेर मिल गया हो। उसके साथ रहते हुए वह राक्षसराज भी-- अज्जनादभि निष्क्रान्तः करेण्वेव महागज: । ततः काले सुकेशेस्तु जनयामास राघव ।।07।। त्रीन् पुत्राउजनयामास त्रेताग्निसमविग्रहान् | माल्यन्तं सुमालिं च मालिं च बालिनां वरम् ।।08।। इस प्रकार सुशोभित होने लगा, जिस प्रकार महागज के साथ कोई हथिनी सुशोभित होती है। हे राघव! इसके पश्चात् सुकेश ने देववती के गर्भ से अग्नि-समान तीन तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया। उन तीनों के नाम माल्यवान, सुमाली तथा माली थे। वे तीनों सर्वशक्तिमानों एवं बलधारियों में श्रेष्ठ थे। त्रीस्त्रिनेत्र समान् पुत्रान् राक्षसान् राक्षसाधिप: | त्रयो लोका इवाव्यग्रा: स्थितास्त्रय इवाग्नय: ।।09।। शिवजी के समान शक्तिशाली उन तीनों को देखकर राक्षसराज सुकेश बहुत प्रसन्न हुआ। वे
तीनों पुत्र अग्नियों के समान तेजस्वी तथा तीनों लोकों के समान सुस्थिर थे। त्रयो मन्त्रा इवात्युग्रास्त्रयो घोरा इवामया: । त्रयः सुकेशस्य सुतास्त्रेताग्नि सम तेजस: ।।40।। तीनों रोगों के समान भयंकर तथा मन्त्रों के समान उग्र थे। वे तीनों पुत्र त्रिविध अग्नियों के समान तेजस्वी थे। विवृद्धिमगमस्तत्र व्याधयोजेक्षिता इव । वरप्राप्तिं पितुस्ते तु ज्ञात्वैश्वर्य तपोबलात् ।।॥। जिस प्रकार उपेक्षित किए जाने पर रोग बढ़ने लगता है, उसी प्रकार वह तीनों राक्षसराज पुत्र भी बढ़ने लगे। जब उन्हें यह पता चला कि उनके पिता ने घोर तपस्या करके वर प्राप्त किया था तपस्तप्तुं गता मेरुं भ्रातर: कृतनिश्चया: । प्रगृह्य नियमान् घोरान् राक्षसा नृपसत्तम: ।।2॥। तो वे तीनों भाई भी तपस्या करने का निश्चय करके मेरु पर्वत की ओर चले गए। हे नृपश्रेष्ठ! वे तीनों कठोर एवं दृढ़ नियमों का पालन करते हुए वहां तपस्या करने लगे। विचेरुस्ते तपो घोरं सर्वभूत भयावहम् । सत्यार्जवशमोपेतैस्तपोभिभ्भुवि दुर्लभ: ।।3॥।। उनकी उस तपस्या से सभी प्राणी भयभीत थे। भूमि अर्थात् पृथ्वी पर आर्जव, सत्य, शम आदि से युक्त होकर-- संतापयन्तस्त्रील्लोकान् सदेवासुरमानुषान् । ततो विभुश्नतुर्वक्त्रो विमानवरमाश्रित: ।।4॥। घोर तपस्या द्वारा उन तीनों ने देवताओं, असुरों और मनुष्यों को संतप्त कर दिया। उस समय प्रजापति चतुर्मुख ब्रह्माजी विमान पर सवार होकर वहां पहुंचे। सुकेशपुत्रानामन्त्रय वरदो5स्मीत्यभाषत । ब्रह्माणं वरदं ज्ञात्वा सैन्द्रैदेवगणै्वतम् ।।5॥। ऊचुः प्रांजलय: सर्वे वेषमाना इव द्रुमा: । तपसा<<४राधितो देव यदि नो दिशसे वरम् ।46॥।। उन्होंने सुकेश के तीनों पुत्रों से कहा--मैं तुम्हें वर देने के लिए आया हूं। इन्द्र तथा अन्य देवताओं से घिरे ब्रह्माजी वरदान देने आए हैं, यह जानकर वे तीनों पेड़ की भांति कांपते हुए बोले है देव! यदि हमारी तपस्या से संतुष्ट तथा प्रसन्न होकर आप हमें वर देने आए हैं-- अजेया: शत्रुहन्तारस्तथैव चिरजीविन: । प्रभविष्णवों भवामेति परस्परमनुवृता: ।।7।। तो आप हमको शत्रु-नाशक, अजेय तथा चिरंजीवी होने के साथ-साथ यह वरदान दें कि हम तीनों एक-दूसरे के अनुकूल तथा प्रभावशाली बने रहें। एवं भविष्यथेत्युक्त्वा सुकेशतनयान् विभु: । स ययीौ ब्रह्मलोकाय ब्रह्मा ब्राह्मणवत्सल: ।।8।। उनकी बात सुनकर प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा--ऐसा ही होगा। इसके पश्चात् ब्राह्मण वत्सल
ब्रह्माजी ब्रह्मतोक को चले गए। वरं लब्ध्वा तु ते सर्वे राम रात्रिंचरास्तदा | सुरासुरान् प्रबाधन्ते वरदान सुनिर्भया: ।।9।। दे है राम! वरदान पाकर वे तीनों राक्षस देवताओं और असुरों सभी को निर्भय होकर वष्ट देने लगे। तैर्बाध्यमानास्त्रिदशा: सर्षिसंघा: सचारणा: । त्रातारं नाधिगच्छन्ति निरयस्था यथा नरा: ।॥420।। जिस प्रकार नरक लोक में पड़े हुए मनुष्य असहाय हो जाते हैं, उसी प्रकार उनके द्वारा सताए गए ऋषि-वृन्द एवं चारण भी असहाय हो गए। अथ ते विश्वकर्माणं शिल्पिनां वरमव्ययम् । ऊचुः समेत्य संहृष्टा राक्षसा रघुसत्तम ।।]2।। हे रघुकुलमणि! प्रसन्नता और उत्साह से भरकर एक दिन उन तीनों ने शिल्पकारों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा से कहा-- ओजस्तेजोबलवतां महतामात्मतेजसा । गृहकर्ता भवानेव देवानां हृदयेप्सितम् ।।]22।। है महामने! जो बल, तेज तथा ओज से सम्पन्न होने के कारण महान् बने हैं, आप अपनी शक्ति द्वारा उन देवताओं के निमित्त मनोनुकूल भवनों का निर्माण करते हैं। अस्माकमपि तावत् त्वं गृहं कुरु महामते । हिमवन्तमुपाश्रित्य मेरुं मन्दरमेव वा ।।423।। अतः अब आप हमारे लिए भी मेरु, हिमालय या मन्दराचल पर्वत के ऊपर भगवान् शिव के भवन की भांति एक विशाल एवं दिव्य निवास स्थान का निर्माण करें। महेश्वर गृहप्रख्यं गृहं न: क्रियतां महत् । विश्वकर्मा ततस्तेषां राक्षसानां महाभुज: ।।24॥।। निवासं कथयामास शक्रस्येवामरावतीम् । दक्षिणस्योददधेस्तीरे त्रिकूटो नामपर्वतः ॥425।।
यह बात सुनकर विश्वकर्माजी ने उन्हें एक ऐसा निवास स्थल बताया जो इन्द्र की अमरावतीपुरी के समान था। उन्होंने कहा-दक्षिण समुद्र तट के किनारे “त्रिकूट” नाम का एक
पर्वत है। सुवेल इति चाप्यन्यो द्वितीयो राक्षसे श्वर: । शिखरे तस्य शैलस्य मध्यमे>म्बुदसन्निभे ॥]26।। शकुनैरपि दुष्प्रापे टडकच्छिन्न चतुर्दिशि । त्रिशदयोजनविस्तीर्णा शतशयोजनमायता ।।427॥। स्वर्णप्रकार संवीता हेमतोरण संवृता । मयालड्केतिनगरी शक्राज्ञप्तेन निर्मिता ।।28।। हे राक्षसेश्वर! दूसरा 'सुवेल' नाम का पर्वत है। उस पर्वत के मध्य में बादल के समान नीलवर्ण है। उसको चारों तरफ से इस प्रकार टांका गया है कि वहां पर कोई पक्षी भी न प्रवेश
कर पाए। वहां पर सौ योजन लंबी तथा तीस योजन चौड़ी, स्वर्ण-प्राचीर (चहारदीवारी) और स्वर्ण निर्मित तोरणों (फाटकों) वाली “लड़का” नाम की नगरी है, जिसको मैंने इन्द्र की आज्ञा पर बनाया था।
लंकानगरी
तस्यां वसत दुर्धर्षा यूयं राक्षसपुंगवा: ।
अमरावतीं समासाद्य सेन्द्रा इव दिवौकस: ।।29॥।
लड़्कादुर्ग समासाद्य राक्षसैर्बहुभिव॒ता: ।
भविष्यथ दुराधार्षा: शत्रूणां शत्रुसूदना: ।।30।।
विश्वकर्मषवच: श्रुत्वा ततस्ते राक्षसोत्तमा: ।
सहसारनुचरा भूत्वा गत्वा तामवसन् पुरीम् ।।3।।
दृढ़ प्राकार परिखा हेमैर्गृहशतैर्वृताम् ।
लड्कामवाप्य ते हृष्टा न्यवसन् रजनीचरा: ।।432।।
हे दुर्धर्ष राक्षसपुंगवो! उस नगरी में जाकर तुम सभी उसी प्रकार निवास करो, जिस प्रकार
इन्द्र अन्य देवताओं के साथ अमरावती में करते हैं। हे शत्रुजयी वीरो! जब तुम बहुत सारे राक्षसों के साथ उस नगरी में निवास करोगे, तो तुम शत्रुओं के लिए अजेय बन जाओगे। विश्वकर्मा के इन वचनों को सुनकर वे राक्षस अपने साथियों तथा अनुचरों के साथ उस लड़का नगरी की ओर चल पड़े। उस नगरी की खाई और चहारदीवारी बहुत मजबूत थी। उसमें अनेक स्वर्ण निर्मित भवन थे। उस लड़का नगरी को देखते ही वे राक्षस वहां प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे।
एतस्मिन्नेव काले तु यथाकामं च राघव ।
नर्मदा नाम गन्धर्वी वभूव रघुनन्दन ।।33॥।
तस्या कन्यात्रयं ह्यासीद्रध्रीश्रीकीर्ति समद्युति ।
ज्येष्ठ क्रमेण सा तेषां राक्षसानाम राक्षसी ।।34॥।
कन्यास्ता: प्रददौ हृष्टा: पूर्णचन्द्रनिभानना: ।
त्रयाणां राक्षसेन्द्राणां तिस्रो गन्धर्वकन्यका: ।।435॥।।
दत्ता मात्रा महाभागा नक्षक्षे भगदैवते ।
कृतदारास्तु ते राम सुकेशतनयास्तदा ।।36।।
चिक्रीडुः सहभायभिरप्सरोभिरिवामरा: |
ततो माल्यवतो भार्या सुन्दरी नाम सुन्दरी |।437॥।
स तस्या जनयामास यदपत्यं निबोध तत् ।
वज्मुष्टिविस्पाक्षो दुर्मुखश्चैव राक्षस: ।।38।।
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च मत्तोन््मतौ तथैव च ।
अनला चाभवत्् कन्या सुन्दर्यो राम सुन्दरी |।39|।
सुमालिनो5पि भार्या55सीत् पूर्णचन्द्रनिभानना ।
नाम्ना केतुमती राम प्राणेभ्योडपि गरीयसी ।।440।।
सुमाली जनयामास यदपत्यं निशाचर: ।
केतुमत्यां महाराज तन्निबोधानुपूर्वश: ।।4॥|। हे रघुनन्दन, राघव! उस काल में “नर्मदा” नाम की एक गन्धर्वी भी थी। उसकी तीन कन्याएं थीं जो श्री, कीर्ति और ही के समान द्युतिमान थीं। उसने राक्षस जाति का न होते हुए भी अपनी तीनों पुत्रियों का विवाह ज्येष्ठ आदि क्रम से सुकेश राक्षस के तीनों पुत्रों के साथ कर दिया। चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख वाली वे तीनों कन्याएं बहुत अधिक प्रसन्न थीं। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उन तीनों कनन््याओं का विवाह सुकेश के पुत्रों के साथ हुआ। हे राम! जिस प्रकार अप्सराओं के साथ देवतागण क्रीड़ा करते हैं, उसी प्रकार सुकेश के तीनों पुत्र भी अपनी-अपनी पत्नियों के साथ भोग-विलास का सुखोपभोग करने लगे। उन तीनों में माल्यवान् की सुन्दर पत्नी का नाम 'सुन्दरी' था। सुन्दरी ने गर्भ से जिन पुत्रों को जन्म दिया, उनके नाम--विरुपाक्ष, वज़मुष्टि, दुर्भुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त एवं उन्मत्त थे। उसने अपने गर्भ से एक कन्या को भी जन्म दिया जिसका नाम “अनला' था। सुमाली की पत्नी भी चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख वाली थी। हे राम! उसका नाम “केतुमती' था और उसका पति उसे अपने प्राणों से भी अधिक चाहता था। केतुमती गा संतानों को अपने गर्भ से जन्म दिया, उनका परिचय भी देता हूं। हे महाराज! आप सुनिए। प्रहस्तोडकम्पनश्वैव विकट: कलिकामुख: । धूम्राक्षश्वैव दण्डश्न सुपार्श्ृश्ष महाबल: ।।42॥।। संहादि: प्रधसश्चैव भासकर्णश्न राक्षस: । राका पुष्पोत्कटा चैव कैकसी च शुचिस्मिता: ।।443।। कुम्भीनसी च इत्येते सुमाले: प्रसवा: स्मृता: ।।44॥।। उसके पुत्रों के नाम प्रहस्त, अकम्पन, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, सुपार्श्च, संहादि, प्रघस तथा भास्कर्ण थे। और मोहक मुस्कान वाली राका, पुष्पोत्कटा, कैकसी एवं कुम्भीनसी नामक चार पुत्रियां थीं। मालेस्तु वसुदा नाम गन्धर्वी रूपशालिनी । भारयासीत् पदमपत्राक्षी स्वक्षी यक्षीवरोपमा ।।45।। सुमालेरनुजस्तस्यां जनयामास यत् प्रभो । अपत्यं कथ्यमानं तु मया त्वं शुणु राघव ।।446।। अनलब्रचानिलश्वैव हरः सम्यातिरेव च । एते विभीषणामात्या मालेयास्ते निशाचरा: ।।॥47।। माली की रूपशालिनी गन्धर्वी पत्नी का नाम “वसुदा” था। वह कमल जैसी विशाल नेत्रों वाली और श्रेष्ठ राक्षस-पत्नियों के समान सुन्दर थी। हे राघव! हे प्रभो! माली की पत्नी ने अपने गर्भ से जिन संतानों को जन्म दिया, उनके बारे में सुनें। अनल, अनिल, हर और सम्पाति--ये चारों माली के पुत्र थे जो बाद में विभीषण के मन्त्री बने।
असुरों द्वारा उत्पीड़न
ततस्तु ते राक्षस पुड्वास्त्रयो, निशाचरै: पुत्र शतैश्व संवृताः । सुरान् सहेन्द्रानृषिनाग यक्षान् बबाधिरे तान् बहुवीर्यदर्पिता: ।।]48।।
जगद्भ्रमन्तो5निलवद् दुरासदा, रणेषु मृत्यु-प्रतिमानतेजस: । वर प्रदानादपि गर्विता भृशं, क्रतु क्रियाणां प्रशमंकरा: सदा ।।]49॥। वे तीनों राक्षस अपने सैकड़ों पुत्रों तथा अनेक राक्षसों के साथ रहते हुए अपने बल के
अहंकार में इन्द्रादि देवताओं, ऋषियों, नागों तथा यक्षों को कष्ट देने लगे। वे हमेशा वायु की तरह विश्व भर में भ्रमण करते रहते थे। वे युद्ध के समय साक्षात् मृत्यु-तुल्य प्रतीत होने वाले परम तेजस्वी थे। वरदान आदि प्राप्त करने के कारण वे घमण्डी हो गए थे तथा हमेशा यज्ञादि क्रियाओं को तबाह करने में संलग्न रहते थे।
तैर्वध्यमाना देवाश्व ऋषयश्न तपोधना: ।
भयार्ता: शरणं जम्मुर्देवदेवं महेश्वरम् ।।50।।
जगत्सृष्ट्यन्त कर्तारमजमव्यक्त रूपिणम् ।
आधार सर्वलोकानामाराध्यं परमं गुरुम् |[5॥।
ते समेत्य तु कामारि त्रिपुरारि त्रिलोचनम् ।
ऊचुः प्रांजलयो देवा भयगद्गदभाषिण: ।।52॥।
सुकेश पुत्रैर्भगवन् पितामह वरोदधतै: ।
प्रजाध्यक्ष प्रजा सर्वाबाध्यन्ते रिपुबाधनै: ॥453॥।
शरण्यान्य शरण्यानि ह्माश्रमाणि कृतानि नः ।
स्वर्गाच्च देवान् प्रच्याव्य स्वर्गे क्रीडन्ति देववत् ।।54॥।।
अहं विष्णुरहं रुद्रो ब्रह्माहं देवराइहम् ।
अहं यमश्च वरुणश्रन्द्रो5हं रविरप्पहम् ।॥55॥।
इति माली सुमाली य माल्यवांश्वैव राक्षसा: ।
बाधन्ते समरोदधर्षा ये च तेषां पुरःसरा: ।।56।।
तन्नोदेव भयार्तानामभयं दातुमहसि ।
अशिवं वपुरास्थाय जहि वै देवकण्टकान् ।।57॥।
इत्युक्तस्तु सुरै: सर्वे: कपर्दीनीललोहितः ।
सुकेशं प्रति सापेक्ष: प्राह देवगणान् प्रभु: |।58॥।
अहं तान्न हनिष्यामि ममावध्या हितेडसुरा: ।
किं तु मन्त्र प्रदास्यामि यो वै तान् निहनिष्यति ।।]59।।
उन राक्षसों से भयभीत एवं पीड़ित होकर सभी देवता और तपस्वी-ऋषि महादेव की शरण
में पहुंचे, जो संसार का संहार करने वाले, अजन्मा तथा अव्यक्तरूपधारी परम गुरु हैं। उन त्रिपुरारि, कामारि, त्रिलोचन शिवजी के पास जाकर उन देवताओं ने हाथ जोड़ प्रार्थना करते हुए कहा--हे भगवान्! हे प्रजानाथ! ब्रह्माजी का वरदान पाकर सुकेश के तीनों पुत्र संपूर्ण जनता अर्थात् प्रजा को शत्रु पीड़क साधनों द्वारा कष्ट पहुंचा रहे हैं। हमारे आश्रम जो दूसरों को शरण देते थे, उनको उजाड़ डाला है; स्वर्ग से सभी देवताओं को भगा दिया है और स्वयं वहां देवताओं की जगह उनके समान क्रीड़ा कर रहे हैं। “हम ही विष्णु हैं, हम ही रुद्र हैं, हम ही ब्रह्मा हैं तथा हम ही इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य और वरुण हैं।” यह कहते हुए माल्यवान्, सुमाली, माली और उनके अनेक दुर्जेय राक्षस सैनिक हमें बहुत कष्ट दे रहे हैं। हे देव! हम सभी उनके भय के कारण डरे हुए हैं। अतः हमारी रक्षा करने के लिए आप रौद्र रूप धारण कर उन राक्षसों का संहार कीजिए।
सभी देवताओं और ऋषियों के यह कहने पर नील-लोहित, जटाजूटधारी शंकरजी ने सुकेश के प्रति पक्षपात करते हुए कहा--हे देवताओ! मैं उनका संहार नहीं कर पाऊंगा क्योंकि वह मेरे द्वारा अवध्य हैं, लेकिन तुम सबको उस व्यक्ति के पास जाने को अवश्य कहूंगा जो इन सब राक्षसों का संहार कर सकेंगे।
एतमेव समुद्योगं पुरस्कृत्य महर्षय: ।
गच्छथ्वं शरणं विष्णुं हनिष्यति स तान् प्रभु: ।।60॥।।
ततस्तु जयशब्देन प्रतिनन्द्य महेश्वरम् ।
विष्णो: समीपमाजम्मुर्निशाचरभयार्दिता: ।।64॥।
शड्ख चक्र धरं देवं प्रणम्य बहुमान्य च ।
ऊचुः सम्भ्रान्तवद् वाक्यं सुकेशतनयान् प्रति |।62।।
सुकेशतनर्यर्देव त्रिभिस्त्रेताग्निसन्निभै: ।
आक्रम्य वरदानेन स्थानान्यपहतानि न: ।।63।।
लड्कानाम पुरी दुर्गा त्रिकूट शिखरे स्थिता ।
तत्र स्थिता: प्रबाधन्ते सर्वान् न: क्षणदाचरा: ।।64॥।
स त्वमस्मद्धितार्थाय जहि तान् मधुसूदन ।
शरणं त्वां वयं प्राप्ता गतिर्भव सुरेश्वर |।65।।
चक्रकृत्तास्यकमलान् निवेदय पमाय वै ।
यो येष्व5भयदोअस्माक॑ नान्यो5स्ति भवता विना ।।66।।
राक्षसान् समरे हृष्टान् सानुबन्धान् मदोद्धतान् ।
नुदत्वं नो भयं देव नीहारमिव भास्कर: ।।67।।
हे महर्षियो! तुम इस कार्य के लिए इसी क्षण भगवान् विष्णु के पास चले जाओ। वह उनका
अवश्य ही नाश करेंगे। यह बात सुनकर शिवजी की जय-जयकार करते हुए सभी देवता और ऋषि भगवान् विष्णु के पास चले गए। चक्रधारी देव विष्णुजी को नमस्कार तथा उनके प्रति अभिनंदन का भाव व्यक्त करने के उपरान्त देवताओं और ऋषियों ने सुकेश के पुत्रों के संबंध में भयभीत होकर कहा--सुकेश के तीनों पुत्र अग्नि के समान परम तेजस्वी हैं। उन्होंने ब्रह्माजी के वरदान के बल पर आक्रमण कर हमसे हमारे स्थान छीन लिए हैं। त्रिकूट पर्वत के शिखर पर लड्का नाम की दुर्गम नगरी है। वहां पर रहकर ये राक्षस हम सभी को बहुत कष्ट तथा पीड़ा पहुंचाते हैं। अतः हे मधुसूदन! आप हमारा कल्याण एवं हमारी रक्षा करने के लिए उनका संहार कीजिए। हे सुरेश्वरर हम सभी आपकी शरण में आए हैं। आप हमें अपने चरणों में आश्रय दें। आप अपने चक्र द्वारा उनके मस्तकों को काटकर यमराज को भेंट कर दें। आपके अलावा ऐसा कोई भी नहीं है, जो हमारी रक्षा कर सके। वे तीनों तथा उनसे संबंधित सभी राक्षस महाधूर्त और क्रूर हैं। अब आप युद्धक्षेत्र में उनका संहार करके हमारे भय को उसी प्रकार दूर करने का कष्ट करें जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश, अंधकार को नष्ट अर्थात् दूर करता है।
राक्षसों का विनाश इत्येवं दैवतैरक्तो देवदेवो जनार्दन: ।
अभयं भयदोररीणां दत्त्वा देवानुवाच ह ।।68॥।
सुकेशं राक्षसं जाने ईशानवरदर्पितम् |
तांश्वास्य तनयाज्जाने येषां ज्येष्ठ: स माल्यवान् ।।69।।
तानहं समत्तिक्रान्तमर्यादान् राक्षसाधमान् ।
निहनिष्यामि संक़ुद्ध: सुरा भवत विज्वरा: ।।70॥।
इत्युक्तास्ते सुरा: सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना ।
यथावासं ययुहष्टा: प्रशंसन््तो जनार्दनम् ।।]7।।
विबुधानां समुद्योगं माल्यवांस्तु निशाचर: ।
श्रुत्वा तौ भ्रातरौ वीराविदं वचनमब्रवीत् ।।]72॥।
अमरा ऋषयश्चैव संगम्य किल शड्करम् ।
अस्मद्वधं परीप्सन्त इदं वचनमब्जुवन् ।।]73॥।।
सुकेशतनया देव वरदान बलोद्धता: ।
बाधन्ते5स्मान् समुददृप्ता धोररूपा: पदे पदे ।।474॥।।
राक्षसैरभिभूत: स्मो न शक्ता: सम प्रजापते ।
स्वेषु सदमसु संस्थातुं भयात् तेषां दुरात्मनाम् ।75।।
तदस्माकं हितार्थाय जहि तांश्व त्रिलोचन ।
राक्षसान् हुंकृतेनैव दह प्रदहतां वर ।।76।।
इत्येवं त्रिदशैरुक्तो निशम्यान्धकसूदन: ।
शिर: करं च धुन्वान इदं वचनमत्रवीत् ।।77।।
अवध्या मम ते देवा: सुकेशतनया रणे ।
मन्त्र तु वः प्रदास्यामि यस्तान् वे निहनिष्यति ।।78॥।
योडसौ चक्रगदापाणि: पीतवासा जनार्दन: ।
हरिनारायण: श्रीमान्शरणं त॑ प्रपद्यथ ।।]79।।
हरादवाप्य ते मन्त्र कामारिमभिवाद्य च ।
नारायणाल्यं प्राप्य तस्मै सर्व न्यवेदयन् ।।80।।
देवताओं और ऋषियों के यह कहने पर शत्रुओं के लिए मृत्युदायक देवाधिदेव जनार्दन विष्णु ने उनको अभयदान देते हुए कहा--शिवजी द्वारा प्रदत्त वरों के बल से युक्त सुकेश राक्षस तथा उसके तीनों पुत्रों को मैं भी जानता हूं, जिनमें से बड़े का नाम माल्यवान् है। उन तीनों अधर्मियों ने धर्म की नीति को तोड़ा है। अब मैं क्रोधित हूं और उनका विनाश करूंगा। तुम सभी अब पूर्ण रूप से निश्चित हो जाओ। भगवान् विष्णु द्वारा यह आश्वासन दिए जाने पर सभी देवतागण और ऋषि प्रसन्न होकर, उनकी जय-जयकार करते हुए अपने-अपने स्थान को चले गए। देवताओं और ऋषियों द्वारा किए गए इस प्रयत्न की सूचना पाकर, राक्षस माल्यवान् ने
अपने दोनों छोटे भाइयों को संबोधित करते हुए कहा--सभी देवतागण और ऋषि मिलकर भगवान शिव के पास गए थे और उनसे हमारा संहार करने की प्रार्थना करते हुए कहा कि हे देव! आपके वरदानों से उद्धत बने सुकेश के पुत्र हमें भयंकर कष्ट पहुंचा रहे हैं। हे प्रजापते! उन दुष्टों एवं दुरात्माओं से पराजित होकर हम अशक्त हो चुके हैं। उनके भय तथा पीड़ाओं के कारण हम अपने स्थानों पर नहीं रह पाते। अतः हे त्रिलोचन! हमारे हित के लिए तथा हमारा कल्याण करने
के लिए आप उन्हें अपने क्रोध से जलाकर भस्म कर दें क्योंकि आपका स्थान भस्मकर्ताओं में मुख्य है। ऋषियों और देवताओं द्वारा यह कहे जाने पर अन्धक नामक राक्षस का संहार करने वाले शिवजी ने अपने सिर तथा हाथों को हिलाते हुए कहा--हे देवताओ! सुकेश के पुत्रों का संहार मेरे हाथों नहीं हो सकता, अतः मैं तुम्हें उस शक्ति के पास जाने की सलाह देता हूं, जो युद्ध क्षेत्र में उन्हें मार सकता है। जिनके हाथों में चक्र और गदा विद्यमान हैं और जो पीताम्बरधारी हैं उन हरि, नारायण, जनार्दन की शरण में तुम सब जाओ। सभी देवता और ऋषि कामशत्रु शंकरजी का निर्देश पाकर, उनको प्रणाम करके नारायण के स्थान पर जा पहुंचे और उन्हें सारा वृत्तांत सुना डाला।
ततो नारायणोनोक्ता देवा इन्द्रपुरोगमा: ।
सुरारींस्तान् हनिष्यामि सुरा भवतु निर्भया: ।8।।
देवानां भयभीतानां हरिणा राक्षसर्षभौ |
प्रतिज्ञातो वधो5स्माकं चिन्त्यतां यदिहक्षमम् ।।82।।
हिरण्यकशिपोर्मत्युरन्येषां च सुरद्विषाम् ।
नमुचि: कालनेमिश्व संहादो वीरसत्तम: ।।83।।
राधेयो बहुमायी च लोकपालो<थ धार्मिक: ।
यमलार्जुनौ च हार्दिक्य: शुभश्चैव निशुम्भकः ।।84।।
असुरा दानवाश्चैव सत्त्ववन्तो महाबला: |
सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्तेडपराजिता: ।॥485।।
सर्वे: क्रतुशतैरिष्टं सर्वे मायाविदस्तथा।
सर्वे सर्वास्त्रकुशला: सर्वे शत्रु भयंकरा: ।।86।।
नारायणेन निहिता: शतशो5थ सहख्रश: ।
एतज्ज्ञात्वा तु सर्वेषां क्षमंकर्तुमिहार्ह थ ।
दुःखं नारायण जेतुं यो नो हन्तुमिहेच्छति |।87।।
तब विष्णुजी ने इन्द्रादि देवताओं और ऋषियों से कहा--हे देवताओ! मैं उन देव शत्रुओं का
संहार करूंगा। इसलिए अब तुम सब निश्चित हो जाओ। हे राक्षस श्रेष्ठो! इस प्रकार भयभीत देवताओं और ऋषियों के समक्ष नारायण ने हमारा वध करने की प्रतिज्ञा की है, अतः अब हम सबको अपने कर्तव्य पर विचार करना चाहिए। हिरण्यकशिपु और अन्य देव-द्रोहियों की मृत्यु भगवान् विष्णु द्वारा ही हुई है। नमुचि, कालनेमि, वीरश्रेष्ठ सहांद, अनेक प्रकार की मायाएं जानने वाला राघये, धर्मात्मा लोकपाल यमलार्जुन, शुम्भ, हार्दिक्य और निशुम्भ आदि सत्त्ववान् महाबलवान दानवों एवं राक्षसों में ऐसा कोई भी नहीं है जो युद्ध भूमि में विष्णु से अपराजित रहा हो। वे सभी दानव व राक्षस मायावी थे। सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण थे और सैकड़ों युद्ध कर चुके थे। सभी शत्रुओं के लिए भयंकर सिद्ध होते थे। ऐसे सहस्र राक्षसों को हरि ने मार डाला। इन सभी बातों को जानने के बाद हमारे लिए जो उचित निर्णय हो, उस पर विचार- 3 ५ चाहिए। जो भगवान् विष्णु हमारा वध करना चाहते हैं, उन पर विजय पाना अत्यन्त कठिन है।
युद्ध का ताण्डव
ततः सुमाली माली च श्रुत्वा माल्यवतो वच: ।
ऊचतुर्भ्रतरं ज्येष्ठटमश्विनाविव वासवम् ।।488॥।
स्वधीनं दत्तमिष्टं च ऐश्वर्ये परिपालितम् ।
आयुर्निरामयं प्राप्तं सुधर्म: स्थापित: पथि ।।489॥।
देवसागरमक्षोभ्यं शस्त्रै: समवगाहा[ च ।
जिता द्विषो ह्प्रतिमास्तन्नो मृत्युकृतं भयम् ।90।।
नारायणश्न रुद्रश्न शक्रश्नापि यमस्तथा ।
अस्माकं प्रमुखे स्थातुं सर्वेविभ्यति सर्वदा |।94॥।
विष्णो्द्रषस्य नास्त्येव कारणं राक्षसेश्वर: ।
देवानामेव दोषेण विष्णो: प्रचलितं मन: ।।॥492॥।
तस्मादद्यैव सहिताः सर्वेडन्योन्यसमावृता: ।
देवानेव जिघांसामो येभ्यो दोष: समुत्थित: ।।93॥।
एवं सम्मन्त्रय बलिन: सर्वसैन्यसमावृताः ।
उद्योगं घोषार्यत्वा तु सर्वे नै#ऋतपुंगवा: ।।94।।
युद्धाय नियर्यु: क़ुद्धा जम्भवृत्रादयो यथा ।
इति ते राम संम्मन्त्रय सर्वोद्योगेन राक्षसा: ।।95।।
युद्धायनिर्ययु: सर्वे महाकाया महाबला: ।
स्यन्दनैर्वारणैश्वैव हौश्व करि न्निभै: ।।96।।
खरैगोभिरथोष्टैश्न शिशुमारैर्भुजंगमै: ।
मकरै: कच्छपैर्मनैर्विहंगैर्गरुडोपमै: ।97।।
सिंहैर्व्य्॑रिर्वराहैश्व सृमरैश्वमरैरपि ।
त्यक्त्वा लड़का गता: सर्वे राक्षसा बलगर्विता: ।।98।।
प्रयाता देवलोकाय योद्धुं दैवतशत्रव: ।
लड़का विपर्ययं दृष्टवा यानि लड़्कालयान्यथ ।।99।।
भूतानि भयदर्शीनि विमनस्कानि सर्वश: |
रथोत्तमैर॒ह्ममाना: शतशो5थ सहस्रशः ।।200।।
प्रयाता राक्षसास्तूर्ण देवलोक॑ प्रयत्नतः ।
रक्षसामेव मार्गेण दैवतान्यपचक्रमु: ।20॥।
माली और सुमाली माल्यवान् के वचनों को सुनकर इस प्रकार बोले, जैसे देवराज इन्द्र से
अश्विनी कुमार वार्तालाप कर रहे हों। उन दोनों ने अपने बड़े भाई से कहा--हमने अपने स्वपराक्रम द्वारा अभीपष्सित वस्तुएं प्राप्त की हैं। व्याधि-रहित आयु प्राप्त की है। ऐश्वर्य का उपभोग किया है और कर्तव्य-पालन की भी स्थापना की है। हमने समुद्र के समान देवताओं की सेना में अवगाहन करके उसे विक्षुब्ध भी किया है और अकल्पनीय समझी जाने वाली शक्तियों पर विजय भी प्राप्त की है। शत्रुओं के साथ युद्ध करते समय हमें मृत्यु का भय नहीं हुआ। रुद्र, इन्द्र तथा यमराज भी युद्ध में हमारे सामने खड़े होने में हमेशा डरते रहे हैं। हे राक्षसेश्वर! विष्णुजी
के हृदय में भी हमारे प्रति कोई द्वेष नहीं है, केवल देवताओं द्वारा चुगली करने के कारण उनका मन हमारी ओर से मुड़ सा गया है। अतः हम सभी एक-दूसरे की रक्षा करते हुए साथ-साथ चलें। जिन देवताओं के कारण यह उपद्रव खड़ा हुआ है, उन्हें मार डालें। इस प्रकार उन राक्षसों ने अपनी संपूर्ण सेना को एकत्रित करके, युद्ध के लिए अपनी तैयारी
की घोषणा कर दी। वे सभी जम्भ और वृत्र आदि राक्षसों की तरह क्रोधित होकर युद्ध के लिए चल पड़े। हे राम! वे सभी इस प्रकार का विचार-विमर्श करके पूरी तैयारी के साथ हाथी, घोड़े, रथ, गधे, ऊंट, बैल, शिश्मार सर्प, मगर, कच्छप, मछली, गरुड़ जैसे केमवान् पक्षी, सिंह, हरिण, वराह और नीलगाय आदि वाहनों पर सवार होकर लड़का को छोड़कर चल दिए। वे सभी असुर अपने बाहुबल के घमण्ड में चूर थे। जब वे देवताओं के देवलोक की ओर चले, तो उस लड़का नगरी में निवास करने वाले अन्य प्राणी उन अपशकुनों को देखकर भयभीत और खिन्न हो उठे। दूसरी ओर जब रथों पर सवार सैकड़ों राक्षसों ने प्रयत्नपूर्वक देवलोक में प्रवेश किया तो उस समय देवता भी भय के कारण गुप्त मार्गों से निकलकर देवलोक से बाहर चले आए।
भौमाश्चैवान्तरिक्षाश्व॒ कालाज्ञप्ता भयावहा: |
उत्पाता राक्षसेन्द्राणामभावाय सुमत्थिता: ।।202॥।
अस्थिनी मेधा ववृषुरुष्णं शोणितमेव च ।
वेलां समुद्राश्षोत्क्रान्तश्वैलुश्वाप्पथ भूधरा: ।।203॥।
अट्टहासान् विमुज्चन्तो घननादसमस्वना: ।
वाश्यन्त्यश्न शिवास्तत्र दारुणं घोरदर्शना: ।204।।
सम्पतन्त्यथ भूतानि दृश्यन्ते च यथा क्रमम् ।
गृध्रचक्रं महच्चात्र प्रज्वालोद्गारभिमुरवै: ।।205॥।
रक्षोगणस्योपरिष्टात् परिभ्रमति कालवत् |
कपोता रक्तपादाश्न सरिका विद्रुता ययु: ।।206।।
काका वाश्यन्तितत्रैव विडाला वै द्विपादय: ।
उत्पातांस्ताननादृत्य राक्षसा बलदर्पिता: ।।207।।
यान्त्येव न निवर्तन्ते मृत्यु पाशावपाशिता: ।
माल्यवांश्व सुमाली च माली य सुमहाबल: ।।208।।
पुरासरा राक्षसानां ज्वलिता इव पावका: ।
माल्यवन्तं तु ते सर्वे माल्यवन्तमिवाचलम् ।।209।।
निशाचरा आश्रयन्ति धातारमिव देवता: ।
तदबलं राक्षसेन्द्राणां महाभ्रधननादितम् ।।20॥।।
जयेप्सया देवलोक॑ ययौ मालिवशे स्थितम् ।
राक्षसानां समुद्योगं तं तु नारायण: प्रभु: ।।2॥।
देवदूतादुषश्रुत्य चक्रे युद्धे तदा मन: ।
स सज्जायुध तूणीरो वैनतेयोपरि स्थित: ।।242॥।
आसाद्य कवचं दिव्यं सहस्रार्कसमझद्युति
आबद्ध्य शरसम्पूर्णे इघुधी विमले तदा ।।23।।
श्रोणिसूत्रं च खड़े च विमलं कमलेक्षण: ।
शड़ख चक्रगदाशार्ड्रखड़ानचैव वरायुधान् ।।24॥।
सुपर्ण गिरि संकाशं वैनतेयमथास्थित: ।
राक्षसानामभवाय ययौ तूर्णतरं प्रभु: ।।25।।
सुपर्ण पृष्ठे स बभौ श्याम: पीताम्बरो हरि: ।
कांचनस्य गिरे: शुंड्रे सार्डत्तोयदो यथा ।।26।।
उस काल की संभावना से पृथ्वी और आकाश में कई भयंकर उत्पात प्रकट हुए जो राक्षसराजों की सूचना दे रहे थे। घने बादल हड्डियों और खून की वर्षा करने लगे। समुद्र अपनी सीमा का अतिक्रमण कर गए और पर्वत हिलने लग गए। बादल के समान गरजने वाले लोग विकट अट्टहास कर उठे और खतरनाक दिखाई पड़ने वाली गीदड़ियां दारुण स्वर में रोने लगीं। पृथ्वी आदि तरह के भूत उठते-गिरते और विलीन होते हुए नजर आने लगे। विशालकाय गिद्धों के झुण्ड अपने मुख द्वारा आग उगलते राक्षसों के ऊपर काल की तरह मंडराने लगे। तोता, मैना, कबूतर आदि पक्षी नगर छोड़कर भागने लगे। वहां पर पशु आर्त्तनाद करने लगे और बिल्लियां गुररने लगीं। काल पाश होते हुए भी वे राक्षस अपने बल के घमण्ड में मत्त थे। वे अपने अत्याचारों और उत्पातों की अवहेलना करते हुए युद्ध करने के उद्देश्य से आगे बढ़ते जा रहे थे। माल्यवान्, सुमाली तथा माली तीनों प्रज्वलित अग्नि के समान परम तेजस्वी शरीर वाले थे तथा सभी राक्षसों का नेतृत्व करते हुए आगे-आगे चल रहे थे। जिस प्रकार देवतागण ब्रह्माजी का आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार उन सभी राक्षसों ने माल्यवान् पर्वत के समान बलशाली राक्षसराज माल्यवान् का आश्रय ले रखा था। विजय पाने के उद्देश्य से राक्षसों की वह सेना मेघों के समान दा की ओर बढ़ती चली जा रही थी। उस समय वह राक्षस सेना माली सेनापति के नियंत्रण | इधर देवदूत द्वारा राक्षसों की युद्ध की तैयारी का समाचार सुनकर भगवान् विष्णु भी युद्ध
करने के लिए तैयार हो गए। इसके पश्चात् विष्णुजी सूर्य के समान दीप्तिमान् कवच धारण करके तथा दिव्य बाणों से भरे हुए तरकश लेकर युद्ध के लिए तत्पर हो गए। उन्होंने अपने शरीर पर चमचमाते हुए तीरों से भरे दो तूणीर बांध रखे थे। उन महान् परम तेजस्वी विष्णुजी ने कमर में पट्टी बांध रखी थी जिसमें एक चमचमाती हुई तलवार लटकी थी। इस प्रकार श्री नारायण शंख चक्र, गदा, शार्क््धनुष तथा खड़ आदि श्रेष्ठ शस्त्रों को धारण कर सुंदर पंखों वाले पक्षिराज गरुड़ पर सवार हो दुष्ट राक्षसों का संहार करने के लिए शीघ्रतापूर्वक चल दिए। गरुड़ पर सवार नील वर्ण पीताम्बरधारी श्री नारायण हरि ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो मेरु पर्वत के शिखर पर विद्युत के साथ मेघ शोभायमान हो।
राक्षस सेना क्षुब्ध हुई
ससिद्ध देवर्षिमहोरगैश्व गन्धर्वयक्षैरुपगीयमान: । समाससादासुरसैन्य शत्रुश्नक्रासि शार्ड्रायुध शड्खपाणि: ।।27।। सुपर्णपक्षानिलनुन्नपक्ष॑ भ्रमत्पताकं प्रविकीर्णशस्त्रम् ।
चचाल तद्राक्षस राजसैन्यं चलोपलं नीलमिवाचलाग्रम् ।।28॥। ततः शितै: शोणितमांसरूषितैर्युगान्तवैश्वानरतुल्य विग्रहै: ।
निशाचरा: सम्परिवार्य माधवं वरायुधैर्निरबिभिदु: सहस्रश: ।।249।। उस समय बड़े-बड़े ऋषि, यक्ष, नाग, गन्धर्व आदि विष्णुजी के गुण गा रहे थे। राक्षसों की
सेना के लिए शत्रु बने श्री नारायण हरि हाथों में चक्र, गदा, खड़, शार्ज़् धनुष तथा शंख आदि लेकर वहां पहुंच गए। गरुड़ के पंखों से उत्पन्न तीव्र वायु के झोंकों से राक्षस सेना क्षुब्ध हो उठी। राक्षस सैनिकों के हाथों से शस्त्र आदि गिर गए और उनके रथों की पताकाएं चक्कर खाकर गिरने लगीं। राक्षस सेना ठीक उसी प्रकार कांपने लगी, जिस प्रकार किसी पर्वत का नील-शिखर अपनी शिलाओं को बिखेरता है। राक्षसों के अस्त्र-शस्त्र, रक्त और मांस के टुकड़ों में सने हुए, प्रलयकालीन अग्नि के समान दिखाई दे रहे थे। सभी राक्षस भगवान् विष्णु को चारों तरफ से घेर कर उन पर अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे।
नारायण गिरि ते तु गर्जन्तो राक्षसाम्बुदा: ।
अर्दयन्तो<स्त्रवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदा: ।।220॥।।
श्यामावदातस्वतैर्विष्णु नलिनक्तंचरोत्तमै: |
वृतो5ण्जनगिरीवायं वर्षमाणै: पयोधरै: ।।224|।
शलभा इव केदारं मशका इव पावकम् ।
यथामृतघटं दंशा मकरा इव चार्णवम् ।।222॥।
तथा रक्षोधनुर्मुक्ता वजानिलमनोजवा: ।
हरिं विशन्ति सम शरा लोका इव विपर्यये ।।223॥।।
स्यन्दनै: स्यन्दनगता गजैश्न गजमूर्थगा: ।
अश्वारोहास्तथाथैश्व पादाताश्षाम्बरे स्थिता: ।।224।।
राक्षसेन्द्रा गिरिनिभा: शरैः शक्त्यूष्टि तोमरै: ।
निरुच्छवासं हरिं चक्र: प्राणयामा इव द्विजम् ।।225।।
निशाचरैस्ताड्यमानो मीनैरिव महोदधि: ।
शार्ज्ञ्मायम्य दुर्धर्षो राक्षसेभ्योड्सूजच्छरान् ।।226।।
शरै: पूर्णायतोत्सृष्टवज्कल्पैर्मनोजवै: ।
चिच्छेद विष्णुर्निशितैः शतशो5थ सहस्रशः ।।227।।
विद्राव्य शंरवर्षेण वर्ष वायुरिवोत्थितम् ।
पांचजन्यं महाशडूखं प्रदथ्मौ पुरुषोत्तम: ।।228।।
सो&म्बुजो हरिणा ध्मातः सर्वप्राणेन शड़्खराट् ।
ररास भीमनिहस्त्रिलोक्यं व्यथपन्निव ।।229|।
शड्खराजरव: सो&थ त्रासयामास राक्षसान् |
मृगाराज इवारण्ये समदानिव कुञ्जरान् ।।230।।
न शेकुरश्वा: संस्थातुं विमदा: कुड्जरा&भवन् ।
स्यन्दनेभ्यश्वुता वीरा: शड्खरावितदुर्बला: ।।234।।
गर्जना करते हुए राक्षसों ने अस्त्र रूपी जल की वर्षा से नारायण रूपी पर्वत को आच्छादित
कर दिया, जिस प्रकार बादल जल की बूंदों से पर्वत को आप्लावित कर देते हैं। श्री नारायण का उत्तम नीलवर्ण वाला शरीर पर्वत के समान सुशोभित था। उनको राक्षसों ने चारों ओर से इस प्रकार घेर लिया था, जिस प्रकार मेघों ने अज्जनगिरि को घेर रखा हो। जैसे धान के खेत में टिड्डी
दल, अग्नि में पतंगे, शहद से भरे घड़े में मधुमक्खियां तथा समुद्र में मगरमच्छ घुस जाते हैं, ठीक उसी प्रकार राक्षस सैनिकों के धनुषों से, वायु, वज्ञ और मन के वेग के समान बाण भगवान् विष्णु के शरीर में प्रवेश कर इस प्रकार विलुप्त हो गए, जैसे प्रलयकाल में सभी लोक श्री हरि में विलय हो जाते हैं। हाथी सवार हाथी पर, रथी अपने रथों पर तथा अश्वारोही अपने घोड़ों पर एवं पैदल ज्यों के त्यों सभी आकाश में स्थित थे। उन राक्षसों के शरीर विशाल पर्वतों के समान थे।
राक्षसों ने बाण, तोमर, शक्ति आदि की वर्षा करके श्री विष्णु को सांस लेने तक को दूभर कर दिया, ठीक उसी प्रकार जैसे प्राणायाम में द्विजगण श्वास को रोक देते हैं। जैसे मछलियां समुद्र के किनारे अपनी पूंछ से प्रहार करती हैं, ठीक वैसे ही राक्षस श्री विष्णु के शरीर पर प्रहार कर रहे थे। इसके पश्चात् श्री नारायण ने अपने शार्ड्भधनुष द्वारा उन दुर्धर्ष राक्षसों पर बाणों की वर्षा कर दी। भगवान् विष्णु द्वारा छोड़े गए उन बाणों ने हजारों-सैकड़ों राक्षसों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जिस प्रकार वायु का झोंका घिरे हुए बादलों को उड़ा देता है, उसी प्रकार श्री विष्णु ने बाणों की वर्षा द्वारा राक्षसों को भगाने के बाद अपना '“पाञ्चजन्य” नामक शंख बजाया। जब श्री नारायण ने समुद्र से उत्पन्न हुए उस शंख को अपनी पूर्ण प्राणशक्ति से बजाया तो उसकी भयंकर आवाज सुनकर तीनों लोक व्यथित हो उठे। जिस प्रकार जंगल में सिंह की दहाड़ सुनकर हिरण भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार उस शंखराज की आवाज सुनकर सभी राक्षस भयभीत हो गए। वीर सैनिक भय के कारण रथ से नीचे गिर पड़े।
विष्णु द्वारा वज्र प्रहार
शार्ड्रचाप विनिर्मुक्ता वज्रतुल्यानना: शरा: |
विदार्य तानि रक्षांसि सुपड़्खा विविशु: क्षितिम् ।।232॥। भिद्यमाना: शरै: संख्ये नारायण करच्युतैः ।
नियेत् राक्षसा भूमौ शैला वजहता इव ।।233।। व्रणानि परगात्रेभ्यो विष्णुचक्र कृतानि हि ।
असृक क्षरन्ति धाराभि: स्वर्णधारा इवाचला: ।।234।। शड़्खराजरवश्चापि शार्ड्चापरवस्तथा |
राक्षसानां रवांश्वापि ग्रसते वैष्णवोरव: ।॥235।।
तेषां शिरोधरान् धूताज्छरध्वजधनूषि च ।
रथान् पताकास्तूणीरांश्वच्छेद स हरि: शरैः ।236।। सूर्यादिव करा घोरा वायोर्धा इव सागरात् ।।237।। पर्वतादिव नागेन्द्रा धारौधा इव चाम्बुदात् ।।238।। तथा शार्ड्रविनिर्मुक्ता: शरा नारायणेरिता: । निर्धावन्तीषवस्तूर्ण शतथो5थ सहस्रश: ।॥239॥।। द्वीपिनेव यथा श्वान: शुना मार्जारको यथा ।
माजरिण यथा सर्पा: सर्पेण च यथारव: ।।240॥।
तथा ते राक्षसा: सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना ।
द्रवन्ति द्राविताश्चान्ये शायिताश्व महीतले ।।24॥|।
राक्षसानां सहस्राणि निहत्य मधुसूदन: ।
वरिजं शरयामास तोयदं सुरराडिव ।।242॥।
नारायण शस्त्रस्तं शड़्खनाद सुविह्नलम् ।
ययौ लड़्कामभिमुखं प्रभग्नं राक्षसं बलम् ।।243।।
प्रभग्ने राक्षसबले नारायण शराहते ।
सुमाली शरवर्षेण निववार रणे हरिम् ।।244।।
स तु तं छादयामास नीहार इव भास्करम् |
राक्षसा: सत्त्व सम्पन्ना: पुनधैर्य समादधु: ।।245।।
अथब्सो&्भ्यपतदू रोषाद् राक्षसो बल दर्पितः ।
महानादं प्रकुर्वाणो राक्षसाञ्जीव यन्निव ।246|।
उत्क्षिप्प लम्बाभरणं धुन्वन् करमिव द्विप: ।
ररास राक्षसो हर्षात् सतडित्तोयदो यथा ।।247।।
सुमाले्नर्दतस्तस्य शिरो ज्वलित कुण्डलम् ।
चिच्छेदयन्तुरश्चाश्च भ्रान्तास्तस्य तु रक्षस: ।।248|।
तैरबवैभ्भ्राम्यते भ्रान्तैः सुमाली राक्षसेश्वर: ।
इन्द्रियाश्वैः परिभ्रान्तै धृतिहीनो यथा नर: ।।249।।
ततो विष्णुं महाबाहुं प्रपतन्तं रणाजिरे ।
हते सुमालेरश्वैश्व रथे विष्णुरथं प्रति: ।250।।
शार्ज़् धनुष से छोड़े हुए उन सुंदर पंखों वाले बाणों के अग्रभाग वज्रतुल्य थे। वह राक्षसों को मारने के पश्चात् पृथ्वी में धंस जाते थे। श्री विष्णु द्वारा छोड़े गए उन बाणों से विशाल शरीर वाले राक्षस वज्र-प्रहार से आहत पर्वतों की भांति धराशायी होने लगे। भगवान् विष्णु द्वारा चक्र से शत्रुओं पर किए गए घावों से रक्त इस प्रकार टपक रहा था, जैसे पर्वतों से गेरू युक्त पानी के झरने बहते हैं। शार्ड्रधनुष की टंकार, शंखराज की ध्वनि और श्री विष्णु का गर्जन--इन सभी सम्मिलित शब्द ने राक्षसों के मनोबल को दबा कर रख दिया। भगवान् विष्णु ने अपने बाणों द्वारा राक्षसों के बाणों, ध्वजाओं, धनुषों, रथों, पताकाओं, तूणीरों और राक्षसों के हिलते हुए मस्तकों को काट डाला। जिस प्रकार समुद्र से जल का प्रवाह, सूर्य से भयंकर किरणें, पर्वतों से बड़े-बड़े सांप और बादलों से जल की धाराएं उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार भगवान् विष्णु द्वारा छोड़े गए हजारों-सैकड़ों बाण तुरन्त ही एक तरफ से दूसरी तरफ दौड़ने लगे। जिस प्रकार शरभ से सिंह, सिंह से हाथी, हाथी से बाघ, बाघ से चीता, चीता से कुत्ता, कुत्ते से बिलाव, बिलाव से सांप तथा सांप से चूहे डर कर भाग जाते हैं, उसी प्रकार श्री विष्णु द्वारा पीड़ित सभी राक्षस भय के कारण भागने लगे। उस भगदड़ में अनेक राक्षस पूरी तरह धराशायी हो गए। राक्षसों का वध करने के पश्चात् भगवान् विष्णु ने शंख को ध्वनि से उसी प्रकार परिपूर्ण कर दिया, जिस प्रकार देवराज इन्द्र जल से बादलों को परिपूर्ण कर देते हैं। भगवान् विष्णु के बाणों तथा शंखनाद से त्रस्त एवं भयभीत होकर सभी राक्षस लड़का की ओर भाग गए। विष्णु के बाणों से राक्षस सेना को भागता हुआ देखकर, सुमाली ने युद्धक्षेत्र में भयंकर बाणों
की वर्षा करके विष्णुजी को युद्धक्षेत्र में आगे बढ़ने से रोक दिया। जिस प्रकार कोहरा सूर्य की रोशनी को ढक देता है, उसी प्रकार सुमाली ने अपने बाणों द्वारा श्री विष्णु को रोक दिया। यह
दृश्य देखकर शक्तिशाली असुरों ने पुनः धैर्य धारण कर लिया। बल से पूर्ण उस राक्षस ने भयंकर गर्जना करते हुए अपने राक्षस सैनिकों में नव-जीवन का संचार कर दिया। जिस प्रकार हाथी अपनी सूंड ऊपर उठाकर चिंघाड़ता है, उसी प्रकार वह राक्षस अपनी आभूषण युक्त भुजा को ऊपर उठाकर हिलाने तथा गरजने लगा, मानो बिजली युक्त जल पूर्ण बादल गरज रहे हों। तब विष्णुजी ने उस राक्षस के सारथी के कुण्डलों से सुशोभित मस्तक को काट डाला। परिणामस्वरूप उस राक्षस के रथ के घोड़े अनियंत्रित होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। उन राक्षसों के घोड़ों के चक्कर काटने के कारण वह राक्षस भी उसी प्रकार चक्कर काटने लगा, जिस प्रकार इन्द्रियरूपी अश्वों के भटकने पर बुद्धि भटक जाती है। श्री विष्णु द्वारा युद्ध क्षेत्र में किए गए प्रहारों से राक्षतराज सुमाली के रथ के घोड़ों को चक्कर काटता हुआ देखकर--
सुदर्शन चक्र का कमाल
माली चाभ्यद्रवद युक्त: प्रगह्म सशरं धनु: ।
मालेर्धनुश्न्युता बाणा: कार्तस्वरविभूषिता: ।।25॥।
विविशुर्हरिमासाद्य क्रौंड्चं पत्ररथा इव ।
अर्धमान: शरै: सो5थ मालिमुक्तै: सहख्रश: ।।252॥।
चक्षुभे न रणे विष्णुर्जितिन्द्रिय इवाधिभि: ।
अथ मीौर्वीस्वनं श्रुत्वा भगवान् भूतभावन: ।।253॥।
मालिन॑ प्रति बाणौघान् ससर्जासिगदाधर: ।
ते मालिदेहमासाद्य वज्रविद्युत्प्रभा: शरा ।।254।।
पिबन्ति रुधिरं तस्या नागा इव सुधारसम् ।
मालिनं विमुखं कृत्वा शड्खचक्रगदाधर: ।॥255॥।
मालिमौलिं थ्वजं चापं वाजिनश्वाप्पपातयत् ।
विरथस्तु गदां गुह्य माली नक्तंचरोत्तम: ।।256।।
आयुप्लुवे गदापाणिगगिययग्रादिव केसरी ।
गदया गरुडेशानमीशानमिव चान्तक: ।।257॥।
ललाटदेशो<भ्यहनद वच्ञेणेन्द्रो यथाचलम् ।
गदयाभिहतहस्तेन मालिनागरुडो भूशम् ।।258॥।
रणात् पराड्मुख देवं कृतवान् वेदनातुरः ।
पराड्मुखो कृते देवे मालिना गरुडेन वै ।।259॥।
उदतिष्ठन्महान्शब्दो रक्षसामभिनर्दताम् ।
रक्षसा खवता राबं श्रुत्वा हरिहयानुज: ।।260।।
तिर्यगास्थाय संक्रुद्ध: पक्षीशे भगवान् हरि: ।
पराड्मुखो&प्युत्ससर्ज मालेश्वक्रें जिघांसया ।।26।।
उसके छोटे भाई माली ने धनुष-बाण उठाकर श्री विष्णु पर आक्रमण किया। माली के धनुष
द्वारा छोड़े गए बाण तीव्रता के साथ श्री विष्णु के शरीर में उसी तरह घुस गए, जिस प्रकार क्रौंच पर्वत के छिठ्रों में पक्षी घुस जाते हैं। माली द्वारा छोड़े गए बाणों के श्री विष्णु के शरीर में लगने
पर उनका ठीक उसी प्रकार कोई अहित नहीं हुआ, जिस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति अपनी मानसिक चिन्ताओं से विचलित नहीं होता। उसके बाद धनुष की टंकार को सुनकर भगवान् श्री विष्णु ने माली पर बाणों की वर्षा कर दी। बिजली की तरह चमकदार और वच्र की तीक्ष्णता के समान उसके बाण इस तरह रक्त पीने लगे, जिस प्रकार नागगण अमृत का पान करते हैं। इसके बाद श्री विष्णु ने माली को पीठ दिखाकर भाग जाने के लिए विवश कर दिया।
राक्षसराज माली रथहीन हो जाने पर इस प्रकार कूदा, जैसे कोई शेर छलांग लगाकर पर्वत से नीचे उतर आया हो। जिस प्रकार यमराज ने अपनी गदा से शिव पर और इन्द्र ने वज्र से पर्वतों पर प्रहार किया था, ठीक उसी प्रकार माली ने विष्णुजी के वाहन गरुड़ पर अपनी गदा से प्रहार किया। जब माली ने अपनी गदा से गरुड़ पर प्रहार किया तो वह पीड़ा से छटपटा उठे तथा उन्होंने स्वयं युद्ध क्षेत्र से पराड्मुख होकर विष्णुजी को भी विमुख जैसा कर दिया। माली द्वारा गरुड़ सहित श्री विष्णु को युद्ध क्षेत्र से विमुख देखकर राक्षसगण प्रसन्नता से परिपूर्ण होकर जोर- जोर से गरजने लगे, जिसके परिणामस्वरूप भारी शब्द गूंज उठा। राक्षसों की गर्जना सुनकर इन्द्र के छोटे भाई श्री विष्णु क्रोधित होकर गरुड़ की पीठ पर तिरछे हो गए। उन्होंने पराड्मुख होकर माली का वध करने के उद्देश्य से पीछे की ओर मुड़कर अपना सुदर्शन चक्र चला दिया।
तत् सूर्य-मण्डलाभासं स्वभासा भासयन् नभ:ः ।
कालचक्रनिभं चक्र माले: शीर्षमपातयत् ।।262॥।
तच्छिरो राक्षसेन्द्रस्य चक्रोत्कृत्त विभीषणम् ।
पपात् रुधिरोदगारि पुरा राहुशिरो यथा ।।263॥।।
ततः सुरै: सम्प्रह ऐै: सर्वप्राणसमीरित
सिंहनादरवो मुक्त: साधु देवेतिवादिभि: ।।264॥।
मालिनं निहतं दृष्टवा सुमाली माल्यवानपि ।
सबलौ शोकसंतप्तौ लड़कामेव प्रधावितौ ।।265।।
गरुडस्तु समाश्चस्तः सन्निवृत्य यथा पुरा ।
राक्षसान् द्रावयामास पक्षवातेन कोपितः ।।266।।
चक्रकृत्तास्यकमला गदासंचूर्णितोरस: ।
लाडलग्लापितग्रीवा मुसलैर्भिन्न मस्तका: ।।267।।
केचिच्चैवासिना छिन्नास्तथान्ये शरताडिता: ।
नियेतुरम्बात् तूर्ण राक्षसा: सागराम्भसि ।।268।।
सूर्यमण्डल के समान दीप्तिमान और कालचक्र के समान उस सुदर्शन चक्र ने आकाश को
प्रकाशित करते हुए राक्षस माली के मस्तक को काट दिया। राक्षस माली का मस्तक सुदर्शन चक्र द्वारा कटकर ठीक उसी प्रकार पृथ्वी पर गिर पड़ा जिस प्रकार पूर्वकाल में राहु का मस्तक रक्त की धारा गिराता हुआ कटकर गिर गया था। इसके पश्चात् सभी देवतागण प्रसन्न होकर अपनी संपूर्ण शक्ति द्वारा 'धन्य-धन्य” कहने तथा सिंहनाद करने लगे। माली को मरा देखकर माल्यवान् और सुमाली शोक संतप्त तथा भयभीत होकर अपनी राक्षस सेना सहित लड़कापुरी की ओर भाग गए। दूसरी तरफ गरुड़ की पीड़ा भी कम हो गई थी, अतः वह भी वहां लौट आए। फिर क्रोधित होकर अपने पंखों के झोंकों से राक्षस सेना को खदेड़ने लगे। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से अनेक राक्षसों के सिर कट गए थे। गदा के प्रहार से वक्ष: स्थल चूर-चूर हो गए थे। गरुड़ की पूंछ
के प्रहार से गरदनें उड़ गईं तथा मूसलों की मार के कारण मस्तक फट गए। अनेक राक्षसों की तलवारों के टुकड़े-टुकड़े हो गए थे। अनेक राक्षस बाणों के प्रहार द्वारा घायल होकर समुद्र में गिर पड़े।
राक्षसों का नाश
नारायणो<पीषुवराशनीभिर्विदारयामास थरनुर्विमुक्ति: |
नक्तंचरान् धूतविमुक्तकेशान् यथाशनीभि: सतडिन्महाभ्र: ।।269।।
भिन्नातपत्रं पतमानशस्त्रं शरैपध्वस्तविनीतवेषम् ।
विनि:सूतान्त्रं भयलोल नेत्र बल॑ तदुन्मत्ततरं बभूव ।।270।।
सिंहार्दितानामिव कुंजराणाम् निशाचराणां सह कुंजराणाम् |
रवाश्व वेगाश्व सम॑ बभूवु: पुराणसिंहेन विमर्दितानाम् ।।27॥।
ते वार्यमाणा हरिबाणजालै: स्वबाणजालानि समुत्सूजन्तः ।
धावन्ति नक्तं चरकालमेघा वायुप्रणुन्ना इव काल मेघा: ।।272।।
चक्रप्रहारैविनिकृत्तशीर्षा संचूर्णिताड़ा श्व गदाप्रहारै: ।
असिप्रहारैद्धिविधाविभिन्ना: पतन्ति शैला इव राक्षसेन्द्रा: ।273।।
विलम्बमानैर्मणिहार कुण्डलैर्निशाचरैनीलवलाह कोपमै: ।
निषात्यमानैर्ददृशे निरन्तरं निपात्यमानैरिव नीलपर्वतैः ।।274।।
भगवान् श्री विष्णु भी अपने द्वारा छोड़े गए बाणों और अशबनियों द्वारा राक्षसों को विदीर्ण
करने लगे। पीताम्बरधारी श्री विष्णु विद्युन्माला युक्त महामेघ की तरह उन निशाचरों के आकाश में लहराते हुए खुले केशों के बीच सुशोभित हो रहे थे। सारी राक्षस सेना पूर्ण उन्मत्त सी प्रतीत हो रही थी। उन सबकी आंखें चलायमान थीं। जिस प्रकार वेग और सिंहों द्वारा पीड़ित हाथियों के चीत्कार एक साथ प्रकट होते हैं, ठीक उसी प्रकार पुराण-प्रसिद्ध नृसिंह श्री नारायण द्वारा रौंदे गए राक्षस रूपी हाथियों के चीत्कार तथा वेग एक साथ प्रकट हो गए अर्थात् सभी राक्षस चीत्कार करते हुए भागने लगे। जिस प्रकार हवा द्वारा उड़ाए जाने पर वर्षाकालीन मेघ आकाश में भागते दिखाई देते हैं, उसी प्रकार श्री हरि के बाणों द्वारा आवृत निशाचर रूपी काले मेघ अपने बाणों को त्याग कर भाग रहे थे। उन राक्षसों के मस्तक सुर्दशन चक्र के प्रहार से कट गए थे। अंग-प्रत्यड़ गदा के प्रहार से चूर-चूर हो गए थे और तलवार के आघात से उनके शरीर के टुकड़े- टुकड़े हो गए थे। इस प्रकार वे सभी राक्षस पर्वत के समान दिखाई दे रहे थे। कुण्डलों और झूलते हुए मणिमय हारों के साथ गिरे हुए नीले रंग के मेघ तुल्य उन राक्षसों की लाशों से वह युद्ध भूमि पटी पड़ी थी। उन धराशायी राक्षसों की लाशों से वह युद्ध क्षेत्र नील पर्वतों के समान इस प्रकार भर गया था कि उसमें कहीं तिल भर की जगह भी बाकी नहीं थी।
हन्यमाने बले तस्मिन् पद्यनाभेन पृष्ठत: ।
माल्यवान् संनिवृत्तो5थ वेलामेत्य इवार्णव: ।।275।।
सरंक्तनयन: क्रोधाच्चलन्मौलिनिशाचर: ।
पद्यानाभमिदं प्राह वचन पुरुषोत्तमम् ।।276।।
नारायण न जानीषि क्षात्रधर्म पुरातनम् ।
अयुद्धमनसो भीतनस्मान् हंसि यथेतर: ।॥277।। पराड़मुखवधं पापं यः करोति सुरेश्वर । स हन्ता न गतः स्वर्ग लभते पुण्यकर्मणाम् ।।278।। युद्धश्रद्धाथवा ते5स्ति शड्खचक्रगदाधर । अहं स्थितो5स्मि पश्यामि बल॑ दर्शय यत् तव ।।279|। माल्यवन्तं स्थितं दृष्टवा माल्यवन्तामिवाचलम् । उवाच राक्षसेन्द्रं तं देवराजानुजो बली ।।280।। युष्मत्तो भयभीतानां देवानां वै मयाभयम् | राक्षसोत्सादनं दत्त तदेतदनुपाल्यते ।।28॥। प्राणैरपि प्रियं कार्य देवानां हि सदा मया । सो&हं वो निहनिष्यामि रसातलगतानपि ।।282।। देवदेवं ब्रुवाणं तं रक्ताम्बुरुहलोचनम् । शक्त्या विभेद संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रो भुजान्तरे |।283।। श्री विष्णु ने जब राक्षस सेना को मैदान छोड़कर भागता देखा तो उन्होंने उन पर पीछे से प्रहार आरंभ कर दिया। जिस प्रकार महासागर अपने तट तक पहुंच कर वापस लौट आता है, उसी प्रकार यह देखकर माल्यवान् भी उलटा लौट पड़ा। उस राक्षसराज का मुकुट हिल रहा था और उसकी आंखें क्रोध से लाल हो रही थीं। उसने श्री विष्णुजी से यह कहना शुरू किया--हे नारायण! क्या तुम प्राचीन क्षात्र-धर्म के बारे में नहीं जानते, जो तुम युद्ध क्षेत्र से भागने वाले लोगों पर पीछे से प्रहार कर रहे हो? हे सुरेश्वर! युद्ध क्षेत्र से विमुख होने वाले लोगों का वध करना पाप है। जो लोग ऐसा काम करते हैं, वे पुण्य करने वाले लोगों को मिलने वाला स्वर्ग नहीं प्राप्त कर पाते। हे शड़ख, चक्र, गदाधारी! यदि तुम युद्ध ही करना चाहते हो तो लो मैं खड़ा हूं, तुम अपना बल मुझको दिखाओ। माल्यवान् पर्वत के समान राक्षसराज माल्यवान् को खड़ा देखकर इन्द्र के छोटे भाई श्री विष्णु ने उससे इस प्रकार कहा--तुम्हारे दुष्कर्मों के कारण सभी देवता और ऋषि भयभीत हो गए हैं। मैंने उन्हें राक्षमों का संहार करके अभय प्रदान करने का आश्वासन दिया है, अतः मैं अपने वचन का पालन कर रहा हूं। देवताओं एवं ऋषियों आदि के सुख के लिए कार्य करना, मुझे सदैव ही अच्छा लगता है। यदि तुम राक्षसगण भाग कर रसातल में छुप जाओ तो भी मैं तुम्हें वहां आकर अवश्य मार दूंगा। जब लाल कमल की तरह नेत्रों वाले श्री विष्णु यह वाक्य कह रहे थे, तो राक्षसराज माल्यवान् ने क्रोधित होकर अपनी शक्ति के प्रहार से उनका वक्ष:स्थल विदीर्ण कर दिया। माल्यवद्भुजनिर्मुक्ता शक्तिर्घण्टाकृतस्वना । हरेरुरसि बश्राज मेघस्थेव शतह्ददा ।।284।। ततस्तामेव चोत्कृष्य शक्ति शक्तिधरप्रिय: । माल्यवन्तं समुद्दिश्य चिक्षेपाम्बुरुहेक्षण: ।।285।। स्कन्दोत्सृष्टेव सा शक्तिगोविन्दकरनि:सूता । काडक्षन्ती राक्षसं प्रायान्महोल्केवाज्जनाचलम् ।।286।।
सा तस्योरसि विस्तीर्णे हारभारावभासिते ।
आपततद् राक्षसेन्द्रस्य गिरिकूट इवाशनि: ।।287।।
तया भिजन्नतनुत्राण: प्राविशद् विपुलं तम: ।
माल्यवान् पुनराश्वस्तस्तस्थौ गिरिरिवाचल: ।।288।।
ततः कालायसं शूलं कण्टकैर्बहुभिश्चितम् ।
प्रगह्माभ्यहनद् देवं स्तनयोरन्तरे दृढम् ।।289॥।।
तथैव रणरक्तस्तु मुष्टिना वासवानुजम् ।
ताडयित्वा धनुर्मात्रमपक्रान्तो निशाचर: ।।290।।
माल्यवान् द्वारा छोड़ी गई वह शक्ति घण्टे की तरह आवाज करती हुई श्री विष्णु की छाती में
जा लगी तथा मेघ के अड़् में विद्युत की तरह प्रकाशित हो गई। श्री विष्णु ने उस शक्ति को अपनी छाती से बाहर खींचकर माल्यवान् पर ही दे मारा। स्कन्ध शक्ति के समान वह शक्ति श्री विष्णु के हाथ से छूटकर उस राक्षस को अपना लक्ष्य बनाती हुई उस पर इस प्रकार गिरी, जिस प्रकार कोई बड़ी उल्का अज्जनगिरि पर गिरी हो। राक्षसराज के वक्ष:स्थल पर वह शक्ति इस प्रकार गिरी, मानो किसी पर्वत के शिखर पर वज्रपात हुआ हो। माल्यवान् की आंखों के आगे अंधेरा हो गया और उसका कवच विदीर्ण हो गया। परंतु थोड़ी ही देर में वह ठीक होकर शिखर की भांति अविचल भाव से खड़ा हो गया। इसके पश्चात् माल्यवान् ने लोहे के कई कांटों से निर्मित शूल को उठाकर श्री विष्णु के वक्ष के मध्यभाग पर गहरा प्रहार कर दिया। इस प्रकार वह माल्यवान् राक्षस रणमत्त होकर, श्री विष्णु की छाती पर मुक्के का प्रहार करके एक धनुष पीछे हट गया।
पाताल लोक को पलायन
ततोअम्बरे महाउ्छब्द: साधुसाथ्विति चोत्थितः । आहत्य राक्षसो विष्णुं गरुडं चाप्पताडयत् ।।294॥। वैनतेयस्ततः क़ुद्धः पक्षवातेन राक्षसम् ।
व्यपोहद् बलवान वायु: शुष्कपर्णचयं यथा ।।292॥। द्विजेन्द्र पक्षवातेन द्रावितं दृश्य पूर्वजम् |
सुमाली स्वबलै: सार्थ लड़कामभिमुखो ययौ ।।293।। पक्षवातबलोद्धूतो माल्यवानपि राक्षस: ।
स्वबलेन समागंम्य ययौ लड़का हियावृतः ।।294।। एवं ते राक्षसा राम हरिणा कमलेक्षण ।
बहुश: सुंयगे भग्ना हतप्रवरनायका: ।।295।। अशवनुवन्तस्ते विष्णु प्रतियोद्धूं बलार्दिता: ।
त्यक्त्वा लड़का गता वस्तुं पातालं सहपत्नय: ।।296।। सुमालिनं समासाद्य राक्षसं रघुसत्तम |
स्थिता प्रख्यातवीर्यास्ते वंशे सालकटडूकटे ।।297।। ये त्वा निहतास्ते तु पौलस्त्या नाम राक्षसा: ।
सुमाली माल्यवान् माली ये च तेषां पुर: सरा: ।
सर्व एते महाभागा रावणाद् बलत्तरा: ।।298।।
न चान्यो राक्षसान् हन्ता सुरारीन् देवकण्टकान् ।
ऋते नारायणं देवं शड्खचक्र गदाधरम् ।।299।।
भवान् नारायणो देवश्नतुर्बाहु: सनातन: ।
राक्षसान् हन्तुत्पन्नो ह्ृजय्यः प्रभुरव्यय: ।।300।।
नष्टधर्म व्यवस्थानां काले काले प्रजाकर: ।
उत्पद्यते दस्युवधे शरणागतवत्सल: ।।304।।
उस समय राक्षसों ने “धन्य है, धन्य है” का नारा जोर-जोर से लगाया। माल्यवान ने श्री विष्णु पर आघात करने के बाद गरुड़ पर भी हमला किया। तब गरुड़ ने क्रोध में आकर अपने पंखों के झोंके से उस राक्षस को वैसे ही उड़ा डाला, जैसे आंधी सूखे पत्तों के ढेर उड़ा देती है। पक्षिराज गरुड़ के पंखों की हवा से पहले जैसा ही दृश्य उपस्थित हो गया और सुमाली राक्षस सैनिकों को साथ लेकर लड्का नगरी की ओर चला गया। राक्षस माल्यवान् भी गरुड़ के पंखों की हवा के कारण उड़कर अपनी सेना से जा मिला और लड़का की ओर चला गया। है कमल नयन राम! उन राक्षसों का श्री विष्णुजी के साथ कई बार युद्ध हुआ। प्रत्येक बार
सेनानायकों के मारे जाने पर उनको भागना पड़ता था। इस प्रकार वे बलहीन तथा अशक्त होकर श्री विष्णु का सामना नहीं कर पाए। इसके पश्चात् राक्षस लड्कापुरी को छोड़कर अपनी पत्नियों के साथ, पाताल लोक चले गए। हे रघुश्रेष्ठ! वहां उन्होंने शक्तिशाली एवं विख्यात 'सालकटड्कटा” वंश के परम तेजस्वी राक्षस सुमाली के आश्रय में रहने लगे। हे श्रीराम! पुलस्त्य वंश के जिन राक्षसों का आपने वध किया है, उनकी तुलना में माल्यवान्, सुमाली, माली नाम के प्राचीन राक्षस रावण से कहीं अधिक बलवान थे। उन महाबलवान् कण्टक स्वरूप राक्षसों को शंख एवं चक्रधारी श्री विष्णु के अतिरिक्त कोई नहीं मार सकता था। हे राम! वही चार भुजाओं वाले सनातन देव श्री नारायण हैं। हे प्रभ!ु आप तो अविनाशी हैं? राक्षसों का संहार करने के लिए आपने अवतार लिया है। हे शरणागत वत्सल! प्रजा की रक्षा, समय-समय पर नष्ट हुए धर्म की स्थापना तथा दस्युओं का वध करने के लिए आप अवतार लेते आए हैं।
धनाध्यक्ष कुबेर
एषा मया तव नराधिप राक्षसानामुत्पत्तिरद्य सकला यथावत् |
भूयो निबोध रघुसत्तम रावणस्य जन्मप्रभावमतुलं ससुतस्य सर्वम् ।।302॥।
चिरात् सुमाली व्यचरद् रसातलं स राक्षसोविष्णुभयार्दितस्तदा ।
पुत्रैश्न पौजैश्न समन्वितो बली ततस्तु लड्कामवसद् धनेश्वर: ॥।303।।
हे नरेश्वर! इस प्रकार मैंने राक्षसों की उत्पत्ति संबंधी जानकारी आपको ज्यों की त्यों सुना
दी। हे रघुश्रेष्ठ! अब मैं आपको रावण के जन्म, उसके पुत्रों तथा रावण के अतुलनीय प्रभाव के विषय में बताता हूं। सुनिए! भगवान् श्री विष्णु के भय के कारण सुमाली दीर्घकाल तक अपने पुत्र-पौत्रों के साथ रसातल में छुपा रहा। इसी दौरान धनाध्यक्ष कुबेर ने लड़कापुरी को अपना निवास स्थान बना लिया।
कस्यचित् त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षस: ।
रसातलान्मर्त्यलोक॑ सर्व वै विचचार ह ।304।। नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकांचनकुण्डल: ।
कनन््यां दुहितरं गृह विना पद्यामिव श्रियम् ।।305।। राक्षसेन्द्र: स तु तदा विचरन् वै महीतले । तदापश्यत् स गच्छन्तं पुष्पकेण धनेश्वरम् ।306।। गच्छन्तं पितरं द्रष्टं पुलस्यतनयं विभुम् ।
तं दृष्टवामरसंकाशं गच्छन्तं पावकोपमम् ।।307।। रसाललं प्रविष्ट सन्मर्त्यलोकात् सविस्मय: ।
इत्येवं चिन्तयामास राक्षसानां महामति: ।।308|।
किं कृत्वा श्रेय इत्येवं वर्धेमहि कथं वयम् । अथाब्रवीत् सुतां रक्ष: कैकसीं नाम नामतः ।।309।। पुत्रि प्रदानकालो5यं यौवन व्यतिवर्तते । प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरै: प्रतिगृहसे |।30।। त्वत्कृते य वयं सर्वे यन्त्रिता धर्मबुद्धय: ।
त्वं हि सर्वगुणोपेता श्री: साक्षादिव पुत्रिके ।|34॥।
कनन््यपितृत्व दु:खं हि सर्वेषां मानकांक्षिणाम् ।
न ज्ञायते य कः कन्यां वरयेदिति कन्यके ।।342॥।
कुछ समय के पश्चात् सुमाली रसातल से निकलकर विचरण करने हेतु पृथ्वी पर आया। वह
नील-वर्ण के मेघ के समान स्वर्ण कुण्डलों को धारण किए सुशोभित हो रहा था। उसकी पुत्री भी उसके साथ कमल-रहित लक्ष्मी के समान सुशोभित हो रही थी। पृथ्वी पर विचरण करते हुए उसने कुबेर को अपने पुष्पक विमान में जाते हुए देखा। वह अग्नि के समान परम तेजस्वी थे और वायु मार्ग द्वारा देवताओं के समान अपने पिता पुलस्त्य ननन््दन विश्रवा से मिलने जा रहे थे। उन्हें जाता देखकर वह परम बुद्धिमान आश्चर्य चकित हो गया और पुन: पृथ्वीलोक से रसातल में चला गया। वहां पहुंचकर वह इस तरह सोचने लगा--क्या करने से हमारा भला हो सकता है? हम किस प्रकार उन्नति कर सकते हैं? इस बात पर विचार कर उसने अपनी पुत्री कैकसी से कहा--हे पुत्री! तुम्हारे विवाह का उचित समय अब आ गया है। तुम्हारी युवावस्था का समय बीतता जा रहा है। तुम्हारे न कहने के कारण कोई भी वर तुम्हारा वरण नहीं कर पा रहा है। हम राक्षस धर्म- बुद्धि रखने वाले हैं और तुम्हारे लिए योग्य वर की प्राप्ति हेतु चिंतित हैं। तुम सर्वगुण सम्पन्न साक्षात् लक्ष्मी के समान हो। सम्मान वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पुत्री का पिता होना दुःख की 28 है। क्योंकि उसको यह नहीं पता होता कि कौन सा तथा कैसा पुरुष उसकी पुत्री का वरण करेगा।
मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव च दीयते ।
कुलत्रयं सदा कन्या संशये स्थाप्य तिष्ठति ।।33।।
सा त्वं मुनिवरं श्रेष्ठ प्रजापति कुलोद्भवम् ।
भज विक्षवसं पुत्रि पौलस्त्यं वरय स्वयम् ।।34।।
ईदृशास्ते भविष्यन्ति पुत्रा: पुत्रि न संशय: ।
तेजसा भास्करसमो तादृशो<्यं धनेश्वर: ।।35।।
सातु तद् वचन श्रुत्वा कन््यका पितृगौरवात् ।
तत्र गत्वा च सा तस्थौ विश्रवा यत्र तप्यते |।36।।
एतस्मिन्नन्तरे राम पुलस्त्यतनयो द्विज: ।
अन्निहोत्रमुपातिष्ठच्चतुर्थ इव पावक: ।।37।।
अविचिन्त्य तु तां वेलां दारुणं पितृगौरवात् ।
उपसृत्याग्रतस्तस्य चरणाधोमुखी स्थिता ।।38॥।
विलिखन्ती 7 ६५/४ 'छाग्रेण भामिनी ।
सतुतां वीक्ष्य सुश्रोणीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ।39।।
अब्रवीत परमोदारो दीप्यमानां स्वतेजसा ।
भद्रे कस्यासि दुहिता कुतो वा त्वमिहागता ।।320।।
किं कार्य कस्य वा हेतोस्तत्त्वतो ब्रूहि शोभने ।।32॥।
पितृ-कुल, मातृ-कुल और जिस कुल में कन्या को दिया जाता है; उस पति का कुल अर्थात् इन तीनों कुलों में कन्या हमेशा संशय में डाले रखती है। अतः हे पुत्री! तुम प्रजापति के कुल में जन्म लेने वाले मुनि विश्रवा के पास जाकर स्वयं उनका पति के रूप में वरण करो। इस प्रकार तुम्हारे गर्भ से भी वैसे ही पुत्र जन्म लेंगे, जैसे सूर्य की तरह परम तेजस्वी कुबेर हैं। अपने पिता के वचनों को सुनकर एवं उनके गौरव को ध्यान में रखकर वह कन्या उस स्थान
पर जा पहुंची, जहां मुनिश्रेष्ठ विश्रवा तपस्या करते थे। हे राम! उसी समय पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा अग्निहोत्र करने बैठ गए। वह चतुर्थ अग्नि के समान परम तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे। पिता के गौरव को ध्यान में रखते हुए कैकसी ने उस दारुण-वेला का भी कोई ध्यान नहीं दिया। वह कन्या विश्रवा के समीप जाकर, उनके चरण-कमलों पर अपनी दृष्टि लगाए और अंगूठे से भूमि पर बार बार रेखाएं खींचने लगी। पूर्ण चन्द्र के समान मुख वाली, सुन्दर कटि-प्रदेश तथा अपने तेज से दीप्तिमान् उस कन्या को देखकर परम तेजस्वी ऋषि ने कहा--हे भद्रे! तुम किसकी पुत्री हो, तुम कहां से आई हो और तुम्हारा यहां आने का उद्देश्य क्या है? हे शोभने! यह सब मुझे बताओ?
एवमुक्ता तु सा कन्या कृतांजलिरथाब्रवीत् ।
आत्मप्रभावेण मुने ज्ञातुमहसि मे मतम् ।।322।।
किं तु मां विद्धि ब्रह्मर्षे शासनात् पितुरागताम् ।
कैकसी नाम नाम्नाहं शेषं त्वं ज्ञातुमहसि ।।323।।
सतु गत्वा मुनिर्ध्यानं वाक्यमेतदुवाच ह ।
विज्ञातं ते मया भद्रे कारणं यनन््मनोगतम् ।।324॥।
सुताभिलाषो मत्तस्ते मत्तमातड़गामिनि ।
दारुणायां तु वेलायां यस्मात् त्वं मामुपस्थिता ।।325।।
शृणु तस्मात् सुतान् भद्रे याद्शाज्जनयिष्यसि ।
दारुणान् दारुणाकारान् दारुणाभिजनप्रियान् ।।326।।
प्रसविष्यसि सुश्रोणि राक्षसान् क्रूरकर्मण: ।
सातु तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्यांब्रवीद वच: ।।327।।
भगवज्नीदृशान् पुत्रांस्त्वत्तो5हं ब्रह्मवादिन: ।
नेच्छामि सुदुराचारान् प्रसादं कर्तुमहसि ।।328।।
कन्या त्वेवमुक्तस्तु विश्रवा मुनिपुड़रव:ः ।
उवाच कैकसीं भूय: पूर्णेन्दुरिव रोहिणीम् ।।329|।
पश्चिमो यस्तवसुतो भविष्यति शुभानने ।
मम वंशानुरूप: स धर्मात्मा च न संशय: ।।330।।
एवमुक्ता तु सा कन्या राम कालेन केनचित् ।
जनयामास बीभत्सं रक्षोरूपं सुदारुणम् ।।33॥।
दशग्रीवं महादंष्टं नीलांजनचयोपम् |
ताम्रोष्ठ विंशतिभुजं महास्य॑ दीप्तमूर्थजम् ।।332॥।।
तस्मिज्जाते ततस्तस्मिन् सज्वालकवला: शिवा: ।
क्रव्यादाश्चवापसव्यानि मण्डलानि प्रचक्रमु: ।।333।।
मुनि के यह पूछने पर उस कन्या ने कहा--हे मुनिराज! आप अपने मनोबल के प्रभाव से मेरी इच्छा को जान सकते हैं। अतः हे ब्रह्मर्षीी आप यह अवश्य जान लें कि मैं अपने पिता की आज्ञा के कारण यहां पर आई हूं तथा मेरा नाम कैकसी है। बाकी सब आप स्वयं ही जान लेंगे। यह बात सुनकर मुनि श्रेष्ठ कुछ समय तक ध्यानस्थ रहे, तदुपरान्त वह बोले--हे भद्रे! तुम्हारी इच्छा मैंने जान ली है। मतवाले हाथी की चाल जैसी हे मन्दगति वाली! तुम मेरे द्वारा पुत्र पाने की इच्छा लेकर इस दारुण-वेला में यहां पर आई हो। अतः हे भद्रे! सुनो तुम ऐसे पुत्रों को जन्म दोगी जो भयंकर राक्षसों से प्रेम करने वाले तथा भयंकर-विशाल स्वरूप वाले होंगे। हे सुश्रोणि! तुम क्रूरकर्मा असुरों को ही जन्म दोगी। मुनिवर के इन वचनों को सुनकर कैकसी ने उनके चरणों पर अपना मस्तक रखते हुए कहा
>-है भगवन्! आप जैसे परम तेजस्वी-दब्रह्मवेत्ता द्वारा मैं ऐसे दुराचारी-पापी पुत्रों को पाने की इच्छा नहीं रखती, अत: आप मुझ पर कृपा करें। कन्या के यह वाक्य कहने पर मुनि विश्रवा इस तरह बोले, जैसे कोई चन्द्रमा रोहिणी से कुछ कह रहा हो--हे सुन्दर मुख वाली! तुम्हारा जो अंतिम पुत्र होगा, वह मेरे वंश की भांति धर्मात्मा और तपस्वी होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है। मुनिवर द्वारा यह कहे जाने पर कुछ समय के बाद ही कैकसी ने भयंकर, वीभत्स, महाराक्षसी रूप वाले, नीले पर्वत के समान विशालकाय, विकराल दांत, तांबे जैसे होंठ, बीस भुजाओं वाले, दशग्रीव तथा चमकीले केशों वाले पुत्र को जन्म दिया। उसके जन्म लेते ही मांसभक्षी गिद्ध, मुंह में अंगार भरे गीदड़ियां तथा पक्षी आदि उसके चारों ओर घूमने लगे।
दशग्रीव का जन्म
ववर्ष रुधिरं देवो मेघाश्व खननिस्वना: ।
प्रबभौ न च सूर्यो वै महोल्काश्चापतन् भुवि ।।334॥। चकम्पे जगती चैव ववुर्वाता: सुदारुणा: ।
अक्षोभ्य: क्षुभितश्वैव समुद्र: सरितां पति: ।।335।। अथ नामाकरोत् तस्य पितामहसम: पिता । दशग्रीव: प्रसूतो&यं दशग्रीवो भविष्यति ।।336।। तस्य त्वनन्तरं जात: कुम्भकर्णो महाबल: ।
प्रमाणाद् यस्य विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते ||337॥।
तत: शूर्पणखा नाम संजज्ञे विकृतानना ।
विभीषणकश्च धर्मात्मा कैकस्या: पश्चिम: सुत: ।।338।।
तस्मिन् जाते महात्त्वे पुष्पवर्ष पपात ह ।
नभ: स्थाने दुन्दुभयो देवानां प्राणदंस्तथा ।
वाक्यं चैवान्तरिक्षे च साधु साध्विति तत् तदा ।।339|।
तौतु तत्र महारण्ये ववृधाते महौजसौ ।
कुम्भकर्ण दशग्रीवौ लोकोद्वेग करौ तदा ।।340॥।।
कुम्भकर्ण: प्रमत्तस्तु महर्षीन् धर्मवत्सलान् ।
त्रैलोक्ये नित्यासंतुष्टो भक्षयन् विचचार ह ।।344॥।
विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मव्यवस्थित: ।
स्वाध्याय नियताहार उवास विजितेन्द्रिय: ।|342॥।
अथ वैश्रवणो देवस्तत्र कालेन केनचित् |
आगतः पितरं द्रष्ट पुष्पकेण धनेश्वर: ।343॥।।
तं दृष्टवा कैकसी तत्र ज्वलन्तमिव तेजसा ।
आगम्य राक्षसी तत्र दशग्रीवमुवाच ह ।।344॥।
पुत्र वैश्रवर्ण पश्य भ्रातरं तेजसावृतम् ।
भातृभावे समे चापि पश्यात्मानं त्वमीदृशम् ।345।।
दशग्रीव तथा यत्नं कुरुष्वामितविक्रम ।
यथा त्वमपि मे पुत्र भवेर्वैश्रवणोपम: ।।346।।
मातुस्तद् वचन श्रुत्वा दशग्रीव: प्रतापवान् ।
अमर्षमतुलं लेभे प्रतिज्ञां चाकरोत् तदा ।।347।।
सत्य॑ ते प्रति जानामि भ्रातृतुल्योडईधिको5पि वा ।
भविष्याम्योजसा चैव संतापं त्यज हृद्गतम् ।।348॥।
ततः क्रोधेन तैनैव दशग्रीव: सहानुज: ।
चिकीर्षर्दुष्करं कर्म तपसे धृत मानस: ।॥349।।
प्राप्स्यामि तपसा काममिति कृत्वाध्यवस्य च ।
आगच्छदात्मसिद्यर्थ गोकर्णस्याश्रमं शुभम् ।।350।।
स राक्षसस्तत्र सहानुजस्तदा तपश्चचारातुलमुग्रविक्रम: ।
अतोषयच्चापि पितामहं विभुं ददौ स तुष्टश्ष वराज्जयावहान् ।।35॥।
मेघ बहुत भयंकर गर्जना करने लगे, देवतागण रुधिर की वर्षा करने लगे, सूर्य की रोशनी
कम पड़ गई और पृथ्वी पर भयंकर उल्कापात होने लगा। बहुत भयंकर आंधी चलने लगी, पृथ्वी हिलने लगी तथा कभी भी क्षुब्ध न होने वाला समुद्र क्षुब्ध हो गया। उस समय ब्रह्मा के समान तेजस्वी पिता मुनि विश्रवा ने उस बालक का नामकरण करते हुए कहा--यह बालक दशग्रीवाएं लेकर पैदा हुआ है, इसलिए इसका नाम “दशग्रीव” होगा। उसके बाद विशाल एवं महाबलशाली कुम्भकर्ण का जन्म हुआ। उसके जैसे विशाल शरीर वाला उदाहरण कहीं भी नहीं था। उसके बाद विशाल मुख वाली कन्या शूर्पणखा का जन्म हुआ। कैकसी के सबसे अंतिम पुत्र विभीषण
हुए जो धर्मात्मा और दयावान् थे। उस दयालु-महान्-सत्यवान् के जन्म पर आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवताओं की दुन्दुभियां आकाश में बजने लगीं। उसी समय आकाश में “साधु साधु" की आवाज सुनाई देने लगी। दशग्रीव तथा कुम्भकर्ण दोनों ही महाबलशाली एवं परम हा राक्षस तीनों लोकों में उद्बवेग उत्पन्न करने वाले थे। वह उसी वन में आयु-वृद्धि प्राप्त करने लगे।
कुम्भकर्ण बहुत उन्मादी था। वह भूख से व्याकुल होने के कारण तीनों लोकों में घूमता रहता था और ऋषियों को अपना भोजन बनाता था। विभीषण धर्मात्मा थे। वह स्वाध्यायी, नियतआहारी, हमेशा धर्म का पालन करने वाले एवं इन्द्रियजित् थे। कुछ समय बीत जाने पर धर्मात्मा कुबेर अपने पुष्पक विमान में बैठकर अपने पिता को देखने के लिए वहां आए। उन तेज प्रदीप वाले कुबेर को देखकर कैकसी अपने बड़े पुत्र दशग्रीव के पास पहुंच कर बोली--हे पुत्र! तुम अपने परम तेजस्वी भाई वैश्रवण की तरफ देखो। भाई होने के कारण तुम्हें भी इन्हीं की तरह होना चाहिए, परंतु तुम अपने को देखो कि तुम्हारी अवस्था किस प्रकार की है? तुम मेरे पुत्र हो, अतः तुम्हें भी घोर परिश्रम करना चाहिए ताकि कुबेर के समान बन जाओ।
मां के इन वाक््यों को सुनकर दशग्रीव को बहुत बुरा लगा। उसी क्षण उसने प्रतिज्ञा करते हुए कहा--मां! मैं तुम्हारे सामने सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूं कि मैं भी अपने भाई के समान बल्कि उससे बढ़कर परम तेजस्वी और ऐश्वर्यशाली बनूंगा। मैं अपनी सभी मनोकामनाओं को घोर तपस्या करके पूरा करूंगा। यह प्रतिज्ञा करके वह अभीष्ट सिद्धि के लिए गोकर्ण के पवित्र आश्रम पर चला गया। उस महापराक्रमी-परम तेजस्वी दशग्रीव ने अपने भाइयों के साथ घोर तपस्या करना प्रारंभ कर दिया। इसके द्वारा उन्होंने परमपिता ब्रह्मा को संतुष्ट तथा प्रसन्न कर लिया। इससे खुश होकर ब्रह्माजी ने उन्हें वर-विजय लाभ के वरदान प्रदान किए।
कुम्भकर्ण द्वारा घोर तप
अथाब्रवीन्मुनिं राम: कथं ते भ्रातरो वने ।
कीदृशं तु तदा ब्रह्मंंस्तपस्तेपुर्महाबला: ।।352।। अगस्त्यस्त्वब्रवीत तत्र राम॑ सुप्रीतमानसम् ।
तांस्तान् धर्मविधींस्तत्र भ्रातरस्ते समाविशन् ।।353।। कुम्भकर्णस्ततो यत्तो नित्यं धर्मपथे स्थित: ।
तताप ग्रीष्मकाले तु पञ्चाग्नीन् परित: स्थित: ।।354॥। मेघाम्बुसिक्तो वर्षासु वीरासनमसेवत् |
नित्यं च शिशिरे काले जलमध्यप्रतिश्रय: ।।355।। एवं वर्षसहस्राणि दश तस्यापचक्रमुः ।
धर्मे प्रयतमानस्य सत्पथे तिष्ठितस्य च ।।356।। विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मपर: शुचि: ।
पञ्जवर्ष सहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान् ।।357।। समाप्ते नियमे तस्य ननृतुश्चाप्सरोगणा: ।
पपात पुष्पवर्ष च तुष्टवुश्चापि देवता: ।358|।
पजञ्चवर्ष सहस्राणि सूर्य चैवान्ववर्तत । तस्थौ चोर्ध्वशिरोबाहुः स्वाध्याये धृतमानस: ।।359।। एवं विभीषणस्यापि स्वर्गस्थस्येव नन्दने । दशवर्षसहस्राणि गतानि नियतात्मन: ।।360।। यह कथा सुन भगवान् रामचन्द्रजी ने अगस्त्य मुनि से कहा-हे ब्रह्मन! वह तीनों भाई जो महाबली थे, उन्होंने वन में किस प्रकार तपस्या की थी? तब प्रसन्नचित्त वाले अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से कहा--उन तीनों महाबली भाइयों ने अलग-अलग धर्म-विधियों का आश्रय लिया था। कुम्भकर्ण, ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि में, प्रतिदिन धर्म पथ पर आरूढ़ रहकर तपने लगा। वह शीत काल में पानी के भीतर बैठा रहता था, वर्षा ऋतु में वीरासन में बैठा हुआ मेघों के पानी में भीगता रहता था। इस प्रकार धर्म-मार्ग पर स्थित रहकर, सत्पथ पर चलते हुए उसने दस वर्षों तक घोर तपस्या की। धर्मात्मा विभीषण ने पवित्र धर्मपरायण रहकर पांच वर्षों तक एक पांव पर खड़े रहकर तपस्या की। उनका नियम पूर्ण हो जाने पर आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। सभी देवतागण उनकी स्तुति करने लगे। इसके पश्चात् उन्होंने अपनी दोनों बांहों और मुंह को ऊपर उठाकर, स्वाध्याय एवं धैर्यपूर्वक पांच सहस्र वर्षों तक सूर्यदेव की आराधना हा | हा प्रकार उन्होंने अपनी तपस्या के सहस्र दस वर्ष स्वर्ग के नन्दन वन में रहने के समान ता दिया।
रावण को कई वरदान दशवर्षसहस्र॑ तु निराहारो दशाननः । पूर्णे वर्षमहस्रे तु शिरश्नाग्नौ जुहाव सः ।।36॥। एवं वर्ष सहस्नाणि नव तस्यातिचक्रमु: । शिरांसि नव चाप्यस्य प्रविष्टानि हुताशनम् ।।362।। अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिर: ।
छत्तेकामे दशग्रीवे प्राप्तस्तत्र पितामह: ।।363॥। पितामहस्तु सुप्रीतः सार्ध देवैरुपस्थितः ।
तव तावद् दशग्रीव प्रीतो5स्मीत्यभ्यभाषतः ।।364॥। शीघ्र वरय धर्मज्ञ वरो मस्तेडभिकांक्षित: ।
कं ते काम॑ करोम्यद्य न वृथा ते परिश्रम: ।365।। अथाब्रवीद् दशग्रीव: प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
प्रणम्य शिरसा देवं हर्षगद्गदया गिरा ।।366॥।। भगवन् प्राणिनां नित्यं नान्यत्र मरणाद् भशम् । नास्ति मृत्युसम: शत्रुरमत्वमहं वृणे |।367।। एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा दशग्रीवमुवाच ह ।
नास्ति सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष मे ।।368॥। एवमुक्ते तदा राम ब्रह्मणा लोककूर्तणा ।
दशग्रीव उवाचेदं कृताञ्जलिरथाग्रत: ।।369।। सुपर्णनागयक्षाणां दैत्यदानवरक्षसाम् | अवध्योहहं प्रजाध्यक्ष देवतानां च शाश्वत ।370॥। नहि चिन्ता ममान्येषु प्राणिष्वमरशजित । तृणभूता हि ते मन्ये प्राणिनो मानुषादय: ।।37।। एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दशग्रीवेण रक्षसा । उवाच वचन देव: सह दैवे: पितामह: ।।372।। भविष्यत्येवमेतत् ते वचो राक्षसपुड़व । एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामह: ।।373।। शुणु चापि वरो भूयः प्रीतस्येह शुभो मम । हुतानि यानिशीर्षाणि पूर्व मग्नौ त्वयानद्य ।।374।। पुनस्तानि भविष्यन्ति तथैव तव राक्षस । वितरामीह तै सौम्य वरं चान्यं दुरासदम् ।।375।। रावण ने दस सहस्र दस वर्षों तक निराहार रहते हुए कड़ी तपस्या की। रावण प्रत्येक वर्ष के पूरा हो जाने पर अपना एक मस्तक काटकर अग्नि को होम कर देता था। इस प्रकार एक-एक करके नौ हजार वर्ष बीत गए तथा रावण ने अपने नौ मस्तक अग्नि देवता को भेंट कर दिए। दस हजायवें वर्ष के पूरा होने पर जब वह अपना दसवां मस्तक काटकर अग्नि को भेंट चढ़ाने लगा, तभी वहां पितामह ब्रह्माजी अवतरित हुए। अन्य देवताओं सहित पितामह ने अत्यन्त प्रसन्न होकर रावण से कहा--हे दशग्रीव! मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूं। हे धर्मज्ञ! तुम जो वर मांगना चाहते हो, वह शीघ्र ही मांग लो। तुम बोलो कि मैं तुम्हारी किस इच्छा को पूरी करूं? तुम्हारी तपस्या व्यर्थ नहीं जाएगी। यह वचन सुनकर रावण की अन्तरात्मा प्रसन्न हो गई। रावण ने अपना मस्तक झुकाकर पितामह को प्रणाम करते हुए, गद्गद वाणी में हर्ष के साथ कहा-- है पितामह! प्राणियों को मृत्यु के अलावा कोई अन्य भय नहीं होता, अतः मैं अमर होने का वर पाना चाहता हूं क्योंकि मृत्यु की तरह कोई दूसरा भयानक शत्रु नहीं है। रावण के यह कहने पर पितामह उससे इस प्रकार बोले--कभी भी अमर होने का वरदान नहीं दिया जाता, अतः तुम कोई अन्य वरदान मांगो। हे राम! ब्रह्माजी के यह कहने पर दशानन ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा-हे सनातन प्रजापति! नाग, गरुड़, यक्ष, दानव, दैत्य, राक्षस तथा देवताओं के लिए मैं अवध्य हो जाऊं अर्थात् वह मेरा वध न कर पाएं। हे देवपूजित! मुझे औरों की परवाह नहीं है। मनुष्य आदि प्राणियों को तो मैं तिनके के समान समझता हूं। धर्मात्मा-राक्षम दशानन के यह कहने पर अन्य देवताओं सहित ब्रह्माजी बोले-हे राक्षसराज! तुमने जो वर मांगा है, वह पूर्ण होगा। हे राम! यह कहने के बाद ब्रह्माजी ने दशानन से कहा--हे निष्पाप! मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वरदान भी प्रदान करता हूं कि तुमने अपने जिन नौ मस्तकों को अग्नि में होम कर दिए हैं, वे सब मस्तक पुनः पूर्ववत हो जाएंगे। हे सौम्य! इसके अलावा मैं तुम्हें एक अन्य दुर्लभ वरदान प्रदान करता हूं। छन्दसस्तव रूपं च मनसा यद् यथेप्सितम् ।
एवं पितामहोक्तस्य दशाग्रीवस्य रक्षस: ।।376।।
>्अ&
0 ५६ ॥
गा
४2-3 ८ री.
॥॥॥ >-------॥8//॥/ ॥॥॥ तत्ला
अग्नौ हुतानि शीर्षाणि पुनस्तान्युत्थितानि वै ।
एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामह: ।॥377।।
विभीषणमथोवाच वाक्यं लोकपितामह: ।
विभीषणत्वया वत्स धर्मसंहितबुद्धिना ।।378।।
परितुष्टोडस्मि धर्मात्मान् वरं वरय सुव्रत ।
विभीषणस्तु धर्मात्मा वचन प्राह साउजलि: ।।379।।
वृतः सर्वगुणैर्नित्यं चन्द्रमा रश्मिभिर्यथा ।
भगवन् कृतकृत्यो5हं यन्मे लोकगुरु: स्वयम् ।।380।।
प्रीतेन यदि दातव्यो वरो मे शृणु सुव्रत ।
परमापदमतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत् ।।38।।
अशिक्षितं च ब्रह्मास्त्रं भगवन् प्रतिभातु मे ।
याया मे जायते बुद्धिर्येषु येश्वाश्रमेषु च ।382॥।।
सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं धर्म च पालये ।
एष मे परमोदारो वर: परमको मत: ।।383॥।।
नहि धर्माभिरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् |
पुनः प्रजापति: प्रीतो विभीषणमुवाच ह ।।384।।
धर्मिष्ठस्त्वं यथा वत्स तथा चैतद् भविष्यति ।
यस्माद् राक्षस योनौ ते जातस्यामित्रनाशन ।।385।।
नाधर्मे जायते बुद्धिरमरत्वं ददामि ते ।
इव्युक्त्वा कुम्भकर्णाय वरं दातुमवस्थितम् ।।386।।
प्रजापतिं सुरा: सर्वे वाक््यं प्राउजलयोडब्लुवन् ।
न तावत् कुम्भकर्णाय प्रदातव्यो वरस्त्वया |387।।
जीनीषे हि यथा लोकांस्त्रासयत्येष दुर्मति: ।
नन्दने5प्सरस: सप्त महेन्द्रानुचरा दश ।।388॥।
अनेन भक्षिता ब्रह्मनूषयो मानुषास्तथा ।
अलब्धवरश्वण यत् कृतं राक्षसेन तु |389|।
यद्येष वरलब्ध: स्याद् भक्षयेद् भुवनत्रयम् ।
वरव्याजेन मोहो5स्मै दीयताममितप्रभ ।।390।।
तुम अपने मन में जैसा भी रूप चाहोगे, वही रूप धारण कर सकोगे। पितामह के यह कहते ही रावण के वे नौ सिर, जो उसने अग्नि में होम कर दिए थे, पुनः प्रकट हो गए। हे राम! ब्रह्माजी दशानन से यह कहने के उपरान्त विभीषण के पास जा पहुंचे और इस प्रकार बोले--हे वत्स विभीषण! तुम्हारा ध्यान तो धर्म के कार्यों में लगा रहता है। हे धर्मात्मन्! हे सुव्रती! मैं तुमसे प्रसन्न हूं, अतः तुम कोई भी वर मांग सकते हो। पितामह की यह बात सुनकर अपने दोनों हाथ जोड़ कर--जिस प्रकार चन्द्रमा किरणों से
मंडित रहता है, उसी तरह समस्त गुणों से नित्य आवृत विभीषणजी बोले--हे भगवन्! आप लोक गुरु हैं। मैं तो आपके दर्शन पाकर ही धन्य हो गया। यदि आप मुझे कोई वर देना ही चाहते
हैं तो हे सुत्र॒त! आप उसके बारे में सुनिए। बड़ी-से-बड़ी मुश्किल आने पर भी मेरी बुद्धि धर्म के कार्यों में ही लगी रहे। हे भगवन! बिना सीखे ही मुझको ब्रह्मास्त्र का ज्ञान प्राप्त हो जाए। मेरी बुद्धि जिस किसी कार्य के बारे में सोचे, वह कार्य धर्म के क्षेत्र में ही हो और मैं सब धर्मों का पालन करता रहूं। हे परमोदार! मेरे लिए यही वरदान सर्वोत्तम रहेगा। जो लोग धर्म के कार्य में संलग्न रहते हैं, उनके लिए कोई भी कार्य दुर्लभ नहीं होता। यह सुनकर पितामह ब्रह्माजी प्रसन्न होकर विभीषण से पुनः बोले--हे वत्स! तुम धर्मिष्ठ हो अतः तुम जो चाहते हो, वही होगा। हे शत्रु-नाशन्! राक्षस जाति में जन्म लेकर भी तुम्हारा ध्यान धर्म के कार्यों में लगा हुआ है, अतः मैं तुम्हें 'अमरत्व” का वरदान भी देता हूं अर्थात् तुम्हारी कभी मृत्यु नहीं होगी। यह कहने के बाद वह कुम्भकर्ण को वर देने के लिए चले गए। उस समय सभी देवतागणों ने प्रजापति ब्रह्माजी से हाथ जोड़कर कहा--है प्रभो! जब तक आप यह नहीं जान लेते हैं कि यह दुष्ट राक्षस तीनों लोकों को किस प्रकार दुःख दे रहा है, तब तक आप उसको कोई वर नहीं दीजिएगा। इस राक्षस ने नन्दन वन की सात अप्सराओं को, बहुत से ऋषि-मुनियों को तथा देवराज इन्द्र के दस सेवकों को खा लिया है। हे ब्रह्मान! जब इस राक्षस ने बिना कोई वर पाए इतने दुष्ट तथा क्रूर कार्य किए हैं, तो वह वर पाने के उपरान्त तीनों लोकों को नष्ट कर डालेगा। अत: हे परम तेजस्वी देव! आप इसको वरदान के रूप में “मोह' प्रदान करें।
कुम्भकर्ण का दुःखी होना
लोकानां स्वस्ति चैवं स्याद् भवेदस्य च सम्मति: ।
एवमुक्तः सुरैर्ब्रह्माचिन्तयत् पद्ासम्भव: ।।394॥। चिन्तिता चोपतस्थेअस्य पारश्व॑ देवी सरस्वती ।
प्राउ्जलि: सा तु पार्श्वस्था प्राह वाक््यं सरस्वतीम् ।392।। वाणिव्वं राक्षसेन्द्रस्य भव वाग्देवतेप्सिता ।
तथेत्युक्त्वा प्रविष्टा सा प्रजापतिरथाब्रवीत् ।।393।। कुम्भकर्ण महाबाहो वरं वरय यो मतः ।
कुम्भकर्णस्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वचनमत्रवीत् ।।394।। स्वप्तुं वर्षाण्यनेकानि देवदेव ममेप्सितम् ।
एवमस्त्विति त॑ चोक््त्वा प्रायाद् ब्रह्मा सुरै:ः समम् ।।395।। देवी सरस्वती चैव राक्षसं तं जहौ पुनः ।
ब्रह्मणा सह देवेषु गतेषु च नभ: स्थलम् ।।396।। विमुक्तो5सौ सरस्वत्या स्वां संज्ञां च ततो गतः । कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दु:खित: ।।397।। ईदृशं किमिदं वाक््यं ममाद्य वदनाच्च्युतम् ।
अहं व्यामोहितो देवैरिति मन्ये तदागतैः ।।398।।
एवं लब्धवरा: सर्वे भ्रातरो दीप्ततेजस: ।
श्लेष्मांतकवनं गत्वा तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।।399|।
इसी की सम्मति से इसी प्रकार लोकों का कल्याण हो जाएगा। ब्रह्माजी ने देवताओं की यह
बात सुनकर कुछ विचार किया। उनके चिन्तन करने पर देवी सरस्वती उनके पास जा पहुंचीं। सरस्वतीजी ने ब्रह्माजी के पार्श्रभाग में खड़े हो, हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा--हे देव! मैं आ गई हूं, आप मुझे कौन-सा कार्य करने की आज्ञा देते हैं? तब ब्रह्माजी ने सरस्वती से कहा--हे वाणी! तुम राक्षस कुम्भकर्ण की जीभ पर बैठकर उससे देवताओं के मनोनुकूल शब्दों का उच्चारण करवाओ। यह सुनकर वह कुम्भकर्ण की जीभ पर बैठ गईं। तब ब्रह्माजी ने उस दैत्य से कहा-हे
महाबली कुम्भकर्ण! तुम अपने मन के अनुसार वर मांग लो। ब्रह्माजी की बात सुनकर कुम्भकर्ण ने कहा--हे देवाधिदेव! मेरी यह मनोकामना है कि मैं अनेक वर्षों तक निद्रा में लीन रहूं! तब “एवमस्तु” कहकर ब्रह्माजी अन्य देवताओं के साथ वहां से चले गए। उसके बाद सरस्वती ने कुम्भकर्ण को छोड़ दिया। जब सरस्वती कुम्भकर्ण को मुक्त कर चली गईं तो वह दुखी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगा--मेरे मुख से ऐसे वचन कैसे निकल गए? संभवत: ब्रह्माजी के साथ आए अन्य देवताओं ने मुझे भ्रम में डाल दिया था। इस प्रकार वह तीनों भाई ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त करने के पश्चात् श्लेष्मांतक वन अर्थात् लसौड़े के जंगल में चले गए और वहां सुखपूर्वक आवास करने लगे।
सुमाली वरलब्धांस्तु ज्ञात्वा चैतान् निशाचरान् ।
उदितष्ठद्भयं त्यक्त्वा सानुगः स रसातलात् ।।400।।
मारीचश्न प्रहस्तश्च विरूपाक्षो महोदर: ।
उदतिष्ठन् सुसंरब्धा: सचिवास्तस्य रक्षस: ।।40।।
सुमाली सचिवै: सार्ध वृतो राक्षसपुड़वै: ।
अभिगम्य दशग्रीवं परिष्वज्येदमब्रवीत्: ।।402।।
दिष्टया ते वत्स सम्प्राप्तश्चिन्तितो5यं मनोरथः ।
यस्तवं त्रिभुवनश्रेष्ठाल्लब्धवान् वरमुत्तमम् ।403।।
यत्कृते च वयं लड़का त्यक्त्वा याता रसातलम् ।
तदगतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ।।404॥।
असकृद् तदभयाद् भग्ना: परित्यज्य स्वमालयम् |
विद्रुता: सहितासर्वे प्रविष्टा: सम रसातलम् ।।405।।
अस्मदीया च लड़्केयं नगरी राक्षसोषिता ।
निवेशिता तव क्रात्रा धनाध्यक्षेण धीमता ।406।।
यदि नामात्र शक्यं स्यात् साम्ना दानेन वानघ ।
तरसा वा महाबाहो प्रत्यानेतुं कृतं भवेत् ।।407।।
त्वं च लड़केश्वरस्तात भविष्यसि न संशय: ।
त्वया राक्षसवंशो5यं निमग्नो5पि समुद्धृत: ।408॥।
सर्वेषां नः प्रभुश्नेव भविष्यसि महाबल ।
अथाब्रवीद दशग्रीवो मतामहमुपस्थितम् ।।409।।
वित्तेशो गुरुरस्माकं नाहसे वक्तुमीदृशम् ।
साम्नाहि राक्षसेन्द्रेण प्रत्याख्यातो गरीयसा ।।40॥।
सुमाली को जब यह ज्ञात हुआ कि राक्षसों ने वर प्राप्त कर लिया है तो वह सभी भय त्याग
कर अपने अनुचरों सहित रसातल से चला आया। उस राक्षस के चारों ओर सचिव, प्रहस्त, मारीच, महोदर तथा विरुपाक्ष रसातल से बाहर निकल आए। महाबलियों और सचिवों से घिरा हुआ सुमाली दशानन के पास गया तथा उसको अपने गले से लगाकर बोला--हे वत्स! यह बहुत प्रसन्नता की बात है कि तुमने त्रिभुवन श्रेष्ठ ब्रद्माजी से चिरकालीन वांछित मनोरथ वाला वरदान प्राप्त कर लिया। जिस विष्णु के भय के कारण हम सभी राक्षस अपनी लड़का नगरी को छोड़कर रसातल में चले गए थे, वह भय अब दूर हो गया है। हे महाबाहो! विष्णु के भय के कारण हम लोग अपना घर छोड़कर रसातल में चले गए थे। यह लड़का नगरी जिसमें अब तुम्हारे महावीर-बुद्धिमान भाई कुबेर रह रहे हैं, वहां पर पहले हम राक्षस ही रह रहे थे। हे महाबाहो! यदि लड़का को साम, दान या बलपूर्वक वापस लिया जा सके तो हमारी आकांक्षा एवं इच्छाएं पूर्ण होंगी। हे तात! तुम्हीं लड़का के स्वामी बनोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि तुमने ही डूबे हुए राक्षस वंश को विनाश से उबारा है। हे महाबली! तुम्हीं सबके स्वामी बनोगे। यह सुनकर दशानन ने अपने पास खड़े नानाजी से इस प्रकार कहा--धनाध्यक्ष कुबेर हमारे बड़े भाई हैं, अत: उनके विषय में आपको ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। रावण से इस प्रकार का कोरा जवाब पाकर--
किंचिन्नाह तदा रक्षो ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम् ।
कस्यचित् त्वथ कालस्य वसन्तं रावणं ततः ।।4।
उक्तवन्तं तथा वाक््यं दशग्रीवं निशाचर: ।
प्रहस्त: प्रश्चितं वाक्यमिदमाह सकारणम् ।।42॥।
दशग्रीव महाबाहो नार्हसे वक्तुमीदृशम् ।
सौक्षात्र नास्ति शूराणां शुणु चेदं वचो मम ।43॥।
अदितिश्च दितिश्वैव भगिन्यौ सहिते हि ते ।
भार्ये परमरुपिण्यौ कश्यपस्य प्रजापते: ।।44॥।
अदितिर्जनयामास देवांस्त्रिभुवने श्वरान् ।
दितिस्त्वजनयद् दैत्यान् कश्यपस्यात्मसम्भवान् ।।45।।
दैत्यानां किल धर्मज्ञ पुरेयं सवनार्णवा ।
सर्पवता मही वीर ते&भवन् प्रभविष्णव: ।।446।।
निहत्य तांस्तु समरे विष्णुना प्रभविष्णुना ।
देवानां वशमानीतं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ।।47॥।
नैतदेको भवानेव करिष्यति विपर्ययम् ।
सुरासुरैराचरितं तत् कुरुष्व वचो मम ।।48।।
एवमुक्तो दशग्रीव: प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
चिन्तयित्वा मुहूर्त वै बाढमित्येव सो5ब्रवीत् ।।49।।
सतु तेनैव ह्षेण तस्मिन्नहनि वीर्यपान् |
वन॑ गतोदशग्रीव: सह तैः क्षणदाचरै: ।।420।।
सुमाली रावण के मन की बात समझकर चुप हो गया। कुछ समय के पश्चात् उसी स्थान पर
रहते हुए दशानन से सुमाली के मन्त्री प्रहस्त ने विनम्रता पूर्वक यह बात कही--हे महाबाहु दशग्रीव! आपने जो अपने नाना से कहा, आपको वैसा नहीं कहना चाहिए था क्योंकि महाबली पुरुषों में भ्रातृभाव का निर्वाह नहीं किया जाता। आप मेरी बात सुनिए। अदिति और दिति दोनों
ही सगी बहनें हैं तथा यह दोनों सुंदरियां महर्षि कश्यप प्रजापति की पत्नियां हैं। अदिति ने तीनों लोकों के देवताओं को जन्म दिया तथा दिति ने दैत्यों को जन्म दिया है। इस प्रकार दैत्य और देवता दोनों ही महर्षि कश्यप के पुत्र हैं। हे धर्मज्ञ! समुद्र, पर्वत, वन से भरी हुई यह संपूर्ण धरती दैत्यों के ही अधिकार में थी, क्योंकि वे बहुत बलशाली थे। लेकिन शक्तिशाली विष्णु ने उन राक्षसों को युद्ध क्षेत्र में मारकर तीनों लोकों का राज्य देवताओं के अधिकार में दे दिया। इस प्रकार का विपरीत व्यवहार केवल आप ही नहीं करेंगे, देवताओं और दैत्यों ने ऐसे कार्य पहले भी किए हैं। अतः आपको मेरी सलाह मान लेनी चाहिए। दशानन की अन्तरात्मा प्रहस्त के यह कहने पर प्रसन्न हो उठी। कुछ समय विचार करने के बाद उसने कहा--ऐसा ही होगा। इसके पश्चात् दशग्रीव सभी राक्षसों के साथ प्रसन्नतापूर्वक उस वन में जा पहुंचा।
दशानन का संदेश
त्रिकूटस्थ: स तु तदा दशग्रीवो निशाचर: ।
प्रेषयामास दौत्येन प्रहस्तं वाक्यकोीविद्म ।।42॥।
प्रहस्त शीघ्र गच्छ त्वं ब्रूहि नैर््नतपुड़वम ।
वचसा मम वित्तेशं सामश्वमिदं वच: ।।422।।
इयं लड़कापुरी राजन् राक्षासानां महात्मनाम् |
त्वया निवेशिता सौम्य नैतद् युक्त तवानध ।॥423।।
तद् भवान् यदि नो हाद्य दद्यादतुलविक्रम ।
कृता भवेन्मम प्रीतिर्धर्मश्नैवानुपालित: ।।424।।
सतु गत्वा पुरी लड़का धनदेन सुरक्षिताम् |
अब्रवीत् परमोदारं वित्तपालमिदं वच: ।।425।।
प्रेषितो5हं तव भ्राता दशग्रीवेण सुव्रत ।
त्वत्समीपं महाबाहो सर्वशस्त्रभूतां वर ।426।।
तत्छूयतां महाप्राज्ञ सर्वशास्त्र विशारद ।
वचन मम वित्तेश यद् ब्रवीति दशाननः: ।।427।।
इयं किल पुरी रम्या सुमालिप्रमुखै: पुरा ।
भुक्तपूर्वा विशालाक्ष राक्षसैर्भीमविक्रमै: ।।428|।
तेन विज्ञाप्तये सो<्यं साम्प्रतं विश्रवात्मज |
तदेषा दीयतां तात याचतस्तस्य सामत: ।।429।।
प्रहस्तादपि संश्रुत्यं देवो वैश्रवणों वच: ।
प्रत्युवाच प्रहस्तं तं वाक्यं वाक्यविंदा वर: ।॥430॥।
दत्ता ममेयं पित्रा तु लड़का शून्या निशाचरै: ।
निवेशिता च मे रक्षो दानमानादिभिग्गुणै: ।।43॥।
रावण त्रिकूट पर्वत पर पहुंचकर रुक गया तथा उसने प्रहस्त को अपना दूत बनाकर भेजने
का दृढ़ निश्चय किया। उसने कहा-हे प्रहस्त! तुम वहां जाकर कुबेर से विनम्रतापूर्वक मेरा यह संदेश कहो कि हे राजन! यह लड़का नगरी राक्षसों की है। अतः हे सौम्य! हे निष्पाप! आपका
इस स्थान पर निवास करना उचित नहीं है। हे अतुल पराक्रमी! यदि आप सब यह स्थान हम के को वापस कर दें तो हमें बड़ी प्रसन्नता होगी। आपका यह कार्य धर्म का पालन करना सिद्ध गा। प्रहस्त नाम का वह राक्षस कुबेर की उस लड़का पुरी में गया तथा उनसे अत्यन्त उदार वाणी में बोला--हे उत्तमव्रती! हे महाबली! हे समस्त शस्त्रधारियों में सर्वश्रेष्ठ! आपके भाई दशग्रीव ने मुझे आपके पास भेजा है। अतः हे संपूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता! हे महाबाहो! दशानन ने जो कुछ कहलवाया है, उसे आप सुनने की कृपा करें। हे विशालाक्ष! यह लड़कापुरी पूर्वकाल में सुमाली तथा अन्य पराक्रमियों जैसे राक्षसों के अधिकार में थी, अतः हे विश्रवात्मज! उस दशानन ने यह कहा है कि यह जिन लोगों का स्थान है, उन्हें वापस लौटाने की कृपा करें। हमारी यह शान्तिपूर्ण प्रार्थना है। प्रहस्त के मुख से यह बात सुनकर, वाणी के मतलब को समझ लेने वाले वाकुश्रेष्ठ वैश्रवण ने उत्तर दिया--हे राक्षस! जब यह लंका निशाचरों से विलीन थी, उस समय पिताजी ने मुझे यह दी थी और मैंने मान, दान आदि गुणों-प्रयोजनों को उसमें बसाया है। ब्रूहि गच्छ दशग्रीवं पुरी राज्यं च यन्मम | तत्राप्येतन््महाबाहो भुड्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ।।432।। अविभ क्तं त्वया सार्थ राज्यं यच्चापि मे वसु । एवमुक्त्वा धनाध्यक्षो जगाम पितुरन्तिकम् ।।433।। अभिवाद्य गुरु प्राह रावणस्य यदीप्सितम् । एष तात दशशग्रीवो दूत॑ प्रेषितवान् मम ।॥434।। दीयतां नगरी लड़का पूर्व रक्षोगणोषिता । मयात्र यदनुष्ठेयं तनन््ममाचक्ष्व सुव्रत ।।435॥। ब्रह्मर्षिस्त्वेवमुक्तोड्सौ विश्रवा मुनिपुड्गव: । प्राउ्जलिं धनदं प्राह श्रूणु पुत्र वचो मम ।।436।। दशग्रीवो महाबाहुरुक्तवान् मम संनिधौ । मया निर्भिर्त्सित श्वात्पीद् बहुशोक्त: सुदुर्मति: ।437।। स क्रोधेन मया चोक्तो ध्वंससे च पुनः पुनः । श्रेयो&भियुक्तं धर्म्य च शृणु पुत्र वचो मम ।।438।। वरप्रदान सम्मूढो मान्यामान्यं सुदुर्मति: । नवेत्ति मम शापाच्च प्रकृतिं दारुणं गत: ।।439।। तस्माद् गच्छ महाबाहो कैलासं धरणीधरम् । निवेशय निवासार्थ व्यक्त्वा लड़का सहानुग: ।।440।। तुम जाकर दशानन से कहना कि यह लड़का नगरी और राज्य जो कुछ भी मेरा है, वह सब तुम्हारा भी है। तुम इस राज्य तथा नगरी का बिना किसी हिचकिचाहट के प्रयोग कर सकते हो। है भाई! यह मेरा राज्य तथा धन आपसे अलग नहीं है। यह कहने के बाद कुबेर अपने पिता के आश्रम की ओर चल दिए। पिता को प्रणाम करने के बाद उन्होंने रावण की इच्छा को अपने पिता से इस प्रकार कह डाला--हे तात! दशानन ने अपना दूत मेरे पास भेजा था और कहलवाया था कि पूर्वकाल में
राक्षमों का आवास रही लड़का नगरी उनको लौटा दी जाए। हे सुव्रत! आप मुझे यह बताइए कि अब मुझे क्या करना है। तब मुनिश्रेष्ठ विश्रवा ने दोनों हाथ जोड़कर खड़े हुए कुबेर से कहा--हे पुत्र, मेरी बात को सुनो! महाबलशाली दशानन ने मेरे पास आकर भी यह बात कही थी। इसके संबंध में मैंने उसको डांटा भी था तथा बार-बार क्रोधपूर्वक यह भी कहा था कि इसके कारण तुम्हारा विनाश हो जाएगा। अतः हे पुत्र! अब तुम धर्मसम्मत तथा कल्याणप्रद मेरे कहे वचनों को सुनो। वह दुष्ट-पापी वर पाने के बाद बुद्धि से भ्रष्ट हो गया है। अतः: वह कुछ भी समझ नहीं पा रहा है। मेरे शाप के कारण उसकी प्रकृति बहुत क्रूर हो गई है। अतः हे महाबाहो! तुम अपने अन्य भाइयों के साथ लड़का को छोड़कर, कैलाश पर्वत के ऊपर रहने के लिए अन्य नगरी बसा लो।
लंका से प्रस्थान
तत्र मन्दाकिनी रम्या नदीनामुत्तमा नदी ।
काञ्चनै: सूर्यसंकाशै: पड़्कजै: संवृतोदका ।।44॥|।
कुमुदैरुत्पलैश्वैव अन्यैश्वैव सुगन्धिभि: ।
तत्र देवा: सगन्धर्वा: साप्सरोरगकिन्नरा: ।।442।।
विहारशीला: सततं रमन्ते सर्वदाश्रिता: ।
नहि क्षमं तवानेन वैरं धनद रक्षसा ।।443॥।।
जानीषेहि यथानेन लब्ध: परमको वर: ।॥444।।
एवमुक्तो गृहीत्पा तुतद्वच: पितृगौरवात् ।
सदारपुत्र: सामात्य: सवाहनधनोगतः ।॥445॥।
प्रहस्तो5थ दशग्रीवं गत्वा वचनमत्रवीत् ।
प्रहृष्टात्मा महात्मानं सहामात्यं सहानुजम् ।।446।।
शून्या सा नगरी लड़का त्यक्त्वैनां धनदो गत: ।
प्रविश्य तां सहास्माभि: स्वधर्म तत्र पालय ।447।।
एवमुक्तो दशग्रीव: प्रहस्तेन महाबल: ।
विवेश नगरी लड़का भ्रातृभि: सबलानुगै: ।।448।।
धनदेन परित्यक्तां सुविभक्तमहापधाम् ।
आरोरुह स देवारि: स्वर्ग देवाधिपो यथा ।449॥।।
नदियों में श्रेष्ठ मानी जाने वाली मन्दाकिनी नामक नदी वहां पर बहती है। वह स्थान सूर्य की तरह प्रकाशवान्, स्वर्ण कमलों तथा कुमुदों-उत्पलों और अन्य सुगंधित पुष्पों से परिपूर्ण है। वहां अप्सरा, नाग, किन्नर, देवता तथा गन्धर्व आदि विहारशील प्राणी प्रसन्न बने रहते हैं तथा नित्य विचरण करते रहते हैं। हे धनद! उस महाबली राक्षस से शत्रुता करने में तुम परिपूर्ण नहीं हो, क्योंकि तुम जानते हो कि उसे कैसा उत्कृष्ट वरदान प्राप्त हुआ है। यह सुनकर अपने पिता द्वारा कहे गए वचनों को सम्मान देते हुए कुबेर अपनी पत्नी, पुत्र, मन्त्री, धन तथा वाहन आदि को लेकर अपने लड़का निवास स्थान को छोड़कर चले गए। अपने मंत्रियों एवं अनुजों के साथ बैठे हुए दशानन से प्रहस्त ने जाकर कहा--धनाध्यक्ष
कुबेर के लड़का छोड़ जाने के कारण वह नगरी सुनसान पड़ी है, अतः अब आपको हम लोगों
को साथ लेकर वहां रहते हुए धर्म का पालन करना चाहिए। प्रहस्त के यह कहने पर रावण अपने भाइयों तथा अनुयायियों को साथ लेकर लड़का नगरी जा पहुंचा। कुबेर द्वारा परित्यक्त उस नगरी में बड़े-बड़े मार्ग भली-भांति बंटे हुए थे। जिस प्रकार देवराज इन्द्र स्वर्ग की गद्दी पर विराजमान थे, उसी प्रकार उस राक्षस रावण ने भी लड़्कापुरी के सिंहासन पर अपना अधिकार जमा लिया।
रावण का राजतिलक
स चाभिषिक्त: क्षणदाचरैस्तदा निवेशयामास पुरी दशानन: ।
निकामपूर्णा च बभूव सा पुरी निशाचरैनीलबलाहकोपमै: ।॥450॥।
धनेश्वरस्त्वथ पितृवाक्य गौरवान्नवेशयच्छशिविमलेगिरौपुरीम् ।
स्वलंकृतैर्भवनवरैर्षिभूषितां पुरंदर: स्वरिव यथामरावतीम् ।।45|।
तब राक्षसों ने रावण का राजतिलक किया और उसने लड्का नगरी को बसाना प्रारंभ कर
दिया। कुछ ही समय के पश्चात् वह लड्कापुरी मेघों की तरह राक्षसों से भर गई। कुबेर ने अपने पिता की आज्ञा के अनुसार कैलाश पर्वत पर श्रेष्ठ और सजे हुए भवनों वाली “अलकापुरी” नामक नगरी को बसाया, जो इन्द्रनगगरी के समान सुंदर थी।
राक्षसेन्द्रोडभिषिक्तस्तु भ्रातृभि: सहितस्तदा ।
ततः प्रदान॑ राक्षस्या भगिन्या: समचिन्तयत् ।।452॥।
स्वसारं कालकेयाय दानवेन्द्राय राक्षसीम् ।
ददौ शूर्पणखां नाम विद्युज्जिल्वाय राक्षस: ।।453॥।।
अध दत्त्वा स्वयं रक्षो मृगयामटते सम तत् ।
तत्रापश्यत् ततो राम मयं नाम दिते सुतम् ।454।।
कन्यासहायं त॑ दृष्टवा दशग्रीवो निशाचर: ।
अपृच्छत् को भवानेको निर्मनुष्यमृगे वने ।।455॥।
अनया मृगशावाक्ष्या किमर्थ सह तिष्ठसि ।
मयस्तदा ब्रवीद राम पृच्छन्तं तं निशाचरम् ।।456॥।।
श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये यथावृत्तमिदं तव ।
हेमा नामाप्सरास्तात श्रुतपूर्वा यदि त्वया |।457।।
दैवतैर्मम सा दत्ता पौलोमीव शतक्रतोः ।
तस्यां सक्तमना ह्यासं दशवर्षशताम्यहम् ।।458॥।
सा च दैवतकार्येण गता वर्षश्नतुर्दश ।
तस्या: कृते चहेमाया: सर्व हेममयं पुरम् ।।459।।
वज़वैदूर्य चित्र च मायया निर्मितं मया ।
तत्राहमवसं दीनस्तया हीन: सुदु:ःखित: ।।460।।
तस्माद् पुराद् दुहितरं गृहीत्वा वनमागत: ।
इयं ममात्मजा राजंस्तस्या: कुक्षौ विवर्धिता ।46॥।
राज्याभिषेक के बाद राक्षसराज रावण अपने भाइयों के साथ वहां रहने लगा। इसके बाद
उसे अपनी बहन शूर्पणखा के विवाह की चिन्ता हुई। उसने अपनी बहन का विवाह कालका के
पुत्र दानवेन्द्र जिसका नाम विद्युज्जित्व था, के साथ कर दिया। हे राम! विवाह हो जाने के बाद एक दिन रावण शिकार करने के लिए वन में गया। वहां पर उसने दिति के पुत्र मय को देखा। मय के साथ एक सुन्दर कन्या को देखकर रावण ने पूछा--आप कौन हैं जो इस मनुष्य तथा पशु हीन जंगल में रह रहे हैं? इस सुंदर कन्या के साथ आप इस वन में किस उद्देश्य के कारण रह रहे हैं? है राम! रावण के यह पूछे जाने पर मय ने कहा--मैं आपको अपना संपूर्ण वृत्तांत सुनाता हूं। यदि आपने सुना है तो आपको ज्ञात होगा कि स्वर्ग में हेमा नाम की एक अप्सरा है। जैसे पुलोम दानव ने अपनी पुत्री इन्द्र को सौंप दी थी, उसी प्रकार देवताओं ने वह अप्सरा मुझे सौंप दी। उसमें आसक्त होकर मैं उस अप्सरा के साथ एक सहखस्र वर्ष रहा। चौदह वर्ष हो गए वह देवताओं के कार्य हेतु स्वर्ग चली गई। मैंने उसके लिए एक संपूर्ण माया नगरी की स्थापना की है। वह नगरी मेरी माया से निर्मित, मणियों तथा हीरों द्वारा विचित्र शोभा से परिपूर्ण थी। अब तक मैं अपनी पत्नी के वियोग में उसी नगरी में रहा करता था। मैं उसी नगरी को छोड़कर अपनी कन्या के साथ इस वन में चला आया हूं। हे राजन! यह मेरी पुत्री है जो उसी की कोख से जन्मी है।
रावण का विवाह
भर्तारमनया सार्धमस्या: प्राप्तो5स्मि मार्गितुम् | कन्यापितृत्वं दुःखं हि सर्वेषां मानकाड्क्षणाम् ।।462॥। कन्याहि द्वेकुले नित्यं संशये स्थाप्य तिष्ठति ।
पुत्रद्वयं ममाप्यस्यां भार्यायां सम्बभूव ह ।463।। मायावी प्रथमस्तात दुन्दुभिस्तदनन्तर: ।
एवं ते सर्वमाख्यातं यथातथ्येन पृच्छत: ।।464॥।
त्वामिदानीं कथं तात जानीयां को भवानिति ।
एवमुक्तं तु तद् रक्षो विनीतमिदमब्रवीत् ।।465॥।।
अहं पौलस्त्यतनयो दशग्रीवश्च नामतः ।
मुनेर्विश्रवसो यस्तु तृतीयो ब्रह्मणो5भवत् ।।466।।
एवमुक्तस्तदा राम राक्षसेन्द्रेण दानवः ।
महर्षेस्तनयं ज्ञात्वा मयो हर्षमुपागत: ।।467।।
दातुं दुहितरं तस्मै रोचयामास तत्र वै |
करेण तु करं तस्या ग्राहयित्वा मयस्तदा ।।468।।
प्रहसन् प्राछ दैत्येन्द्रो राक्षसेन्द्रमिदं वच: ।
इयं ममात्मजा राजन् हेमयाप्सरसा धृता ।।469।।
कन्या मन्दोदरी नाम: पत्न्यर्थ प्रतिगृह्मताम् ।
बाढमित्येव तं राम दशग्रीवो5 भ्यभाषत ।।470।।
मैं इसके लिए उपयुक्त पति की खोज कर रहा हूं। सम्मान की दृष्टि से कन्या का पिता होना बड़े दुःख की बात है। पुत्री हमेशा दोनों कुलों को संशय में डाले रखती है। मेरी पत्नी ने दो पुत्रों को भी जन्म दिया था। हे तात! उनमें एक का नाम मायावी तथा दूसरे का नाम दुन्दुभि है। तुमने मेरे बारे में जो कुछ पूछा, वो मैंने तुमको बता दिया। हे तात! तुम कौन हो, यह मुझे कैसे पता चलेगा? मय के यह कहने पर राक्षसराज रावण ने विनीत भाव से कहा--मैं पुलस्त्य ऋषि के पुत्र विश्रवा का बेटा हूं। मेरा नाम दशग्रीव है। मुनिश्रेष्ठ पितामह ब्रह्माजी की तीसरी पीढ़ी में जन्मे हैं। है राम! रावण के यह बताने पर वह दानव मय महर्षि विश्रवा के पुत्र से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने उसी समय रावण के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने का निश्चय कर लिया और अपनी पुत्री रावण को सौंप दी। मय मुस्कराते हुए रावण से बोला--हे राजन! यह मेरी पुत्री है, जिसको अप्सरा हेमा ने अपने गर्भ में रखा था। आप “मन्दोदरी” नामक इस कन्या को अपनी हक के रूप में ग्रहण अर्थात् स्वीकार करें। हे राम! रावण ने मय की यह प्रार्थना स्वीकार कर |
प्रज्वाल्य तत्र चैवाग्निमकरोत् पाणि संग्रहम् ।
सहितस्य मयो राम शापाभिज्ञस्तपोधनात् ।।47॥।
विदित्वा तेन सा दत्ता तस्य पैतामहं कुलम् |
अमोघां तस्य शक्ति च प्रददौ परमादभुताम् ।।472॥।।
परेण तपसा लब्धां जछ्निवांल्लक्षमणं यया ।
एवं स कृत्वा दारान वै लड़्काया ईश्वर: प्रभु: ।।473।।
गत्वा तु नगरीं भारये भ्रातृभ्यां समुपाहरत् ।
वैरोचनस्य दौहित्रीं वज़ज्वालेति नामत: 474॥।।
तां भार्या कुम्भकर्णस्य रावण: समकल्पयत् |
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मन: ।।475।।
सरमां नाम धर्मज्ञां लेभे भार्यां विभीषण: ।
तीरे तु सरसो वै तु संजज्ञे मानसस्य हि ।।476।।
सरस्तदा मानसं तु ववृधे जलदागमे ।
मात्रा तु तस्या: कन्याया: स्नेहेनाक्रन्दितं वच: ।।477।।
सरोमा वर्धयस्वेति ततः सा सरमाभवत् ।
एवं ते कृतदारा वै रेमिरे तत्र राक्षसा: ।।478।।
स्वां स्वां भार्यामुपादाय गन्धर्वा इव नन्दने ।
ततो मन्दोदरी पुत्र मेघनादमजीजनत् ।।479|।
सा एष इन्द्रजिन्नाम युष्माभिरभिधीयते ।
जातमात्रेण हि पुरा तेन रावणसूनुना ।।480।।
रुदता सुमहान् मुक्तो नादो जलधरोपम: ।
जडीकृता च सा लड़का तस्य नादेन रावघ ।।48॥।
पिता तस्याकरोन्नाम मेघनाद इति स्वयम् |
सो<वर्धत तदा राम रावणान्तःपुरे शुभे ।।482॥|।
रक्ष्यमाणो वरस्त्रीभिश्छन्न: काष्ठिरिवानल: ।
माता पित्रोर्महाहर्ष जनयन् रावणात्मज: ।।483॥।
वहीं पर अग्नि प्रजजलित करके मन्दोदरी का विवाह कर दिया। हे राम! मय दानव उस श्राप
से परिचित था जो विश्रवा ने रावण को दिया था। फिर भी उसने अपनी कन्या रावण को ब्रह्मा के कुल में उत्पन्न हुआ जानकर दे दी। साथ में उसने अपनी तपस्या द्वारा प्राप्त एक भयंकर शक्ति भी प्रदान कर दी जिसे बाद में उसने उसे लक्ष्मण पर चलाया था। इस प्रकार अपनी पत्नी को प्राप्त कर लड़्केश्वर अपनी नगरी में लौट आया और साथ में वह अपने भाइयों के लिए भी दो स्त्रियों का अपहरण कर लाया। वैरोचन नामक दैत्य की वज्रज्वाला नाम की दौहित्री थी। रावण ने उसे कुम्भकर्ण की पत्नी बनाया और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या 'सरमा' जो धर्म को जानने वाली थी, को विभीषण की पत्नी बनाया। वह कन्या मानसरोवर के तट पर उत्पन्न हुई थी। वर्षाऋतु के कारण उसके जन्म के समय मानसरोवर में जल का स्तर बढ़ने लगा था। उसकी माता ने उस समय अपनी पुत्री को रोता हुआ देखकर, मानसरोवर से यह कहना चाहा-- 'सरो मा वर्धयस्व” अर्थात्--है सरोवर! तुम अपने जल का स्तर मत बढ़ाओ! लेकिन वह जल्दी में 'सरःमा' कह गई, इसीलिए उसका नाम 'सरमा' पड़ गया। वे तीनों भाई अपनी पत्नियों के साथ कुशलतापूर्वक रहने लगे। जैसे गन्धर्व नन्दन वन में विहार करते थे, उसी तरह वह तीनों भाई भी लड़्कानगरी में अपनी पत्नियों के साथ विहार करने लगे। इसके पश्चात् मन्दोदरी ने पुत्र मेघनाद को जन्म दिया, जिसको हम सब “इन्द्रजीत' के नाम से भी जानते हैं। रावण के उस पुत्र ने जन्म लेने के साथ ही बादलों के समान भयंकर शब्द किया था। हे राघव! उस आवाज को सुनकर संपूर्ण लड़्कापुरी स्तब्ध हो गई। तब उसके पिता रावण ने स्वयं ही उसका नाम “मेघनाद” रख दिया। हे राम! रावण का वह बालक रावण के सुंदर अन्तःपुर में बढ़ने लगा। रावण का वह पुत्र श्रेष्ठ स्त्रियों से इस प्रकार सुरक्षित रहता था, जैसे काष्ठ के अंदर अग्नि सुरक्षित रहती है। उस पुत्र का जन्म होने से उसके माता-पिता को अत्यधिक प्रसन्नता प्राप्त हुई।
कुम्भकरण निद्रा में अभिभूत
अथ लोकेश्चरोत्सृष्टा तत्र कालेन केनचित् ।
निद्रा समभवत् तीव्रा कुम्भकर्णस्य रुपिणी ।484।।
ततो भ्रातरमासीनं कुम्भकर्णो5ब्रवीद बच: ।
निद्रा मां बाधते राजन् कारयस्व ममालयम् ।।485॥।
विनियुक्तास्ततो राज्ञा शिल्पिनो विश्वकर्मवत् |
विस्तीर्ण योजन स्तिग्धं॑ ततो द्विगुणमायतम् ।।486।।
दर्शनीयं निराबाध॑ कुम्भकर्णस्य चक्रिरे
स्फाटिकै: काउ्चनैश्रित्रै: स्तम्भै: सर्वत्रशोभितम् ।।487।।
वैदूर्यकृतसोपानं किडुकिणीजालकं तथा ।
दान्ततोरणविन्न्यस्तं वजस्फटिकवेदिकम् ।।488॥।।
मनोहरं सर्वसुखं कारयामास राक्षस: ।
सर्वत्र सुखदं नित्यं मेरो: पुण्यां गुहामिव ।।489।।
तत्र निद्रां समाविष्ट: कुम्भकर्णों महाबलः ।
बहून्यव्दसहस्राणि शयानो न च बुध्यते |।490।।
निद्राभिभूते तु तदा कुम्भकर्णे दशानन: ।
देवर्षियक्षगन्धर्वान् संजघ्ने हि निरड्कुश: ।49॥।।
उद्यानानि विचित्राणि नन्दनादीनि यानि च |
तानि गत्वा सुसंक़रुद्धो भिनत्ति सम दशाननः: ।।492।।
नदींगज इव क्रीडन् वृक्षान् वायुरिव क्षिपन् ।
नगान् वज्र इवोत्सृष्टो विध्वंसयति राक्षस: ।।493।।
तथावृतं तु विज्ञाय दशग्रीवं धनेश्वर: ।
कुलानुरूपं धमरज्ञों वृतं संस्मृत्य चात्मन: ।।494।।
कुछ समय के पश्चात् पितामह ब्रह्मा के वरदान द्वारा उत्पन्न निद्रा तीव्र वेग से कुम्भकर्ण के
शरीर में उत्पन्न हुई। उस समय अपने पास बैठे हुए रावण से कुम्भकर्ण ने कहा--है राजन! मुझे नींद आ रही है, अत: आप मेरे लिए शयन-गृह का निर्माण करवाएं। यह सुनकर रावण ने विश्वकर्मा के समान कुशल कारीगरों को इस कार्य में लगा दिया। उन्होंने मिलकर दो योजन लंबा और एक योजन चौड़ा चिकना शयनगृह का निर्माण कर दिया जो देखने योग्य था। कुम्भकर्ण के सोने के लिए वह हर प्रकार से बाधाओं से परे था। उसमें स्वर्ण निर्मित तथा सर्वत्र स्फटिक स्तंभ सुशोभित थे। उसके अंदर घुंघरुओं वाली झालरें और नीलम-निर्मित सीढ़ियां थीं। उसके तोरण द्वार हाथी के थे। हीरे और स्फटिक मणि के चबूतरे थे। राक्षसों ने उसे सब प्रकार से सुखदायक और मनोहर बनाया था। वह सुमेरु पर्वत की पुण्यमयी गुफा की भांति सर्वत्र एवं नित्य सुखप्रद था। महाबली कुम्कर्ण (कुम्भकर्ण) उस स्थान पर जाकर सो गया। वह निरंतर कई सहस्र वर्षों तक सोता रहा और जागा नहीं। जब कुम्भकर्ण निद्रा में अभिभूत हो गया, तो उस समय रावण निरंकुश बनकर ऋषि, देवता, यक्ष एवं गन्धर्वों को कष्ट पहुंचाने लगा। रावण क्रोधित होकर नन्दन तथा देवताओं के उद्यानों में पहुंचकर उन्हें उजाड़ दिया करता था। वह दुष्ट-पापी राक्षस नदियों में हाथी के समान क्रीड़ा करता था। पर्वतों को इन्द्र द्वारा छोड़े गए वज्र की भांति तोड़ देता था तथा पेड़ों को वायु के समान उखाड़ देता था। रावण द्वारा किए गए इन अत्याचारों का
समाचार पाकर धर्मज्ञ कुबेर ने अपने स्वयं के कुल के अनुरूप व्यवहार का स्मरण करके--
सौक्षात्रदर्शनार्थ तु दूतं वैश्रवणस्तदा ।
लड़का सम्प्रेषयामास दशग्रीवस्य वै हितम् ।।495।।
स गत्वा नगरीं लड़कामाससाद विभीषणम् ।
मानितंस्तेन धर्मेण पृष्टक्षागमनं प्रति ।496।।
पृष्टवा च कुशल राज्ञो ज्ञातीनां च विभीषण: ।
सभायां दर्शयामास तमासीनं दशाननम् ।।497।।
स दृष्ट्वा तत्र राजानं॑ दीप्यमानं स्वतेजसा ।
जयेति वाचा सम्पूज्य तूष्णीं समभिवर्तत ।।498।।
स तत्रोत्तमपर्यड्के वरास्तरण शोभिते ।
उपविष्टं दशग्रीवं दूतो वाक्यमथाब्रवीत् ।।499।।
राजन् वदामि ते सर्व भ्राता तव यद ब्रवीत् |
उभयो: सदृशं वीर वृत्तस्य च कुलस्य च ।।500।।
रावण का हित करने की इच्छा से लड़्कापुरी में अपने एक दूत को भातृप्रेम का परिचय देने
हेतु भेजा। उस दूत ने लड़कानगरी में पहले पहुंचकर विभीषण से मुलाकात की। विभीषण ने धर्म के अनुसार उसका आदर-सत्कार किया तथा बाद में उससे वहां आने का कारण पूछा। फिर वह उससे अपने परिवार जनों की कुशलता का समाचार पूछ उसे राज्यसभा में लेकर जा पहुंचे और उसे वहां पर बैठे हुए रावण से मिलवाया। दूत ने देखा कि वह राक्षसेन्दु रावण अपने तेज से दीप्तिमान हो रहा है। महाराज की “जय हो” कहने के बाद, वह दूत रावण के सामने काफी समय तक मौन खड़ा रहा। फिर अपने आसन के उत्तम बिछौने पर बैठे हुए दशानन से उस दूत ने कहा >है राजन! आपके भाई ने जो कहलवाया है, अब वह मैं आपको बताता हूं--वीरों के कुलाचार तथा कर्तव्य, हम दोनों के लिए समान रूप से उपयुक्त हैं।
धर्मपालन की शिक्षा
साधु पर्याप्तमेतावत् कृत्यश्षारित्रसंग्रह ।
साधु धर्मे व्यवस्थानं क्रियतां यदि शक््यते ।।504॥। दृष्टं मे नन्दनं भग्नमृषयो निहता: श्रुता: ।
देवतानां समुद्योगस्त्वत्तो राजन् मया श्रुतः |।502।। निराकृतश्च बहुशस्त्वयाहं राक्षसाधिप ।
सापराधो&पि बालो हि रक्षितव्य: स्वबान्धवै: ।।503॥। अहं तु हिमवत्पृष्ठं गतो धर्ममुपासितुम् ।
रौद्रं ब्रतं समास्थाय नियतो नियतेन्द्रिय: |॥504।। तत्र देवोमया दृष्ट उमया सहित: प्रभु: ।
सव्यं चक्षुर्मया दैवात् तत्र देव्यां निपातितम् ।।505॥। कान्वेषेति महाराज न खल्वन्येन हेतुना ।
रूप॑ चानुपमं कृत्वा रुद्राणी तत्र तिष्ठति |।506।।
देव्यादिव्य प्रभावेण दग्धं सव्यं ममेक्षणम् ।
रेणुध्वस्तामिव ज्योति: पिड्लत्वमुपागतम् ।507।।
ततो5हमन्यद् विस्तीर्ण गत्वा तस्य गिरेस्तटम् ।
तृष्णीं वर्षशतान्यष्टौ समधारं महाव्रतम् ।508।।
समाप्ते नियमे तस्मिंस्तत्र देवो महेश्वर: ।
ततः प्रीतेन मनसा प्राह वाक्यमिदं प्रभु: ।509॥।
प्रीतो5स्मि तप धर्मज्ञ तपासानेन सुव्रत ।
मया चैतद् व्रतं चीर्ण त्वया चैव धनाधिप: ।॥50॥।
हे साधु! तुमने जो अब तक कार्य किए हैं, उतने ही बहुत हैं। अब तुम्हें धर्म का पालन करना चाहिए। यदि तुम धर्म का पालन कर सके हो तो, वही करो। तुमने अनेक ऋषियों को मार डाला है तथा तुमने नन्न्दन वन को उजाड़ दिया है, यह मैंने अपनी आंखों से देखा है। हे राजन! मैंने यह बात सुनी है कि देवतागण तुमसे बदला लेना चाहते हैं। तुमने कई बार मेरा भी अपमान किया है। लेकिन अपराध करने पर भी मैं तुम्हारी रक्षा करता हूं अर्थात् बन्धु-बान्धवों को अपने छोटे बालकों की रक्षा करनी चाहिए। इसलिए मैं तुम्हें यह उपदेश दे रहा हूं, जो तुम्हारे हित में है। मैं हिमालय की चोटी पर जितेन्द्रिय होकर भी “रौद्रव्रत” की सम्पन्नता और धर्माचरण करने के लिए गया था। वहां मैंने प्रभु महादेवी सहित उमा भगवतीजी के दर्शन किए। उस समय अचानक मेरी बाईं नजर भगवती पार्वती पर जा पड़ी। हे महाराज! मैं तो केवल यह जानना चाहता हूं कि मैं कौन हूं? मेरे मन में कोई अशुभ विचार नहीं था। भगवती पार्वती उस समय वहां पर अनुपम रूप धारण किए बैठी थीं। देवी के दिव्य तेज के
कारण मेरी बाईं आंख जल गई और दूसरी आंख धूलि के समान भरी हुई पिड्गलवर्ण की हो गई। उस समय मैंने दूसरे छोर पर जाकर आठ सौ वर्षों तक मौन रहकर उस महान् व्रत को धारण किया। उस व्रत के पूरा होने पर भगवान् शिव प्रकट हुए और मुझ पर अपनी प्रसन्नता प्रदर्शित करते हुए बोले--हे धर्मज्ञ, धनेश्वर! हे सुव्रत! मैं तुम्हारी घोर तपस्या से प्रसन्न हूं। इस व्रत का पालन पहली बार मैंने किया था तथा मेरे बाद तुमने किया है।
तृतीय: पुरुषो नास्ति यश्चरेद् ्रतमीदृशम् ।
व्रतं सुदुष्करं होतन्मयैवोत्पादितं पुरा ।5।।
तत्सखित्वं मया सौम्य रोचयस्व धनेश्वर ।
तपसा निर्जितश्वैव सखा भष ममानघ ।।52॥।
देव्या दग्ध॑ प्रभावेण यच्च सव्यं तवेक्षणम् ।
पैड़ल्यं यदवाप्तं हि देव्या रूप निरीक्षणात् ।।53।।
एकाक्षपिड़ली त्येव नाम स्थास्यति शाश्वतम् ।
एवं तेन सखित्वं च प्राप्यनुज्ञां च शड़करात् ।54॥।
आगतेन मया चैवंश्रुतस्ते पापनिश्चय: ।
तदधर्मिष्ठ संयोगान्निवर्त कुल दूषणात् ।।55॥।
चिन्त्यन्ते हि बधोपाय: सर्षिसड्चै: सुरैस्तव ।
एवमुक्तो दशग्रीव: कोपसंरक्तलोचन: ।।56।।
हस्तान् दन्तांश्व॒ सम्पिष्य वाक्यमेतदुवाच ह ।
विज्ञातं ते मया दूत वाक्य यत् त्वं प्रभाषसे ||57।।
नैव त्वमसि नैवासौ क्रात्रा येनासि चोदितः ।
हित॑ नैष ममैतद्धि ब्रवीति धनरक्षक: ।॥58॥।
महेश्वरसरिवत्वं तु मूढ: श्रावयते किल ।
नैवेदं क्षमर्णामे यदेतद् भाषितं त्वया |59॥।
यदेतावन्मया काल दूतं तस्य तु मर्चितम् ।
न हन्तव्यो गुरुज्येष्ठो मयायमिति मनन््यते ।॥520।।
तस्य च्विदानीं श्रुत्वा मे वाक्यमेषा कृता मतिः ।
त्रींललोकानपि जैष्यामि बाहुवीर्यमुपाश्रित: ।।524।।
एतन्मुहूर्तमेवाहं तस्यैकस्य तु वै कृते ।
चतुरो लोकपालांस्तान् नयिष्यामि यमक्षयम् ।।522।।
एवमुक्वातु लड़केशो दूतं खड़ेन जध्निवान् ।
ददौ भक्षयितु होन॑ राक्षसानां दुरात्मनाम् ।।523।।
ततः कृतस्वस्त्ययनो रथमारुह्य रावण: ।
त्रैलेक्यविजयाकांक्षी ययौ यत्र धनेश्वर: ।॥524।।
तीसरा कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो यह व्रत कर सके। मैंने ही इस दुष्कर व्रत को पूर्वकाल में प्रकट किया था। अतः हे धनेश्वर! तुमको अब मेरे साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए। हे अनघ! तुमने मुझको अपनी तपस्या द्वारा जीत लिया है। अब तुमको मेरा मित्र बनना चाहिए। देवी को देखने के कारण उनके प्रभाव से तुम्हारी बाईँ आंख जल गई थी तथा दाईं पिड्लवर्ण हो गई थी। अतः अब तुम्हारा 'एकाक्षपिड्रली” नाम चिरस्थायी होगा। जब मैं शिवजी से मित्रता स्थापित करके तथा उनकी आज्ञा लेकर लौट रहा था, उस समय मैंने तुम्हारे पाप-पुण्य की बात सुनी। अब तुम अपने कुल को कलंकित करने वाले पाप कर्मों का मार्ग छोड़ दो देवतागण, ऋषियों के साथ मिलकर तुम्हारा वध करने का उपाय सोच रहे हैं। दूत के यह कहने पर रावण के नेत्र क्रोध के कारण लाल हो गए। वह अपने दांतों को पीसते
हुए तथा हाथों को मोड़ते हुए बोला--हे दूत! तू जो कुछ कहना चाहता है, उसका मतलब मैं समझ चुका हूं। अब न तो तू ही जीवित बच सकेगा और न ही वह भाई जिसने तुझको यहां भेजा है। वह मूर्ख शिवजी से मित्रता की बात मुझको डराने के लिए कह रहा है। तूने जो कुछ भी यहां कहा है, वह मेरे द्वारा माफ करने योग्य नहीं है। वह सब मेरे लिए असहनीय है। बड़े भाई को मारना नहीं चाहिए--यह बात सोचकर ही मैंने अभी तक कुछ नहीं किया। परंतु अब तेरे मुख द्वारा उनकी बातों को सुनकर मैंने यह निर्णय किया है कि मैं स्वयं अपने ही बल से लोकों पर विजय प्राप्त करूंगा। कुबेर के इसी एक अपराध के कारण मैं अब इसी दशा में चारों लोकपालों को यमलोक में पहुंचा दूंगा। यह कहकर रावण ने अपनी तलवार निकालकर उस दूत के टुकड़े-टुकड़े कर दिए तथा उसका मृत शरीर दुरात्मा राक्षसों को खाने के लिए दे दिया। इसके पश्चात् रावण स्वस्तिवाचन करके तीनों लोकों पर विजय पाने के उद्देश्य से अपने रथ पर बैठकर उस स्थान की दिशा में चल दिया, जहां कुबेर रहते थे।
घमंड में चूर दशानन
ततः स सचिवै: सार्ध॑ षड़्भिननित्यबलोद्धतः ।
महोदर प्रहस्ताभ्यां मारीचशुकसारणै: ।।525।।
धूम्राक्षेण च वीरेणं नित्यं समरगर्द्धिना ।
वृतः सम्प्रययौ श्रीमान् क्रोधाल्लोकान् दहन्निव ।।526।।
पुराणि स नदी: शैलान् वनान्युपवनानि च |
अतिक्रम्य मुहूर्तेन कैलासं गिरिमागमत् ॥527।।
सनिविष्टं गिरौ तस्मिन् राक्षसेन्द्रं निशम्य तु ।
युद्धेप्सुं तं कृतोत्साहं दुरात्मानं समन्त्रिणम् ।।528।।
यक्षा न शेकुः संस्थातुं प्रमुखे तस्य रक्षस: ।
राज्ञो भ्रातेति विज्ञाय गता यत्र धनेश्वर: ।।529।।
ते गत्वा सर्वमाचरव्युर्भ्रातुस्तस्य चिकीर्षितम् ।
अनुज्ञाता ययुहष्टा युद्धाय धनदेन ते ।।530।।
ततो बलानां संक्षोभो व्यवर्धत इवोदधे: ।
तस्य नै#तराजस्य शैलं संचालयन्निव ।।53॥।
ततो युद्ध समभवद् यक्षराक्षससंकुलम् ।
व्यथिताश्चाभवंस्तत्र सचिवा राक्षसस्य ते |।532॥।
सदृष्ट्वा तादृशं सैन्यं दशग्रीवो निशाचर: ।
हर्षनादान् बहून् कृत्वा स क्रोधादभ्यधावत ।॥533॥।
येतु॒ते राक्षसेन्द्रस्य सचिवा घोर विक्रमा: ।
तेषां सहस्रमेकैको यक्षाणां समयोधयत् ।।534॥।
ततो गदाभिमुसलैरसिभि: शक्तितोमरै: ।
हन्यमानो दशग्रीवस्तत्सैन्यं समगाहत ।।535।।
अपने बल के घमंड में हमेशा उद्धत रहने वाला रावण अपने छ: मंत्रियों--प्रहस्त, मारीच, महोदर, सारण, शुक तथा धूम्राक्ष जो हमेशा युद्ध के लिए प्रस्तुत रहते थे--को साथ लेकर चल पड़ा। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह अपनी क्रोध रूपी अग्नि से सबको भस्म कर देगा। वह नदी, पर्वत, वन, उपवन और नगरों को लांघता हुआ कुछ ही क्षणों में कैलाश पर्वत जा पहुंचा। जब यक्षों को यह पता चला कि रावण अपने छः: मन्त्रियों सहित, युद्ध के लिए तैयार होकर कैलाश पर्वत पर आ पहुंचा है, तो वे उस राक्षसराज रावण के समीप और सामने खड़े न हो सके। वे यह जानकर कि रावण हमारे राजा का भाई है, वहां चले गए जहां राजा कुबेर विराजमान थे। वहां पहुंचकर वे उनको रावण का वृत्तांत सुनाने लगे। तब धनेश्वर ने उन्हें युद्ध करने की आज्ञा दे दी। यह सुनकर वे प्रसन्नता में भरकर युद्ध के लिए
चले गए। उस समय कुबेर की सेना समुद्र की तरह क्षुब्ध होकर चल रही थी। उनके चलने के कारण वह पर्वत हिलता-सा लग रहा था। इसके बाद राक्षसों तथा यक्षों में घोर युद्ध हुआ, जिसकी वजह से रावण के सभी मन्त्रीगण व्याकुल हो गए। अपनी सेना की यह हालत देखकर
वह राक्षसराज रावण सिंह की भांति दहाड़ एवं क्रोधित होकर यक्षों की सेना की ओर दौड़ा। रावण के मन्त्रीगण बहुत पराक्रमी थे। उसका एक-एक मंत्री यक्षों के सहख्र-सहस््र सैनिकों से भिड़ गया। उस समय युद्ध क्षेत्र में तलवारों, गदा, मूसल, शक्ति एवं तोमरों की वर्षा हो रही थी। राक्षसराज रावण उन सबको सहता हुआ शत्रुओं की सेना में घुस गया।
स निरुच्छवासवत तत्र वध्यमानो दशानन: ।
वर्षद्भिरिव जीमूतैर्धाराभिरवरुध्यत ।।536।।
न चकार व्यथां चैव यक्षशस्त्रै: समाहतः ।
महीधर इवाम्भोदैर्धाराशत समुक्षित: ।।537।।
स महात्मा समुद्यम्य कालदण्डोपमां गदाम् |
प्रविवेश: ततः सैन्यं नयन् यक्षान् यमक्षयम् ।॥538।।
स कक्षमिव विस्तीर्ण शुष्केन्धनमिवाकुलम् ।
वातेनाग्निरिवादीप्तो यक्षसैन्यं ददाह तत् ।।539॥।
तैस्तु तत्र महामात्यैर्महोदरशुकादिभि: ।
अल्पावशेषास्ते यक्षा: कृता वातैरिवाम्बुदा |।540॥।
केचित् समाहता भग्ना: पतिता: समरे क्षितौ ।
ओए्ांश्व दशनैस्तीक्ष्णरदशन् कुपिता रणे |।54॥।
श्रान्ताश्चान्योन्यमालिड्डच भ्रष्टशस्त्रा रणाजिरे
सीदन्ति च तदा यक्षा: कूला इव जलेन हा ।।542।।
हतानां गच्छतां स्वर्ग युध्यतामथ धावताम् ।
प्रेक्षतमृषिसड्घानां न बभूवान्तरं दिवि ।।543॥।
भग्नास्तु तान् समालक्ष्य यक्षेन्द्रांस्तु महाबलान् ।
धनाध्यक्षो महाबाहु: प्रेषयामास यक्षकान् ।।544।।
एतस्मिन्नन्तरे राम विस्तीर्ण बलवाहनः ।
प्रेषितो न््यपतद् यक्षो नाम्ना संयोधकण्टक: ।॥545।।
वहां पर उसे इतनी मार पड़ी कि वह सांस भी नहीं ले पाया। यक्षों ने मिलकर रावण के भयंकर वेग को रोक दिया। शत्रुओं का आघात होने पर भी रावण को उसी प्रकार कोई कष्ट का अनुभव नहीं हुआ, जिस प्रकार बादलों द्वारा भारी वर्षा करने पर भी पर्वत वहीं खड़ा रहता है। उस महाबलशाली-पराक्रमी रावण ने अपनी कालदण्ड तुल्य गदा उठाकर यक्ष सैनिकों को एक- एक करके यमलोक भेजना प्रारंभ कर दिया। जिस प्रकार वायु से सूखे ईंधन में अग्नि फैलती है, उसी प्रकार रावण ने तिनकों की तरह फैली यक्षों की सेना को जलाना प्रारंभ कर दिया। जिस गा मेघों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार रावण के महामात्यों ने यक्षों की सेना का संहार कर दिया।
इस प्रकार यक्ष बहुत कम संख्या में शेष बचे। अनेक यक्ष अपने प्राण गंवाकर युद्धक्षेत्र में धराशायी हो गए और अनेक अपने होंठों को दांतों से दबाए क्रोधित होकर खड़े रहे। कुछ सैनिकों के शस्त्र टूट गए और वे थककर एक-दूसरे से लिपट कर रह गए। उसके बाद युद्धक्षेत्र में उसी प्रकार गिर पड़े, जिस तरह जल के बहाव के कारण किनारे ध्वस्त हो जाते हैं। मृत्यु पाने के बाद स्वर्ग को जाते हुए, युद्ध करते हुए और युद्ध क्षेत्र से दौड़ते हुए राक्षसों को देखने के लिए आकाश
में ऋषियों के समूह इस प्रकार छा गए कि वहां खड़े होने के लिए जगह तक नहीं रही। महाबली यक्षराज कुबेर ने यक्षों को युद्ध क्षेत्र से भागता देखकर अत्यधिक महाबली यक्षों को युद्ध-क्षेत्र में लड़ने के लिए भेजा। हे राम! इसी समय कुबेर द्वारा भेजा गया 'संयोध कण्टक” नामक महाबली एवं पराक्रमी यक्ष युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचा। उसके साथ बहुत से सैनिक तथा वाहन भी थे।
तेन चक्रेण मारीचो विष्णुनेव रणे हतः ।
पतितो भूतले शैलात् क्षीण पुण्य इव ग्रह: ।।546।।
संसज्ञस्तु मुहूर्तेन स विश्रम्य निशाचर: ।
तं यक्षं योधयामास स च भग्नः प्रद॒ुद्रवे ।।547।।
ततः काञ्चनचित्राड़ वैदूर्यरजतोक्षितम् ।
मार्यादां प्रतिहाराणां तोरणान्तरमाविशत् ।॥548।।
तं तु राजन् दशग्रीवं प्रविशन्तम् निशाचरम् |
सूर्यभानुरिति ख्यातो द्वारपालो न््यवारयत् ।।549॥।
स वार्यमाणो यक्षेण प्रविवेश निशाचर: ।
यदा तु वारितो राम न व्यतिष्ठत् स राक्षस: ।।550॥।
ततस्तोरणमुत्पाट्य तेन यक्षेण ताडित: ।
रुधिरं प्रख्वन् भाति शैलो धातुस्रवैरिव |।55॥।
स शैलशिखराभेण तोरणेन समाहत: ।
जगाम न क्षतिं वीरो वरदानात् स्वयम्भुव: ।।552॥।
तेनैव तोरणेनाथ यक्षस्तेनाभिताडित: ।
ना दृश्यत तदा यक्षो भस्मीकृत तनुस्तदा ।|553॥।
ततः प्रदुद्रुव॒ुः सर्वे दृष्टवा रक्ष: पराक्रमम् ।
ततौ नदीर्गुहाश्वैव विविशुर्भयपीडिता: ।
त्यक्त प्रहरणा: श्रान्ता विवर्णवदनास्तदा ।।554।।
उसने युद्ध क्षेत्र में आते ही विष्णु की तरह मारीच पर चक्र से प्रहार किया। उसके आघात के
कारण वह राक्षस पर्वत से उसी प्रकार गिर पड़ा, जिस तरह एक क्षीण ग्रह पृथ्वी पर गिर जाता है। दो घड़ी विश्राम करने के बाद वह राक्षस पुनः होश में आकर युद्धक्षेत्र में आ गया, जिसे देख वह यक्ष भाग खड़ा हुआ। रावण ने उस कुबेर पुरी में जिसके दरवाजे में नीलम और चांदी जड़े हुए थे तथा जहां द्वारपालों का पहरा था, प्रवेश किया। हे राजन्! जब वह राक्षसराज दशग्रीव उस दरवाजे के भीतर प्रवेश करने लगा तो उसे सूर्यभानु नामक द्वारपाल ने रोका। लेकिन जब वह राक्षस रोकने पर भी नहीं रुका, तो हे राम! उस द्वारपाल यक्ष ने एक खम्बे को उखाड़ कर रावण के ऊपर दे मारा। इस कारण उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा, जिस तरह किसी पर्वत से गेरू मिले जल का झरना बह रहा हो। पर्वत के सपान उस खम्बे के प्रहार से भी उस राक्षस रावण को कुछ नहीं हुआ। यह सब ब्रह्माजी के वरदान का परिणाम था। इसके पश्चात् रावण ने उसी खम्बे से उस द्वारपाल यक्ष को मारा जिसके कारण उसका शरीर चूर-चूर हो गया और उसका चेहरा तक दिखाई नहीं दिया। रावण के इस परम पराक्रम को देखकर यक्षगण भाग गए। कुछ यक्ष भय के कारण नदी में कूद पड़े तथा कुछ पर्वतों की गुफाओं में जा छिपे। सभी ने अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग दिए। उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गई तथा उनका शरीर शिथिल एवं
कमजोर हो गया। यक्षों-असुरों में घमासान युद्ध
ततः स्तांल्लक्ष्य वित्रस्तान् यक्षेन्द्रांश्ष सहस्रश: ।
धनाध्यक्षो महायक्षं माणिभद्रमथाब्रवीत ।।555॥।
रावणं जहि यक्षेन्द्र दुवृत्त पापचेतसम् ।
शरणं भव वीराणां यक्षाणां युद्धशालिनाम् ।556|।
एवमुक्तो महाबाहुर्माणिभद्र: सुदुर्जय: ।
वृतो यक्षसहसैस्तु चतुर्भि: समयोधयत् ।।557॥।
ते गदामुसलप्रासै: शक्तितोमरमुदगरै: ।
अभिष्नन्तस्तदा यक्षा राक्षसान् समुपद्रावन् ।।558।।
कुर्वन्तुस्तुमलं युद्ध चरन्त: श्येनवल्लघु ।
बाढं प्रयच्छ नेच्छामि दीयतामिति भाषिण: ।।559|।
ततो देवा: सगन्धर्वा: ऋषयो ब्रह्मयवादिन: ।
दृष्टवा तत् तुमुल॑ युद्ध परं विस्मपमागमन् ।॥560।।
यक्षाणां तु प्रहस्तेन सहस्न॑ निहतं रणे ।
महोदरेण चानिन्द्यं सहस्रमपरं हतम् ।56॥।।
क़ुद्धेन च तदा राजन् मारीचेन युयुत्सुना ।
निमेषान्तर मात्रेण द्वे सहस्ने निपातिते ।562॥।।
कुबेर ने जब यह देखा कि सहस्र यक्ष भयभीत होकर भाग रहे हैं तो उन्होंने “माणिभद्र'
नामक यक्ष से कहा--हे यक्षराज! पापी और दुवृत्त रावण को मारकर तुम वीर-श्रेष्ठ यक्षों की रक्षा करो। धनाध्यक्ष के यह कहने पर दुर्जेय माणिभद्र चार सहसख्र यक्षों की सेना लेकर युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचा। वे सभी यक्षश्रेष्ठ गदा, प्रास, मूसल, शक्ति, तोमर और मुदगरों का प्रहार करते हुए राक्षसों की सेना पर टूट पड़े। वे गंभीर युद्ध करते हुए बाज की तरह युद्ध क्षेत्र में चारों ओर मंडराने लगे। उनमें से कोई कहता था कि “मैं पीछे हटूंगा नहीं। मैं युद्ध करना चाहता हूं' तथा कोई कहता था “अपने हथियार मुझे दे दो”। ऐसे भयंकर युद्ध को देखकर ब्रह्माजी, देवतागण, ऋषिगण तथा गन्धर्व आदि भी अत्यन्त आश्चर्यचकित रह गए। प्रहस्त नाम के राक्षस ने एक हजार यक्षों को मार डाला। महोदर राक्षस ने हजार यक्षश्रेष्ठों को यमलोक पहुंचा दिया। हे राजन! मारीच नामक राक्षस ने पलक झपकते ही दो सहसर श्रेष्ठ यक्ष योद्धाओं को मार डाला।
क्व च यक्षार्जवं युद्ध क्व च मायाबलाश्रयम् ।
रक्षसां पुरुषव्याप्र तेन ते5भ्यधिका युधि ।।563॥।।
धूम्राक्षेण समागम्य माणिभद्रो महारणे ।
मुसलेनोरसि क्रोधात् ताडितो न च कम्पित: ।564।।
ततो गदां समाबिध्य माणिभटद्रेण राक्षस: ।
धूम्राक्षस्ताडितो मूर्थ्नि विह्नल: स पपात ह ।565॥।
धूम्राक्षं ताडितं दृष्टवा पतितं शोणितोक्षितिम् ।
अभ्यधावत संग्रामे माणिभद्रं दशानन: ।॥566॥।
संक़ुद्धमभिधावन्तं माणिभद्रो दशाननम् ।
शक्तिभिस्ताडयामास तिसभिर्यक्षपुड़व: ।।567॥।
ताडितो माणिभद्रस्य मुकुटे प्राहरद् रणे ।
तस्य तेन प्रहारेण मुकुट पार्श्नमागतम् 568॥।
हे पुरुषसिंह! कहां तो यक्षों का सामान्य युद्ध और कहां यह राक्षसों का माया युद्ध? अतः वे
राक्षस अपनी माया शक्ति के कारण यक्ष योद्धाओं से अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुए। इस भयंकर महायुद्ध में 'धूप्राक्ष' राक्षस ने क्रोध में आकर माणिभद्र की छाती पर मूसल से गहरा प्रहार किया, लेकिन वह उससे तनिक विचलित नहीं हुए। इसके बाद माणिभद्र ने अपनी गदा उठाकर घुमाते हुए धूम्राक्ष के मस्तक पर दे मारी, जिसके प्रहार से वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। धूम्राक्ष को गदा का प्रहार खाकर पृथ्वी पर खून से लथपथ गिरा देखकर वह दशग्रीव रावण क्रोधित हो उठा। उसने माणिभद्र पर धावा बोल दिया। रावण को क्रोध से आग-बबूला देखकर माणिभद्र ने रावण के ऊपर तीन घोर शक्तियों का गहरा आघात किया। उस प्रहार की चोट खाकर रावण ने युद्धक्षेत्र में माणिभद्र के मुकुट पर गहरा प्रहार किया, जिसके कारण उसका मुकुट खिसककर एक तरफ हो गया।
रावण को उपदेश
ततः प्रभृति यक्षो3सौ पारश्चमौलिरभूत् किल ।
तसिस्तुं विमुखी भूते माणिभद्रे महात्मनि ।|569॥।
संनाद: सुमहान् राजं॑स्तस्मिन् शैले व्यवर्धत् ।।570॥।।
ततो दूरात् प्रददृशे धनाध्यक्षो गदाधर: ।
शुक्रप्रौष्ठपदाभ्यां च पद्मशड्खसमावृत: ।॥57॥।
सदृष्टवा क्रातरं संख्ये शापाद् विश्रष्टगौरवम् ।
उवाच वचन धीमान् युक्त पैतामहे कुले |572।।
यन्मया वार्यमाणस्त्वं नावगच्छसि दुर्मते: ।
पश्चादस्य फल प्राप्य ज्ञास्यते निरयं गत: |।573॥।
योहि मोहाद् विषं पीत्वा नावगच्छति दुर्मति: ।
स तस्य परिणामान्ते जानीते कर्मण: फलम् ।।574।।
दैवतानि च नन्दन्ति धर्मयुक्तेन केनचित् ।
येन त्वमीदृशं भावं नीतस्तच्च न बुद्धयसे |।575।।
मातरं पितरं विप्रमाचार्य चावमन्यते ।
स पश्यति फल तस्य प्रेतराज वशं गत: ।576।।
तभी से वह यक्ष माणिभद्र 'पारश्वमौलि” के नाम से सुप्रसिद्ध हुए। कुछ समय के पश्चात् वह
महात्मा माणिभद्र भी युद्ध स्थल से भाग खड़े हुए। उस समय उस पर्वत पर हे राजन! राक्षसों की गर्जना चारों तरफ फैल गई। उसी क्षण गदाधारी कुबेर दूर से आते हुए दिखाई दिए। उनके साथ प्रौष्ूधद, शुक्र और शड़ख नाम के योद्धा तथा मंत्री थे। ऋषि-मुनि के शाप के कारण शिष्टाचार
रहित भाई रावण को देखकर कुबेर ने अपने पिता के गौरव के अनुरूप रावण से इस प्रकार के शब्द कहे-हे दुर्बुद्धि! मेरे बार-बार मना किए जाने पर भी तुम नहीं मान रहे हो। जब आगे चलकर, तुम इन दुष्ट कर्मों के कारण नर्क में जाओगे, उस समय तुम्हें मेरी बात समझ में आएगी। जो दुष्ट बुद्धि वाला मोहवश विष पीकर भी उसे नहीं समझता, लेकिन उसका परिणाम सामने आने पर अपना कर्म-फल जान जाता है। तुम भले ही समझते हो कि तुम धर्म का पालन कर रहे हो, लेकिन तुम्हारे इन कर्मों से देवतागण प्रसन्न नहीं हैं--यह बात तुम्हारी समझ में नहीं आ रही है। जो व्यक्ति देवता, अपने माता-पिता, आचार्य, ब्राह्मण आदि का अनादर करता है, वह यमराज को वशीभूत हो उसका फल भी भोगता है।
अध्रुवे हि शरीरे यो न करोति तपोरर्जनम् |
स पश्चात् तप्यते मूढो मृतो गत्वा$5त्मनो गतिम् 577।।
धर्माद् राज्यं धनंसौख्यंमधर्माद् दुःखमेव च ।
तस्माद् धर्म सुखार्थाय कुर्यात् पापं विसर्जयेत् ।।578॥।
पापस्यहि फल दु:खं तद् भोक्तव्यमिहात्मना ।
तस्मादात्मापघातार्थ मूढ: पापं करिष्यति ।।579|।
कस्यचित्नह हि दुर्बुद्धेश्छन्दतो जायते मति: ।
यादृशं कुरुते कर्म तादृश॑ फलमश्ुते ||580।।
ऋच्द्धि रूप॑ बल॑ पुत्रान् वित्तं शूरत्वमेव च ।
प्राप्रुवन्ति नरा लोके निर्जितं पुण्यकर्मभि: ।।58॥।
एवं निरयगामी त्वं यस्य ते मतिरीदृशी ।
न त्वां समभिभाषिष्येडसदवृत्तेष्वेव निर्णय: ।।582॥।
एवमुक्तास्ततस्तेन तस्यामात्या: समाहता: ।
मारीचप्रमुखा: सर्वे विमुखा विप्रदुद्रुवु: ॥।583॥।
ततस्तेन दशग्रीवो यक्षेन्द्रेण महात्मना ।
गदयाभिहतो मूर्थ्नि न च स्यानात् प्रकम्पित: ।।584॥।
ततस्तौ राम निष्नन्तौ तदान्योन्यं महामृथे ।
न विह्नलो न च श्रान्तौ तावुभौ यक्षराक्षसौ |।585।।
जो व्यक्ति इस समय अपने शरीर को तप का उपार्जन नहीं करता, वह मूर्ख व्यक्ति अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने द्वारा किए गए पापों-दुष्कर्मों के फल प्राप्त कर पछताता है। राज्य, धन तथा सुख की प्राप्ति धर्म के कार्यों से होती है। अधर्म के कार्यों से केवल दुःख ही प्राप्त होता है। अतः सुख प्राप्त करने के लिए अधर्म एवं पाप के मार्ग को त्याग कर, धर्म के क्षेत्र को अपनाना होता है। दुष्कर्मों का परिणाम दुःख ही है और उसे स्वयं को ही भोगना पड़ता है। अतः जो व्यक्ति पाप तथा दुष्कर्म करता है, मानो वह कोई आत्मघात करता है। किसी भी दुर्बुद्धि वाले व्यक्ति को केवल अपनी इच्छा से ही उत्तम बुद्धि प्राप्त नहीं होती। वह जैसा काम करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। मनुष्य अपने द्वारा किए गए पुण्य कर्मों से ही बल, रूप, समृद्धि, पुत्र, धन तथा शौर्य आदि प्राप्त करता है। अतः यदि तुम ऐसे ही कार्य करते रहे तो तुम्हें नरक में जाने को स्थान मिलेगा। कुबेर बोले--शास्त्रों का यह कहना है कि दुष्ट लोगों से बात तक नहीं करनी चाहिए, अतः मैं
तुमसे अब कुछ भी नहीं कहूंगा। इसी प्रकार की बातें कुबेर ने रावण के मंत्रियों से कहीं और इसके बाद उन पर शस्त्रों से घोर आधात किया। तब मारीच तथा अन्य सभी राक्षस युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुए। महात्मा कुबेर ने राक्षसराज रावण पर गदा से प्रहार किया, लेकिन वह आघात खाने पर हिला तक नहीं। हे श्रीराम! परंतु उनमें एक दूसरे के साथ भयंकर युद्ध हुआ। दोनों एक- दूसरे पर भयंकर प्रहार करने लगे। लेकिन उन राक्षसों तथा यक्षों में से कोई भी न तो घबराया और न ही थका।
आग्नेयमस्त्रं तस्मै स मुमोच धनदस्तदा ।
राक्षसेन्द्रो वारुणेन तदस्त्रं प्रत्यवारयत् ।।586।।
ततो मायां प्रविष्टोडसौ राक्षसी राक्षसेश्वर: ।
रूपाणं शतसाहसख्नं विनाशाय चकार च ।।587।।
व्याप्रो वराहो जीमूतपर्वतः सागरो द्रुमः ।
यक्षो दैत्यस्वरूपी च सो5दृश्यत दशाननः ।।588।।
बहूनि च करोतिस्म दृश्यन्ते न त्वसौ ततः ।
प्रतिगृत्द्य ततो राम महदस्त्रं दशानन: ।।589॥।
जघान मूर्श्नि धनदं व्याविद्ध्य महतीं गदाम् ।
एवं स तेनाभिहतो विह्नल: शोणितोक्षित: ।॥590॥।
कृत्तमूल इवाशोको निपपात धनाधिप: ।
ततः पद्माभिस्तत्र निधिभि: स तदा वृतः ।59॥।
धनदोच्छवासितस्तैस्तु वनमानीय नन्दनम् ।
निर्जित्य राक्षसेन्द्रस्तं धनदं हृष्टमानस: ।।592॥।
पुष्पकं तस्य जग्राह विमानं जयलक्षणम् |
काञ्चनस्तम्भसंवीतं वैदूर्यमणितोरणम् ।॥593।।
मुक्ताजाल प्रतिच्छन्न॑ सर्वकालफलद्रुमम् ।
मनोजवं कामंगमं कामरूप॑ विहंगमम् ।॥594।।
मणिकाज्चन सोपानं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।
देवोपवाह्ममक्षय्यं सदा दृष्टिमन: सुखम् ।।595।।
ब्वाश्चर्य भक्तिचित्रं ब्रह्मणा परिनिर्मितम् ।
निर्मितं सर्वकामैस्तु मनोहरमनुत्तमम् ।।596।।
नतु शीतं न चोष्णं च सर्वर्तुसुखदं शुभम् ।
सतं राजा समारुह्य कामगं वीर्यनिर्णितम् ।597॥।
जित॑ त्रिभुवनं मेने दर्पोत्सेकात् सुदुर्मति: ।
जित्वावैश्रवणं देव कैलासात् समवातरत् ।।598।।
स तेजसा विपुलमवाप्य तं जयं, प्रतापवान् विमलकिरीटहारवान् |
रराज वै परमविमानमास्थितो, निशाचर: सदसि गतो यथानल: ।।599|।
तब कुबेर ने रावण पर आग्नेयास्त्र का प्रहार किया, लेकिन रावण ने वरुणास्त्र का प्रहार
करके उसे शांत कर डाला। इसके पश्चात् उस मायावी राक्षस ने माया का सहारा लेकर, कुबेर का विनाश करने के लिए हजारों-सैकड़ों रूप धारण कर लिए। वह दशानन मेघ, पर्वत, वराह, व्याप्र,
वृक्ष, सागर, यक्ष एवं दैत्य--इन सभी रूपों में दिखाई देने लगा। इस तरह रावण अपने अनेक रूपों को प्रकट कर रहा था, परंतु वह स्वयं दिखाई नहीं दे रहा था। हे राम! इसके बाद रावण ने अपने हाथ में एक महाअस्त्र लिया। उसने एक विशाल गदा उठाकर कुबेर के सिर पर जोर से दे मारी। इस प्रकार उस गदा के प्रहार के कारण कुबेर शोणित से नहीं उठे। वे धनाध्यक्ष कुबेर जड़ से कटे हुए पेड़ की तरह धरती पर आ गिरे। तब उस समय उन्हें पद्य आदि निधि-देवताओं ने उठाकर नन्दन वन में पहुंचाकर चैतन्य किया। इस तरह राक्षसराज रावण कुबेर पर विजय पाकर बहुत दा था। उसने अपनी विजय के प्रमाण के लिए कुबेर के पुष्पक विमान को अपने कब्जे या।
वह पुष्पक विमान वैदूर्य मणि के तोरणों तथा स्वर्ण स्तंभों से युक्त था। उसके भीतर सभी ऋतुओं के फल देने वाले वृक्ष लगे थे तथा वह मोतियों की जालियों से ढका हुआ था। वह विमान तीव्र मन की इच्छानुसार चलने वाला कामरूपी पक्षी था। वह विमान चालक की इच्छानुसार छोटा-बड़ा आकार धारण करने में सक्षम तथा सर्वत्र पहुंचाने वाली सक्षमता का था। उसमें तपे हुए सोने की वेदियां तथा मणि-जड़ित स्वर्ग की सीढ़ियां भी बनी हुई थीं। वह विमान देवताओं की तरह अविनाशी और मन को सुख एवं दृष्टि देने वाला था। उसकी दीवारों पर बहुत आश्चर्यजनक चित्र बने हुए थे जिन्हें विश्वकर्मा ने चित्रित किया था। वह सभी प्रकार की मनोवांछित तथा उत्तम वस्तुओं से युक्त था। वह न तो बहुत ठण्डा था और न ही बहुत गर्म था। वह हर प्रकार की ऋतु में कल्याणकारी तथा सुख प्रदान करने वाला था। उस इच्छागामी विमान को अपने पराक्रम तथा बल द्वारा जीतने पर वह दुर्मति रावण गर्व से इस प्रकार भर गया, जैसे उसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली हो। कुबेर पर विजय प्राप्त करने के बाद रावण कैलाश पर्वत से नीचे उतरा। हारों और निर्मल किरीट से विभूषित वह प्रतापी राक्षस अपने बल तथा तेज द्वारा विजय प्राप्त करने के पश्चात् उस विमान पर बैठकर ऐसा सुशोभित हो रहा था, जैसे यज्ञमण्डप में साक्षात् अग्निदेव सुशोभित हों।
३ ७७ १. १५७४४३४४ह ए रे.
रावण की विजय
स जित्वा धनदं राम क्षातरं राक्षसाधिय: ।
महासेन प्रसूतिं तद् ययौ शरवण्णं महत् ।॥600।।
अथापश्यद् दशग्रीवो रौक्मं शरवणं महत् |
गभस्तिजालसंवीतं द्वितीयमिव भास्करम् ।।604॥।
स पर्वतं समारुह्य कंचिद् रम्यवनान्तरम् ।
प्रेक्षतेपुष्पक॑ तत्र राम विष्टम्भितं तदा ।॥602।।
विष्टब्धं किमिदं कस्मान्नागमत् कामगं कृतम् |
अचिन्तयद् राक्षसेन्द्र: सचिवैस्तै: समावृतः ॥603॥।
किंनिमित्तमिच्छया मे नेदं गच्छति पुष्पकम् |
पर्वतस्योपरिष्ठस्य कर्मेदं कस्यचिद् भवेत् ।॥604।।
ततोथब्रवीत् तदा राम मारीचो बुद्धिकोविद: ।
नेदं निष्कारणं राजन पुष्पकं यत्न गच्छति /605।।
अथवा पुष्पकमिदं धनदान्नान्यवाहनम् |
अतो निस्पन्दमभवद् धनाध्यक्षविनाकृतम् ।॥606।।
इति वाक्यान्तरे तस्य कराल: कृष्णपिड़ल: ।
वामनो विकटो मुण्डी नंदी हस्वभुजो बली ।॥607।।
ततः पार्श्वमुपागम्य भवस्यानुचरो<ब्रवीत् ।
नन्दीश्वरो वचबश्रेदं राक्षसेन्द्रमभशड्कितः ।॥608।।
हे राम! राक्षसराज रावण कुबेर पर विजय पाने के पश्चात् 'शंरवण” नामक उस विशाल वन में गया, जहां पर स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ था। वहां पर पहुंच कर रावण ने शंरवण पर अपनी दृष्टि डाली। सूर्य की किरणों से व्यापित होने के कारण वह दूसरे सूर्य की तरह प्रतीत हो रहा था। हे राम! वहां पर एक पर्वत भी था, जिसके पास का जंगल अत्यन्त रमणीय था। जब रावण उस पर्वत पर चढ़ने को बढ़ा तो पुष्पक विमान की गति रुक गई। तब रावण अपने मन्त्रियों के साथ इस बात पर विचार करने लगा कि यह इच्छागामी विमान किस लिए रुक गया? वह कौन-सा कारण है कि यह विमान मेरी इच्छा होने पर भी नहीं चल रहा है। यह संभव है कि इस पर्वत पर कोई ऐसा व्यक्ति रहता हो जिसके क्रियाकलापों के कारण ऐसा हो रहा है। है राम! उस समय योग्य-बुद्धिमान रावण के मंत्री मारीच ने कहा--पुष्पक विमान आगे नहीं
बढ़ रहा है, यह कोई कारण ही नहीं है राजन! यह संभव है कि पुष्पक कुबेर का वाहन होने के कारण तथा किसी अन्य का वाहन न होने से निश्चेष्ट हो गया है। इस बातचीत के बीच में ही कृष्ण-पिड्ल वर्ण, अत्यन्त विशाल, विकट, वामन, छोटी भुजाओं वाले, मुण्डित मस्तक वाले तथा बलवान नन््दीश्वर वहां उनके पास आ खड़े हुए। शिव के अनुचर उन नन्दीश्वर ने निःशड्क भाव से राक्षसराज रावण से इस प्रकार कहा।
निवर्तस्व दशग्रीव शैले क्रीडति शंकर: ।
सुपर्णनाग यक्षाणां देवगन्धर्वरक्षसाम् ।।609।।
सर्वेषामेव भूतानामगम्य: पर्वत: कृत: ।
इति नन्दि वच: श्रुत्वा क्रोधात्कम्पित कुण्डल: ।॥60॥।
रोषात तु ताम्रनयन: पुष्पकादवरुह्म सः ।
को<यं शड्कर इत्युक्त्वा शैलमूलमुपागत: ।॥64॥।
सो<पश्यन्नन्दिनं तत्र देवस्यादूरत: स्थितम् ।
दीप्तं शूलमवष्टभ्य द्वितीयमिव शड्करम् ।॥62॥।
त॑ दृष्टवा वानरमुखमवज्ञाय स राक्षस: ।
प्रहासं समुचे तत्र सताये इव तोयद: ।॥63।।
त॑ क्रुद्धो भगवान् नन्दी शड़करस्यापरा तनु: ।
अक्रवीत् तत्र तद् रक्षो दशाननमुपस्थितम् ।॥64॥।
यस्माद् वानररूपं मामवज्ञाय दशानन ।
अशनीपातसंकाशमपहासं प्रमुक्तवान् ।॥65॥।।
तस्मान्मद्वीर्यसंयुक्ता मद्रूपसमतेजस: ।
उत्पत्स्यन्ति वधार्थ हि कुलस्य तप वानरा: ।॥66।।
नरवर्दृष्टायुधा: क्रूर मन: सम्पातरंहसः ।
युद्धोन््मत्ता बलोद्रिक्ताः: शैला इव विसर्पिण: ।॥67॥।
ते तव प्रबल दर्पमुत्सेध॑ च पृथग्विधम् ।
व्यपनेष्यन्ति सम्भूय सहामात्यसुतस्य च ।।68॥।
कि त्वदानीं मया शक्यं हन्तु त्वां हे निशाचर ।
न हन्तव्यो हतस्त्वं हि पूर्वमेव स्वकर्मभि: ।॥69॥।
इत्युदीरितवाक्ये तु देवे तस्मिन् महात्मनि ।
देवदुन्दुभयो नेदु: पुष्पवृष्टिश्व खाच्चयुता ।/620॥।
है दशग्रीव! तुम वापस लौट जाओ। भगवान् शंकर इस पर्वत पर क्रीड़ा कर रहे हैं। देव,
गरुड़, नाग, यक्ष, गन्धर्व, राक्षत और सभी अन्य प्राणियों का इस पर्वत पर पहुंचना अगम्य कर दिया गया है। नन्दीश्वर के इस वचन को सुनकर राक्षसराज रावण क्रोधित हो उठा तथा उसके कानों के कुण्डल हिलने लगे। क्रोध के कारण उसकी आंखें लाल हो गईं। इसके बाद उसने पुष्पक विमान से उतरकर कहा--यह शंकर कौन है? और वह पर्वत के मूल भाग पर जा पहुंचा। वहां उसने देखा कि भगवान् शिव से थोड़ी दूरी पर नन्दीश्वर दूसरे शिव के समान हाथ में चमकता हुआ शूल लिए खड़ा हुआ था। उसके वानर जैसे मुंह को देखकर राक्षसराज रावण ने मेघ के समान अवज्ञा भाव से हंसना शुरू कर दिया। तब भगवान शिव के दूसरे रूप नन्दी ने क्रोध में आकर अपने पास खड़े हुए दशानन से कहा--हे दशग्रीव! तूने मेरे जिस वानर रूप की अवज्ञा की है तथा वज्रपात की तरह घोर अट्टहास किया है, उस तरह के वानर रूप वाले शक्तिशाली और परम तेजस्वी वानर, तेरे कुल का विनाश करने के लिए उत्पन्न होंगे। हे क्रूर राक्षस! उनकी मन के समान गति होगी तथा नख एवं दांत ही उनके आयुध होंगे। वह युद्ध करने के लिए अत्यन्त शक्तिशाली, उन्मत्त और चलते-फिरते पर्वत के समान बृहदाकार होंगे। वे सब तेरे प्रबल घमंड को चूर-चूर कर देने वाले, तेरे पुत्रों तथा मंत्रियों को मृत्यु प्रदान करने वाले और तेरे विशालकायत्व को तुच्छ बनाने वाले होंगे। हे राक्षस! मैं तेरा अभी इसी समय वध करने की शक्ति
रखता हूं, लेकिन मैं तुझे मारूंगा नहीं, क्योंकि अपने दुष्ट कर्मों के कारण तू तो पहले से ही मरे के समान है। नन्दी महात्मा के यह कहने पर आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी और देवताओं की दुन्दुभियां बजने लगीं।
क़्ुद्ध रावण
अचिन्तयित्वा स तदा नन्दिवाक्यं महाबल: ।
पर्वत॑ं तु समासाद्य वाक्यमाह दशानन: ।॥62॥। पुष्पकस्य गतिश्छिन्ना यत्कृते मम गच्छत: ।
तमिम॑ शैलमुन्मूलं करोमि तव गोपते ॥622।।
केन प्रभावेण भवो नित्यं क्रीडति राजवत् | विज्ञातव्यं न जानीते भयस्थानमुपस्थितम् ।॥623।।
एवमुक्त्वा ततो राम भुजान् विक्षिप्य पर्वते | तोलयामास तं शीघ्रं स शैल: समकम्पत ।॥624।। चालनात् पर्वतस्यैव गणदेवस्य कम्पिता: ।
चचाल पार्वती चापि तदाश्शिष्टा महेश्वरम् ।॥625।। ततो राम महादेवो देवानां प्रवरो हर: ।
पादाडुष्ठेन तं शैलं पीडयामास लीलया ।॥626।।
पीडितास्तु ततस्तस्य शैलस्तम्भोपमा भुजा: ।
विस्मिताश्चाभवंस्तत्र सचिवास्तस्य रक्षस: ।॥627।।
रावण ने महात्मा नन्दी की उन बातों पर ध्यान नहीं दिया तथा उस पर्वत के पास खड़े होकर
बोला--हे गोपति! जिस पर्वत ने मेरी यात्रा के समय पुष्पक विमान की गति को रोक डाला, मैं अपने सामने खड़े उस पर्वत को जड़ से उखाड़ डालूंगा। शंकर किस प्रभाव के द्वारा यहां पर हर रोज राजा की तरह क्रीड़ा करते हैं? कया उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि अब उनके लिए भय का कारण मौजूद है। हे राम! यह कहने के बाद रावण अपनी भुजाओं के निम्न भाग को पर्वत के निम्न भाग में लगाकर, उसे शीघ्रतापूर्वक उठाने लगा, जिसकी वजह से वह पर्वत हिलने लगा। पर्वत के हिलने के कारण शिवजी के सभी गण कांपने लगे तथा पार्वतीजी भी घबराकर शिवजी से लिपट गईं। हे श्रीराम! तब देवताओं में श्रेष्ठ माने जाने वाले शिवजी ने लीला करते हुए अर्थात् सहज भाव द्वारा अपने पांव के अंगूठे से उस पर्वत को थोड़ा दबा दिया। यह लीला देखकर उस राक्षस के मंत्री आश्चर्यचकित रह गए।
रक्षसा तेन रोषाच्च भुजानां पीडनात् तथा ।
मुक्तो विराव: सहसा त्रैलोक्यं येन कम्पितम् ।॥628।।
मेनिरे वज्रनिष्पेषं तस्यामात्या युगक्षये ।
तदा वर्त्मसु चलिता देवा इन्द्रपुरोगमा: ।॥629।।
समुद्राश्नापि संक्षुब्धाश्वलिताश्चापि पर्वता: ।
यक्षा विद्याधरा: सिद्धा: किमेतदिति चाब्रुवन् ।॥630॥।
तोषयस्व महादेवं नीलकण्ठ मुमापतिम् |
तभृते शरणं नान्यं पाश्यामो5त्र दशानन:ः ।॥634॥।
स्तुतिभि: प्रणतो भूत्वा तमेव शरणं व्रज ।
कृपालु: शड्करस्तुष्ट: प्रसाद ते विद्यास्यति |632।।
रावण अपने क्रोध तथा भुजाओं की घोर पीड़ा के कारण बहुत जोर से चिललाया, जिसकी
आवाज से तीनों लोक कांप उठे। उसके मन्त्री समझे कि प्रलयकाल आने वाला है और वज्रपात होने वाला है। इन्द्र आदि अन्य सभी देवता भी उस समय विचलित हो गए। पर्वत हिलने लगे, समुद्र में क्षोभ उठने लगे, विद्याधर, यक्ष तथा सिद्ध आदि एक-दूसरे से पूछने लगे कि यह क्या हो रहा है? तत्पश्चात् रावण के मन्त्री इस प्रकार बोले--हे महाराज! अब आप उमापति, नीलकण्ठ महादेवजी को पूर्णतः संतुष्ट कीजिए। आपको उनके अलावा कोई भी शरण देने वाला नहीं है। स्तुतियों द्वारा आप उन्हें प्रणाम करते हुए उनकी शरण में जाइए। दयालु-कृपालु शंकर आप से संतुष्ट होकर आप पर अपनी कृपा कर सकते हैं।
रावण द्वारा शिव स्तुति
एवमुक्तस्तदामात्यैस्तुष्टाव वृषभध्वजम् । सामभिर्विविधै: स्तोत्रै: प्रणम्य स दशानन: । संवत्सरसहसतर॑ तु रुदतो रक्षमों गतम् ।॥633॥।
ततः प्रीतो महादेव: शैलाग्रे तिष्ठित: प्रभु: ।
मुक्त्वा चास्य भुजान् राम प्राह वाक्यं दशाननम् ।॥634॥।
प्रीतो5स्मि तव वीरस्य शौटीर्याच्च दशानन ।
शैलाक्रान्तेन यो मुक्तस्त्वया राव: सुदारुण: ॥॥635।।
यस्माल्लोकत्रयं चैतद् रावितं भयमागतम् ।
तस्मात् त्वं रावणो नाम नाम्ना राजन् भविष्यसि ।।636।।
देवता मानुषा यक्षा ये चान्ये जगतीतले ।
एवं त्वामभिधास्यन्ति रावणं लोकरावणम् ।॥637।।
गच्छ पौलस्त्य विस्रब्धं पथा येन त्वमिच्छसि ।
मया चैषाभ्यनुज्ञातो राक्षसाधिप गम्यताम् ।॥638।।
एवमुक्तस्तु लड़केश: शम्भुना स्वयमब्रवीत् ।
प्रीतो यदि महादेवं वरं मे देहि याचतः ।॥639॥।
मंत्रियों द्वारा सलाह दिए जाने पर रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए, उन्हें प्रणाम करके सामवेदीक्त स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की। इस प्रकार अर्चना करते हुए रावण को एक सहस्र वर्ष बीत गए। है राम! तब महादेव प्रसन्न होकर, उस पर्वत के अग्रिम शिखर पर स्थित हुए तथा रावण की
भुजाओं को मुक्त करके इस प्रकार बोले--हे दशानन! तुम वीर हो, मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूं। पर्वत द्वारा जब तुम दब गए थे और जब तुमने आर्तनाद किया था, जिससे तीनों लोकों के प्राणी रो उठे थे, तो हे राजन! इस कारण तुम तीनों लोकों में 'रावण” के नाम से प्रसिद्ध होओगे। तुमने सभी लोकों को रुलाया है, इसलिए देवता, मनुष्य, यक्ष और अन्य लोग जो भी रहते हैं, वे सभी तुम्हें 'रावण' के नाम से पुकारेंगे। हे पुलस्त्यनन्दन! तुम जिस मार्ग से जाना चाहो, अब उस मार्ग से जा सकते हो। हे राक्षसेश्वर! अब मैं तुमको अपनी ओर से जाने की आज्ञा देता हूं। शिवजी के यह वचन कहने पर रावण उनसे बोला--हे महादेव! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मैं आपसे वर की प्रार्थना करता हूं।
अवध्यत्वं मया प्राप्तं देवगन्धर्वदानवैः ।
राक्षसैर्गुह्वकैनगिर्य चान्ये बलवत्तरा: ।॥640।।
मानुषान् न गणे देव स्वल्पास्ते मम सम्मता: ।
दीर्घमायुश्न मे प्राप्तं ब्रह्मणस्त्रिपुरान्तक ।॥64॥।
वाज्छितं चायुष: शेषं शस्त्र त्वं च प्रयच्छ मे ।
एवमुक्तस्ततस्तेन रावणेन स शड्कर: ।॥642॥।
ददौ खड़ू महादीप्तं चन्द्रहासमिति श्रुतम् ।
आयुषश्चावशेषं च ददौ भूतपतिस्तदा ।॥643।।
दत्त्वोवाच ततः शम्भुर्नावज्ञेयमिदं त्वया ।
अवज्ञातं यदि हि ते मामेवैप्यत्यसंशय: ।॥644।।
एवं महेश्वरेणैव कृतनामा स रावण: ।
अभिवाद्य महादेवमारुरोहाथ पुष्पकम् ।॥645।।
ततो महीतलं राम पर्यक्रामत रावण: ।
क्षत्रियान सुमहावीर्यान् बाधमानस्ततस्ततः ।॥646।।
केचित् तेजस्विन: शूरा: क्षत्रिया युद्धदुर्मदा: ।
तच्छासनमकुर्वन्तो विनेशु: सपरिच्छदा: ।॥647।।
अपरे दुर्जयं रक्षो जानन्तः प्राज्ञसम्मताः ।
जितास्म इत्यभाषन्त राक्षसं बलदर्पितम् ।॥648॥।।
मैंने गन्धर्व, देवता, दानव, राक्षस, नाग, गुह्यक तथा अन्य सभी बलवान प्राणियों से अपराजित रहने का वर प्राप्त किया है। हे देव! मनुष्यों को मैं किसी गणना में नहीं गिनता, क्योंकि मेरे अनुसार वे सभी अल्पशक्तिशाली एवं बलहीन हैं। हे त्रिपुरान्तक! ब्रह्माजी ने मुझे दीर्घायु भी प्रदान कर दी है। मैं अपनी व्यतीत आयु को
पूर्णतः पाना चाहता हूं। अतः अब आप मुझे वह प्रदान कीजिए और साथ ही एक शस्त्र भी दीजिए। रावण के यह कहने पर शिवजी ने उसे आयु का जो अंश व्यतीत हो चुका था, वह लौटा दिया और एक अत्यन्त दीप्तिमान नामक “चन्द्रहास' खड्ग भी प्रदान किया। उसके बाद शिवजी ने कहा--यदि तुमने कभी इस खड्ग का तिरस्कार किया तो यह पुनः मेरे पास लौट आएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। शिवजी द्वारा एक नया नाम पाकर वह राक्षस महादेवजी का अभिवादन करता हुआ अपने पुष्पक विमान पर सवार हो गया। हे राम! फिर रावण ने पृथ्वी पर भ्रमण करना प्रारंभ कर दिया। वह महापराक्रमी यहां-वहां जाकर क्षत्रियों को कष्ट पहुंचाता रहता था। बहुत से तेजस्वी-शूरवीर क्षत्रिय उस राक्षस का कहना न मानने के कारण अपने परिवार तथा सेना सहित नष्ट हो गए। कई बुद्धिमान क्षत्रियों ने रावण को पराक्रमी एवं बलाभिमानी मानकर उसके समक्ष अपनी पराजय स्वीकार कर ली।
अथ राजन् महाबाहुविचिरन् पृथिवी तले ।
हिमवद्दनमासद्य परिचक्राम रावण: ।॥649॥।
तत्रापश्यत् स वै कन्यां कृष्णाजिन जटाधराम् ।
आर्षेण विधिना चैनां दीप्यन्तीं देवतामिव ॥650।।
स दृष्टवा रूपसम्पन्नां कन्यां तां सुमहाव्रताम् ।
काम मोह परीतात्मा पप्रच्छ प्रहसन्निव |॥65।।
किमिदं वर्तसे भट्रे विरुद्धं यौवनस्य ते ।
नहिं युक्ता तवैतस्य रूपस्यैवं प्रतिक्रिया ॥652॥।
रूप॑ ते3नुपमं भीरु कामोन्मादकरं मृणाम् ।
नयुक्त तपसि स्थातुं निर्गतो होष निर्णय: |॥653॥।
कस्यासि किमिदं भद्रे कश् भर्ता वरानने ।
येन सम्भुज्यसे भीरु स नरः पुण्यभाग भुवि ।॥654।।
पृच्छत: शंस मे सर्व कस्य हेतो परिश्रम: ।
एवमुक्ता तु सा कन्या रावणेन यशस्विनी ।॥655॥।।
अब्रवीद् विधिवत् कृत्वा तस्या तिथ्यं तपोधना ।
कुशध्वजो नाम पिता ब्रह्मर्षिरमितप्रभ: ।॥656।।
बृहस्पतिसुतः श्रीमान् बुद्धया तुल्यो बृहस्पते: ।
तस्याहं कुर्वतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मन: ।॥657।।
सभ्यूता वाड़मयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मृता ।
ततो देषा: सगन्धर्वा यक्षराक्षस पन्नगा: ।॥658॥।
ते चापि गत्वा पितरं वरणं रोचयन्ति मे ।
नच मां स पिता तेभ्यो दत्तवान् राक्षसेश्वर ।॥659।।
कारणं तद् वदिष्यामि निशामय महाभुज ।
पितुस्तु मम जामाता विष्णु: किल सुरेश्वरः ।॥660॥।
अभि प्रेतस्त्रिलोकेशस्तस्मान्नान्यस्य मे पिता ।
दातुमिच्छति तस्मै तु तच्छुत्वा बलदर्पितः ।॥664।।
शुम्भुर्नाम ततो राजा दैत्यानां कुपितो&भवत् |
तेन रात्रौ शयानो मे पिता पापेन हिंसित: ॥662।।
ततो मे जननी दीना तच्छरीरं पितुर्मम
परिष्वज्य महाभागा प्रविष्टा द्रव्य वाहनम् ।॥663॥।
ततो मनोरथं सत्यं पितुर्नारायणं प्रति ।
करोमीति तमेवाहं हृदयेन समुद्रहे |।664।।
इति प्रतिज्ञामारुह् चरामि विपुलं तव ।
एतत् मे सर्वमाख्यातं मया राक्षसपुड़व: ।॥665॥।
हे राजन! महाबली रावण पृथ्वी पर भ्रमण करता हुआ, हिमालय के घने भयानक वन में जा पहुंचा और वहां भ्रमण करने लगा। रावण ने वहां पर एक कन्या को देखा जो कृष्णमृगचर्म और जटाएं धारण किए हुए थी। वह प्राचीन पद्धति के अनुसार तपस्या करती हुई, देवताओं के समान दीप्तिमान हो रही थी। उस रूपवती-महाव्रती कन्या को देखकर रावण कामातुर हो, अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए पूछने लगा--हे भद्रे! तुम अपने सौंदर्य एवं युवावस्था के विरुद्ध यह सब क्या कर रही हो? तुम्हारे इस सुंदर, दिव्य और मनमोहक रूप के लिए ऐसा आचरण करना ठीक नहीं है। हे भीरु! तुम्हारा अनुपम सौंदर्य रूप तो मनुष्यों को अर्थात् उनके मन में कामोन्माद की भावना उत्पन्न करने वाला है। मेरे अनुसार तुम्हारा तपस्या करना उचित नहीं है। हे भद्रे! तुम कौन हो तथा यह सब क्या कर रही हो? हे सुंदर मुख वाली! तुम्हारा पति कौन है? जिस किसी के साथ तुम्हारा संबंध होगा, वह मनुष्य पृथ्वी पर बहुत दयालु तथा पुण्यवान् होगा। मैं तुमसे जो ही पूछ रहा हूं, उसका मुझको सही उत्तर दो। तुम यह तप रूपी परिश्रम किसके लिए कर रही हि
रावण के यह कहने पर उस यशस्वी और तेजस्विनी कन्या ने रावण का विधिवत् आतिथ्य करने के बाद कहा-मेरे पिता परम तेजस्वी ब्रह्मर्षि कुशध्वज थे। वे प्रतिदिन वेदाभ्यास किया करते थे। उन्हीं की वाड्मयी कन्या के रूप में मेरा जन्म हुआ है। मेरा नाम वेदवती है। जब मैं वयस्क हो गई तो गन्धर्व, देवता, यक्ष, नाग, राक्षमस--इन सभी ने वरण करने के लक्ष्य से मेरे पिताजी के पास जाकर मेरा हाथ मांगा। लेकिन हे राक्षसेश्वर! पिताजी ने मुझे उनमें से किसी के भी हाथ नहीं सौंपा। हे महाबलशाली रावण! इसका कारण भी मैं तुमको बताती हूं। मेरे पिताजी की यह इच्छा थी कि सभी देवताओं के स्वामी भगवान् विष्णुजी मेरे पति बनें। तीनों लोकों के स्वामी विष्णुजी के अलावा वह मेरा विवाह किसी अन्य के साथ नहीं करना चाहते थे। उनकी इस इच्छा को जानकर अपने बल के घमंड में चूर शम्भु नामक दैत्य ने क्रोध में आकर रात्रि में सोते
समय उनकी हत्या कर दी। इससे मेरी माता बहुत दुःखी हुईं तथा मेरे पिता के शव को अपनी छाती से लगाकर चिता की अनिन में स्वयं प्रविष्ट हो गईं। तब से मैंने श्री नारायण के प्रति अपने पिता की जो इच्छा थी, उसे पूरा करने का दृढ़ निश्चय कर लिया है। अब मैंने उन्हीं को अपने हृदय में बसा लिया है। अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए मैं यह महान् तपस्या कर रही हूं। हे राक्षसश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने अपने बारे में आपको सभी बातें बता दीं।
नारायणो मम पतिर्न त्वन्य: पुरषोत्तमात् |
आश्रये नियमं घोरं नारायण परीप्सया ।।666।।
विज्ञातस्त्वं हि मे राजन् गच्छ पौलस्त्यनन्दन |
जानामि तपसा सर्व त्रैलोक्ये यद्धि वर्तते ॥667।।
सो<ब्रवीद् रावणो भूयस्तां कन्यां सुमहाव्रताम् ।
अवरुह्यम विमानाग्रात् कन्दर्पशरपीडित: ।॥668।।
अविलिप्तासि सुश्रोणि यस्यास्ते मतिरीदृशी ।
वृद्धानां मृगशावाक्षि भ्राजते पुण्यसंचय: ।॥669।।
त्वं सर्वगुणसम्पन्ना नाहसे वक्तुमीहशम् ।
त्रैलोक्य सुंदरी भीरु यौवनं तेतिवर्तते |॥670॥।
अहं लड़कापतिर्श्रदे दशग्रीव इति श्रुतः ।
तस्य मे भव भार्या त्वं भुड़क्ष् भोगान् यथा सुखम् ।॥67॥।
कश्चतावदसौ यं त्वं विष्णुरित्यभिभाषसे ।
वीर्येण तपसा चैव भोगेन च बलेन च ।॥672॥।
श्री नारायण ही मेरे पति हैं। उन पुरुषोत्तम के अलावा कोई अन्य मेरा पति नहीं बन सकता।
श्री नारायण की आज्ञा द्वारा ही मैंने इस प्रकार का कठोर तप का आश्रय लिया है। हे राजन! मैं आपको पहचानती हूं। हे पौलस्त्य नन्दन! इन तीनों लोकों में जो कुछ है या हो रहा है, उसे मैं अपनी तपस्या के बल से जानती या देखती हूं। काम-बाण से पीड़ित रावण यह सुनकर उस महान् व्रत का पालन करने वाली कन्या के अग्रभाग में खड़ा होकर बोला--हे सुन्दर कटिप्रदेश वाली! मुझे तुम अभिमानी लगती हो, इसीलिए तुम्हारी बुद्धि ऐसी हो गई है। हे मृगशावक नयनी! इस तरह पुण्य-संचय एवं तप करना वृद्ध स्त्रियों को शोभा देता है। तुम तो सभी गुणों से युक्त हो। तुमको इस तरह की बातें नहीं कहनी चाहिए। हे त्रैलोक्य सुन्दरी! हे भीरु! तुम्हारी अलौकिक युवावस्था बीतती जा रही है। हे भद्रे! मैं लड़कापति हूं और तीनों लोकों में दशग्रीव नाम से प्रसिद्ध हूं। अतः तुम्हें मेरी पत्नी बनकर सुख देने वाले भोगों का उपभोग करना चाहिए। जिसे तुम विष्णु कहती हो, वह कौन है--तप, शक्ति, बल और भोग में।
वेदवती द्वारा आत्मदाह
स मया नो समे भट्रे यं त्वं कामयसेडड्रने । इत्युक्तवति तर्मिंस्तु वेदवत्यथ सा ब्रवीत ।।673॥। मा मैवमिति सा कन्या तमुवाच निशाचरम् | त्रैलोक्याधिपतिं विष्णुं सर्वलोक नमस्कृतम् ।॥674।।
त्वदृक्षे राक्षसेन्द्रान्य: को5वमन्येत बुद्धिमान् |
एवमुक्तस्तया तत्र वेदवत्या निशाचर: ।॥675।।
मूर्थजेषु तदा कन्यां कराग्रेण परामृशत् ।
ततो वेदवती केशान् हस्तेन साच्छिनत् ।॥676।।
असिर्भूत्वा करस्तया: केशांश्छिन्नास्तदाकरोत् ।
सा ज्वलन्तीव रोषेण दहन्तीव निशाचरम् ।॥677।।
उवाचाग्निं समाधाप मरणाय कृतत्वरा ।
धर्वितायास्त्वयानार्य न मे जीवितमिष्यते ।॥678॥।
रक्षस्तस्मात् प्रवेक्ष्यामि पृश्यतस्ते हुताशनम् ।
यस्मात् तु धर्षिता चाहं त्वया पापात्मना वने |।679॥।
तस्मात् तव वधार्थ हि समुत्यत्स्ये हाहं पुनः ।
न हिशक्य: स्त्रिया हन्तु: पुरुष: पापनिश्चय: ।॥680॥।
शापेत्वयि मयोत्सृष्टे तपसश्व व्ययो भवेत् ।
यदि त्वस्ति मया किंचित् कृतं दत्त हुतं तथा ।॥68॥।
तस्मात् त्वयोनिजा साध्वी भवेयं धर्मिण: सुता ।
एवमुकक््त्वा प्रविष्टा सा ज्वलितं जातवेदसम् ।॥682।।
पपात च दिवो दिव्या पुष्पवृष्टि: समन््ततः ।
पुनरेव समुद्भूता पढे पद्मसमप्रभा ।॥683।।
तस्मादपि पुनः प्राप्ता पूर्ववत् तेन रक्षसा ।
कन्या कमलगर्भाभां प्रगृह्म स्वगृहं ययौ ।॥684।।
प्रगृह्य रावणस्त्वेतां दर्शयामास मन्त्रिणे ।
लक्षणज्ञो निरीक्ष्यैव रावणं चैवमब्रवीत् ॥685।।
गृहस्थैषा हि सुश्रोणी त्वद्वधायैव दृश्यते ।
एतच्छुत्वार्णवे राम तां प्रचिक्षेप रावण: ।॥686।।
सा चैवक्षितिमासाघ यज्ञायतनमध्यगा ।
राज्ञो हलमुखोत्कृष्टा पुनरप्युत्थिता सती ।॥687।।
हे भद्रे! हे अड़ने! जिसको तुम चाहती हो, वह मेरे समान नहीं है। रावण के यह कहने पर
कन्या वेदवती बोली--नहीं, ऐसा मत कहिए। त्रैलोक्याधिपति श्री विष्णु के कमल चरणों में तीनों लोक अपना सिर झुकाते हैं। तुम्हारी तरह राक्षस के अलावा कोई और बुद्धिमान श्री विष्णु की अवहेलना नहीं कर सकता। यह सुनते ही राक्षसराज रावण ने वेदवती के केश अपने हाथों से पकड़ लिए। वेदवती ने क्रोधित होकर अपने हाथों से उन केशों को काट दिया। जैसे तलवार किसी वस्तु को काट देती है, उसी प्रकार उस कन्या ने अपने मस्तक के केशों को अपने हाथ से काट दिया। वह क्रोध के कारण स्वयं जलती हुई तथा रावण को जलाती हुई जलकर मरने के लिए तैयार हो गयी।
इस उद्देश्य के लिए वह अग्नि की स्थापना करके बोली--अरे नीच! तूने मेरा अपमान किया है, अतः: अब मैं जीना नहीं चाहती। हे राक्षस! तेरी आंखों के सामने मैं अब अग्नि में प्रवेश करूंगी। हे पापी! तूने इस वन में मेरा घोर अपमान किया है। अतः मैं तुम्हारा वध करने के लिए दोबारा जन्म लूंगी। पापी-दुष्ट पुरुष का विनाश करने के लिए स्त्रियां शारीरिक रूप से अक्षम होती हैं। यदि मैं तुमको शाप दूंगी तो मुझे तपस्या में क्षीणता प्राप्त होगी। यदि मैंने कोई भी सुकर्म, दान-पुण्य तथा होम किए हैं तो अयोनिजा, सती-सावित्री कन्या के रूप में धर्मात्मा व्यक्ति की पुत्री बनकर पुनः प्रकट होऊंगी। यह कहने के पश्चात् वह कन्या प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गई। उसी समय आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।
दूसरे जन्म में वह कन्या एक कमल से उत्पन्न हुई। उस कन्या के शरीर की काठी, रूपरेखा भी कमल की तरह थी। पहले की तरह रावण ने उस कन्या को पुनः प्राप्त कर लिया तथा कमल के गर्भ की तरह सुंदर उस कन्या को अपने घर ले आया। जब रावण ने वह कन्या अपने मंत्रियों को दिखाई, तब उसको देखकर शारीरिक लक्षणों के ज्ञाता एक मंत्री ने रावण से कहा--यदि यह कन्या घर में रही तो आपकी मृत्यु का प्रमुख कारण बनेगी--ऐसा लगता है। हे राम! यह सुनने के पश्चात् वह उस कन्या को समुद्र में फेक आया। तब वह कन्या पृथ्वी पर पहुंच कर राजा जनक के यज्ञ-मण्डप के मध्यभाग में पहुंच गई। फिर राजा द्वारा उस भूमि को हल से जोतने पर वह सती- सावित्री कन्या पुनः प्रकट हो उठी।
सीताजी का अवतरण
सैषा जनकराजस्य प्रसूता तनया प्रभो ।
तव भार्या महाबाहो विष्णुस्त्वं हि सनातन: ।॥688॥।
पूर्व क्रोधहत: शत्रुर्ययासौ निहतस्तया ।
उपाश्रयित्वा शैलाभस्तव वीर्यममानुषम् ।॥689।॥।
एवमेषा महाभागा मर्त्येषूत्पत्स्यते पुनः ।
क्षेत्र हलमुखोत्कृष्टे वेद्यामग्निशिखोपमा ।॥690॥।
एषा वेदवती नाम पूर्वमासीत् कृते युगे ।
त्रेतायुगमनुप्राप्य वधार्थ तस्य राक्षस: ।॥69।।
उत्पन्ना मैथिल कुले जनकस्य महात्मनः ।
सीतोत्पन्ना तु सीतेति मानुषै: पनुरुच्यते ।692॥।
हे प्रभो! वह कन्या राजा जनक की पुत्री के रूप में प्रकट हुई। हे महाबाहो! अब वही कन्या
आपकी पत्नी है। आप स्वयं ही श्री विष्णु हैं। उस महादुष्ट पर्वताकार राक्षस रावण को उस वेदवती ने पहले ही अपने क्रोधित शाप द्वारा मार डाला था जिसको आपने अब अदभुत शक्ति के प्रहार से मारा है। हे महाभाग! इस प्रकार वह देवी बार-बार विभिन्न रूपों में राक्षमों का विनाश करने के लिए जन्म लेती रहेगी। अग्निशिखा के समान उस देवी का आविर्भाव हल द्वारा जोते गए क्षेत्र में हुआ है। यह देवी पूर्वकाल में वेदवती के नाम से जन्मी थी। उसके बाद त्रेतायुग में रावण का वध करने के लिए प्रकट हुई। वह मैथिल-कुल में उत्पन्न महात्मा जनक के घर में जन्मी
है। हल जोतने से भूमि पर बनी रेखा के कारण मनुष्य इसे “सीता” कहकर पुकारते हैं।
प्रविष्टामां हुताशं तु वेदवत्यां स रावण: ।
पुष्पक॑ तु समारुह्य परिचक्राम मेदिनीम् ।॥693॥।
ततो मरुत्तं नृपतिं यजन्तं सह देवतै
उशीर बीजमासाद्य ददर्श स तु रावण: ।॥694।।
सवर्तोनाम ब्रह्मर्षि: साक्षाद् भ्राता वृहस्पते: ।
याजयामास धर्मज्ञ: सर्वेदिवगणैर्वृत: ॥695।।
दृष्टवा देवास्तु तद् रक्षो वरदानेन दुर्जयम् |
तिर्यग्योनिं समाविष्टास्त धर्षणभीख: ।।॥696।।
इन्द्रो मयूर: संवृत्तों धर्मराजस्तु वायसः ।
कृकलासो धनाध्यक्षो हंसश्व वरुणो5भवत् ।॥697।।
अन्वेष्वपि गतेष्वेवं देवेष्वरिनिषूदन ।
रावण: प्राविशद् यज्ञं सारमेव इवाशुचि: ।॥698॥।
तं च राजानमासाद्य रावणो राक्षसाधिप: ।
प्राह युद्ध प्रयच्छेति निर्जितो5स्मीति वा वद ।॥699॥।
ततो मरुत्तो नृपतिः को भवानित्युवाच तम् ।
अवहासं ततो मुक्त्वा रावणो वाक्यमब्रवीत् ।।700॥।
उस कन्या वेदवती के अन्नि में प्रवेश कर जाने के बाद रावण पुष्पक विमान पर सवार होकर
पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। उस समय रावण ने “उशीर बीज” नामक देश में पहुंचकर, राजा मरुत को यज्ञ करते हुए देखा। देवताओं के साथ साक्षात् बृहस्पति के भाई और धर्म के परम ज्ञाता 'संवर्त' नामक ब्रह्मर्षि यज्ञ करा रहे थे। वरदान प्राप्त करने के कारण क्रूर तथा दुष्ट बने राक्षसराज रावण को देखकर वे भी भयभीत हो गए तथा पक्षियों की योनि में प्रवेश कर गए। धर्मराज कौआ बन गए, इन्द्र मोर बन गए, वरुण हंस बन गए और कुबेर गिरगिट बन गए। हे देव शत्रु-नाशक! अन्य देवता भी विभिन्न रूपों में स्थित हो गए। रावण उस यज्ञ-मण्डप में इस प्रकार घुसा, जैसे कोई बिन बुलाया अपवित्र कुत्ता घुस आया हो। रावण ने राजा मरुत के पास जाकर कहा--या तो तुम मुझसे युद्ध करो, या कह दो कि तुम मुझसे हार गए हो। उस समय राजा मरुत ने रावण से कहा--आप कौन हैं जो इस प्रकार की बातें कह रहे हैं? उनके प्रश्न को सुनकर रावण जोर-जोर से हंसते-हंसते इस प्रकार कहने लगा--
राजा मरुत पराजित
अकुतूहलभावेन प्रीतो$स्मि तव पार्थिव ।
धनदस्यानुजं यो मां नावगच्छसि रावणम् ।।704॥। त्रिषु लोकेषु कोअन्यो$स्ति यो न जानाति मे बलम् । भ्रातरं येन निर्जित्य विमानमिदमाहतम् ।।702।।
ततो मरुत्त: स नृपस्तं रावणमथा ब्रवीत ।
धन्य: खलु भवान् येन ज्येष्ठो भ्राता रणे जित: ।।703॥।
न त्वया सदृशः श्लाध्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
कं त्वं प्राक्केवलं धर्म चरित्वा लब्धवान् वरम् ।।704।।
श्रुतपूर्व हि न मया भाषसे यादृशं स्वयम् |
तिष्ठेदानीं न मे जीवन् प्रतियास्यसि दुर्मते ||705॥।।
अद्य त्वां निशितैर्बाणै: प्रेषयामि यमक्षयम् ।
ततः शरासनं गृह्य सायकांश्व नराधिप: ।।706।।
रणाय निर्दयौक़ुद्धः संवर्तो मार्गमावृणोत् ।
सो<ब्रवीत् स्नेह संयुक्त मरुत्तं तं महानृषि: ।।707॥।
श्रोतव्यं यदि मद्वाक्यं सम्प्रहारो न ते क्षम: ।
माहेश्वरमिदं सत्रमसमाप्तं कुलं दहेत् ।।708।।
दीक्षितस्य कुतो युद्ध क्रोधित्वं दीक्षिते कुत: ।
संशयश्व जये नित्य राक्षसश्व सुदुर्जय: ।709।।
स निवृत्तो गुरोर्वाक्यान्मरुत्त: पृथिवीपति: ।
विसृज्य स शरं चापं स्वस्थोरवमुखो5भवेत् ।।70।।
मुझे देखकर न तो तुम्हें डर लगा और न ही तुमको कोई आश्चर्य हुआ, यह देखकर मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। मैं तो कुबेर का छोटा भाई हूं, फिर भी तुम मुझको नहीं जानते? मैं वही रावण हूं जिसने कुबेर पर विजय प्राप्त करने के बाद उससे यह विमान हथिया लिया है। यह सुनने के पश्चात् राजा मरुत रावण से बोले--आप धन्य हैं जो आपने युद्ध में अपने बड़े भाई को हरा दिया है। आपकी तरह पराक्रमी तथा प्रशंसनीय व्यक्ति तो तीनों लोकों में कहीं पर भी नहीं मिलेगा। पूर्वकाल में तुमने किस प्रकार के धर्म का पालन करने से वरदान प्राप्त कर लिया था? हे दुष्ट बुद्धि वाले! जैसा तुमने कहा है, वैसा मैंने पहले कभी भी नहीं सुना है। तुम यहीं पर खड़े रहो। मेरे हाथों के चंगुल से तुम जीवित नहीं बच सकते। आज मैं तुमको अपने तीक्ष्ण बाणों के वार से यमलोक पहुंचा दूंगा। यह कहने के पश्चात् राजा मरुत ने अपना धनुष-बाण उठा लिया। जैसे ही वह क्रोधित होकर
युद्ध करने के लिए आगे बढ़े, वैसे ही महर्षि संवर्त ने उनका मार्ग रोक लिया। उन्होंने स्नेहपूर्वक मरुत से कहा--यदि मेरा कहना मानो तो तुम्हारे लिए युद्ध करना उचित नहीं है। यदि यह 'महेश्वर यज्ञ” अधूरा रह गया तो तुम्हारे संपूर्ण कुल को भस्म कर देगा। क्रोध करने वाला व्यक्ति कैसे दीक्षित हो सकता है? यज्ञ में दीक्षित व्यक्ति के लिए युद्ध उचित नहीं है? यह राक्षसराज रावण बहुत दुष्ट और निर्दयी है तथा युद्ध में किसकी विजय होगी, यह भी कहना मुश्किल है। गुरु के मुख द्वारा यह वचन सुनकर राजा मरुत ने युद्ध करने के अपने विचार को त्याग दिया।
ततस्तं॑ निर्जितं मत्वा घोषयामास वै शुक: ।
रावणो जयतीव्युच्चैईर्षान्नांद विमुक्तवान् ।।7॥।
तान् भक्षयित्वा तत्रस्थान् महर्षीन् यज्ञमागतान् ।
वितृप्तो रुधिरैस्तेषां पुन: सम्प्रययौ महीम् ।॥72॥।
रावणे तु गते देवा: सेन्द्राश्वैव दिवौकस: ।
ततः स्वां योनिमासाद्य तानि सत्त्वार्तन चाब्रुवन् ।।73॥।।
हर्षात् तदा ब्रवीदिन्द्रो मयूरं नीलवर्हिणम् ।
प्रीतो5स्मि तव धर्मज्ञ भुजड़ाद्धि न ते भयम् ।।74॥। इदं नेत्र सहस्न॑ तु यत् दत् बह भविष्यति । वर्षमाणे मयि मुद प्राप्स्यसे प्रीतिलक्षणाम् ।।75॥। एवमिन्द्रो वरं प्रादान्मयूरस्य सुरेश्वर: ।।76।। नीला: किल पुरा बहा मयूराणां नराधिय । सुराधिपादवरं प्राप्य गता: सर्वेडपि बर्हिण: ।।77॥। राजा मरुत को हारा हुआ मानकर शुक ने रावण के विजयी होने की घोषणा कर दी तथा वह बहुत ऊंचे स्वर में गाने लगा। इसके बाद रावण उस यज्ञ में बैठे हुए ऋषियों को खाकर तथा उनके रक्त को पीकर पूर्ण रूप से तृप्त होकर, पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। रावण के चले जाने के बाद इन्द्रादि अन्य देवता पुन: अपने वास्तविक रूप में आ गए। जिन प्राणियों का उन्होंने रूप धारण किया था, उनको इन्होंने वरदान दिया। सर्वप्रथम इन्द्र ने नील वर्ण पंखों वाले मोर से कहा-हे धर्मज्ञ! मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूं। अब तुमको सर्पादि से कोई भय नहीं रहेगा। तुम्हारे पंखों में मेरी सहस्न आंखों की तरह चिह्न प्रकट होंगे। जब मैं आकाश द्वारा वर्षा करूंगा, उस समय तुम्हें बहुत प्रसन्नता होगी। इस तरह इन्द्र ने मोर को वरदान दिया। हे राम! वरदान प्राप्त करने से पहले मोरों के पंख केवल नीले रंग के होते थे। देवराज इन्द्र से यह वरदान प्राप्त करके सभी मोर वहां से चले गए। धर्मराजोडब्रवीद राम प्राग्वंशे वायसं प्रति । पक्षिं स्तवास्मि सुप्रीत: प्रीतस्य वचनं शुणु ||78॥। यथान्ये विविध रोगै: पीड्यन्ते प्राणिनो मया । ते न ते प्रभविष्यन्ति मयि प्रीते न संशय: ।॥79।। मृत्युतस्ते भयं नास्ति वरान् मम विहंगम । यावत् त्वां न वधिष्यन्ति नरास्तावद् भविष्यसि ।।720।। ये च मद्विषयस्था वै मानवा: क्षुधयार्दिता: । त्वपि भुक्ते सुतृप्तास्ते भविष्यन्ति सबान्धवा: ।।72॥। वरुणस्त्वब्रवीद्धंसं गड़ा तोय विचारिणम । श्रूयतां प्रीति संयुक्त वच: पत्ररथेश्वर: ।।722॥।। हे राम! धर्मराज ने प्राग्वंश (यज्ञशाला के पूर्व भाग में निर्मित यजमान और उसकी पत्नी के निवास स्थान पर) स्थित कौए से कहा--मैं तुमसे बहुत अधिक प्रसन्न हूं, अतः अब तुम ध्यानपूर्वक मेरी बात को सुनो। जिस तरह विभिन्न प्राणी मेरे द्वारा विभिन्न प्रकार के रोगों से पीड़ित रहते हैं, उसी तरह तुम उन रोगों से पीड़ित नहीं रहोगे। इसमें कोई सन्देह नहीं। मेरे द्वारा तुम्हें दिए गए वरदान से यह संभव होगा। तुम्हें मेरे वरदान की वजह से मृत्यु का भय नहीं रहेगा। जब तक कोई मनुष्य तुम्हारी हत्या नहीं करेगा, तुम जीवित रहोगे। यमलोक में रहने वाले क्षुधार्त मनुष्यों को उस समय ही चरम तृप्ति प्राप्त होगी; जब पृथ्वी लोक निवासी तथा उनके बन्धु तुम्हें भोजन करवाएंगे। इसके पश्चात् वरुण ने गंगाजल में भ्रमण करते हुए हंस से इस प्रकार कहा--हे पक्षिराज! मेरे द्वारा कहे जाने वाले वचनों को सुनो। वर्णो मनोरम: सौम्यश्नन्द्रमण्डलसंनिभ: ।
भविष्यति तपोदग्र: शुद्धफेनसमप्रभ: ।॥723॥।।
मच्छरीरं समासाद्य कान्तो नित्यं भविष्यसि ।
प्राप्स्यसे चातुलां प्रीतिमेतन्मे प्रीतिलक्षणम् ।।724।।
हंसानां हि पुरा राम न वर्ण: सर्वपाण्डुर: ।
पक्षा नीलाग्रसंवीता, क्रीडा: शष्पाग्रनिर्मला: ।725॥।।
अथाब्रवीद वैश्रवण: कृकलासं गिरौस्थितम् ।
हैरण्यं सम्प्रयच्छामि वर्ण प्रीतस्तवाप्यहम् ।726।।
सद्रव्यं च शिरो नित्यं भविष्यति तवाक्षयम् |
एष काजञज्चनको वर्णों मत्प्रीत्या ते भविष्यति ।।727।।
एवं दत्त्वा वरांस्तेभ्यस्तस्मिन् यज्ञोत्सवे सुरा: ।
निवृत्ते सह राज्ञा ते पुनः स्वभवनं गता: ।।728॥।।
तुम्हारे शरीर का रंग चन्द्रमा के समान सुंदर और दुग्धफेन की भांति मनोरम होगा। मेरे
अड्भभूत जल का आश्रय पाकर तुमको सदैव अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होगी। तुम हमेशा कान्तिमान् बने रहोगे। यह मेरी प्रसन्नता को दर्शाने का चिह्न है। हे राम! हंसों का रंग पूर्वकाल में पूर्णतया सफेद नहीं था। उनकी दोनों टांगों के बीच का भाग नवीन दूर्वादल की तरह कोमल और श्याम रंग का होता था। उनके पंखों के आगे का भाग नीला होता था। इसके पश्चात् पर्वत पर बैठे हुए गिरगिट से कुबेर ने कहा--मैं तुमसे प्रसन्न होकर तुम्हें सोने के समान सुंदर रंग प्रदान करता हूं। तुम्हारा मस्तक सदैव सोने की तरह चमकदार तथा अक्षय होगा। मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं, इसलिए तुम्हारा यह वर्तमान काला रंग सुनहरे रंग में परिवर्तित हो जाएगा। इस तरह उन सभी को वरदान का पश्चात् वे सभी देवता राजा मरुत के साथ यज्ञोत्सव समाप्त हो जाने पर अपने लोक को चले गए।
रावण अयोध्या में
अथ जित्वा मरुत्तं स प्रययौ राक्षसाधिप: ।
नगराणि नरेन्द्राणां युद्धकांक्षी दशानन: ॥729॥। समासाद्य तु राजेन्द्रान् महेन्द्र वरुणोपमान् ।
अब्रवीद् राक्षसेन्द्रस्तु युद्धे मे दीयतामिति |।730॥। निर्जिता: स्मेति वा ब्रूत एष मे हि सुनिश्चय: ।
अन्यथा कुर्वतामेवं मोक्षो नैवोपपद्यते ||73॥। ततस्त्वभीरव: प्राज्ञा: पार्थिवा धर्मनिश्चया: । मन्त्रयित्वा ततो<न्योन्यं राजान: सुमहाबला: ।।732॥। निर्जिता: स्मेत्यभाषन्त ज्ञात्वा वरबलं रियो: ।।733॥।। दुष्यन्त: सुरथो गाधिर्गयो राजा पुरूरवा: ।।734॥। एते सर्वेबब्रुवंस्तात निर्जिता: स्मेति पार्थिवा: ।।735।। अथायोध्यां समासाद्य रावणो राक्षसाधिप: ।।736।। सुगुप्तामनरण्येन शक्रेणेवामरावतीम् ।
सतं पुरुषशार्दूलं पुरंदर समं बले ।737।। मरुत को हराने के बाद रावण अन्य राजाओं को जीतने का उद्देश्य लेकर उनके नगरों में
गया। महेन्द्र तथा वरुण की तरह शक्तिशाली और पराक्रमी राजाओं के पास जाकर रावण ने उनसे कहा--या तो तुम मुझसे युद्ध करो या फिर तुम यह कह दो कि हम हार गए। इसके विरुद्ध जाने पर तुम्हें मुझसे छुटकारा नहीं मिलेगा। तब बुद्धिमान-धर्मज्ञ राजाओं ने आपस में विचार- विमर्श करके शत्रु की शक्ति को परखने के पश्चात् कहा--हम तुमसे हार गए हैं। सुरथ, गाधि, गय, दुष्यन्त तथा पुरुरवा राजाओं ने अपने-अपने राज्य काल में रावण से अपनी हार मानी थी। इसके पश्चात् रावण अयोध्या नगरी में जा पहुंचा। जिस तरह देवराज इन्द्र अमरावती नगरी में प्रवास करते हैं, उसी तरह अयोध्या नामक नगरी राजा पुरुष सिंह द्वारा बसायी गई थी।
प्राह राजानमासाद्य युद्ध देहीति रावण: ।
निर्जितो3स्मीति वा ब्रूहि त्॒वमेवमशासनम् ।।738॥।।
अयोध्यापतिस्तस्य श्रुत्वा पापात्मनो वच: ।
अनणण्यस्तु संक़रुद्धो राक्षसेन्द्रमथाब्रवीत ।।739।।
दीयते द्वन्द्च युद्ध ते राक्षसाधिपते मया ।
संतिष्ठ क्षिप्रमायत्तो भव चैवं भवाम्यहम् ।।740॥।
अथ पूर्व श्रुतार्थन निर्जितं सुमहद् बलम् ।
निष्क्रामत् तन्नरेन्द्रस्य बल॑ रक्षोवधोद्यतम् ।।74॥।
नागानां दश साहखं वाजिनां नियुतं तथा ।
रथानां बहु साहस पत्तीनां च नरोत्तम ।।742॥।।
महीं संछादय निष्क्रान्तं सपदाति रथं रणे ।
तत् प्रवृत्त सुमहद् सुद्धं युद्ध विशारद ।।743॥।।
अनरण्य नृपते राक्षसेन्द्रस्य चादभुतम् ।
तद् रावण बल प्राप्य बल॑ तस्य महीपते ।।744।।
प्राणश्यत तदा सर्व हव्यं हुतमिवानले ।
युद्धवा च सुचिरं काल कृत्वा विक्रममुत्तमम् ।।745।।
प्रज्वलन्तं तमासाद्य क्षिप्रमेवाप शेषितम् |
प्राविशत् संकुलं तत्र शलभा इव पावकम् ।।746।।
सो5पश्यत् तन्नरेन्द्रस्तु नश्यमानं महाबलम् ।
महार्णवं समासाद्य वनापगशतं यथा ।।747।।
ततः शक्रधनु:प्रख्य॑ धनुर्विस्फारयन् स्वयम् ।
आससाद नरेन्द्रस्तं रावणं क्रोधमूर्च्छित: ।।748॥।।
अनरण्येन ते&मात्या मारीचशुकसारणा: ।
प्रहस्त सहिता भग्ना व्यद्रवन्त मृगा इव ।।749।।
ततोवाणशतान्यष्टौ पातयामास मूर्धनि ।
तस्य राक्षसराजस्य इक्ष्वाकुकुल नन्दन: ।।750।।
रावण ने उनके पास जाकर कहा--तुम या तो मुझसे युद्ध करो या फिर कह दो कि मैं तुमसे
हार गया। यह मेरी आज्ञा है। उस पापी-दुष्ट रावण के यह वाक्य सुनकर अयोध्या पति अनरण्य
बहुत क्रोधित हुए तथा उससे इस प्रकार बोले--हे राक्षसाधिपति! मैं तुम्हारे साथ द्वन्द्ध युद्ध करना चाहता हूं। तुम मुझे थोड़ा समय दो ताकि मैं युद्ध के लिए तैयार हो जाऊं। तब तक तुम भी तैयार हो जाओ। उन्होंने रावण द्वारा दिग्विजय करने की बात पहले ही सुनी हुई थी, इसलिए उन्होंने बड़ी भारी संख्या में सेना इकट्ठी कर रखी थी। उनकी यह समस्त सेना उत्साह में भरकर रावण का वध करने के लिए नगर से बाहर आ गई। हे पुरुषश्रेष्ठ! दस सहख्र हाथी सवार, कई सहस्र रथी, एक लाख घुड़सवार और सैकड़ों पैदल सैनिक पृथ्वी को आच्छादित करते हुए युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचे। हे युद्ध विशारद! इसके पश्चात् राजा अनरण्य और रावण में भयंकर-अदभुत युद्ध होने लगा। राजा अनरण्य की वह असंख्य सेना उस समय राक्षस रावण की सेना से भिड़कर उसी प्रकार नष्ट होने लगी, जिस तरह अग्नि में आहुति पूर्णतया नष्ट हो जाती है। राजा की सेना ने बहुत समय तक उस सेना से लड़कर अपना महान पराक्रम दिखाया। परंतु
तेजस्वी रावण और उसकी पराक्रमी सेना से सामना करके वह केवल थोड़ी संख्या में ही शेष रह गई। जिस तरह अग्नि में पतंके (पतंगे) जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार वह विशाल सेना काल के मुंह में समा गई। राजा ने देखा कि उसकी विशाल सेना उसी प्रकार नष्ट होती जा रही है, जिस तरह जल से भरी नावें सागर में जाकर विलुप्त हो जाती हैं। इसके पश्चात् राजा ने अत्यंत क्रोधित होकर अपने विशाल धनुष को टंकारा और रावण से युद्ध करने के लिए स्वयं ही आगे बढ़े। जिस प्रकार शेर को देखकर हिरण भागना शुरू कर देते हैं, उसी प्रकार शुक, मारीच, सारण, प्रहस्त--राजा अनरण्य से युद्ध क्षेत्र में परास्त होकर भाग खड़े हुए। इसके बाद इक्ष्वाकुकुलनन्दन राजा अनरण्य ने राक्षसराज रावण के मस्तक पर आठ-आठ सौ बाण मारे।
तस्य बाणा: पतन्तस्ते चक्रिरे न क्षतं क्वचित् ।
वारिधारा इवाभ्रेभ्य: पतन्त्यो गिरिमूर्थनि ॥754॥।
ततो राक्षसराजेन क़ुद्धेन नृपतिस्तदा ।
तलेनाभिहतो मूर्ध्नि स रथान्रिपपात ह ।।752॥।
स राजा पतितौ भूमौ विह्नल: प्रविवेषित: ।
वज्रदग्ध इवारण्ये सालो निपतितो यथा ।।753।।
त॑ प्रहस्याब्रवीद् रक्ष इक्ष्वाकुं पृथिवीपतिम् । किमिदानी फल प्राप्तं त्वया मां प्रति युध्यता | ।754।। त्रैलोक्ये नास्ति यो द्वद्वं मम दद्यात्नराधिप ।
शड़्के प्रसक्तो भोगेषु न शृुणोषि बलं मम ।।755।। स्स्यैवं ब्रुवतो राजा मन्दासुर्वाक्यमब्रवीत् ।
किं शक््यमिह कर्तु वै कालो हि दुरितक्रम: ।।756।। नहायं निर्जितो रक्षस्त्वया चात्मप्रशंसिना ।
कालेनैव विपन्नो5हं हेतु भूतस्तु मे भवान् ।757।।
किं त्विदानीं मया शक्यं कर्तु प्राणपरिक्षये ।
महाहं विमुखी रक्षो युद्धयमानस्त्वया हतः ।।758॥। इक्ष्वाकुपरिभावित्वाद् वचो वक्ष्यामिराक्षस ।
यदि दत्तं यदि हुतं यदि मे सुकृतं तप: ।
यदि गुप्ता: प्रजा: सम्यक् तदा सत्यं चचो<स्तु मे |759।।
जिस तरह मेघों से बरसती हुई वर्षा पर्वत-शिखर को कोई हानि नहीं पहुंचा पाती, उसी प्रकार राजा द्वारा बरसाए हुए बाण रावण के शरीर को कहीं से भी नुकसान नहीं पहुंचा पाए इसके पश्चात् रावण ने क्रोध में आकर राजा के मुंह पर एक तमाचा मारा, जिसका प्रहार खाकर राजा रथ से नीचे गिर पड़े। जिस तरह बिजली गिरने पर वन में साल का पेड़ दग्ध होकर धरती पर गिर जाता है, ठीक उसी प्रकार राजा अनरण्य भी धराशायी हो गए। उस समय राक्षसराज रावण ने अनरण्य से कहा--मेरे साथ युद्ध करके तुमने क्या पा लिया? हे नरेन्द्र! तीनों लोकों में कोई भी ऐसा वीर-योद्धा नहीं है जो मुझसे द्वन्द्द युद्ध में जीत सके। मुझे लगता है, विषय-भोगों में आसक्त रहने के कारण तुमने मेरी शक्ति के विषय में कुछ भी नहीं सुना।
क्षीण प्राणशक्ति युक्त राजा अनरण्य ने यह वाक्य सुनकर उत्तर दिया--काल का उल्लंघन करने की शक्ति किसमें है? अपनी प्रशंसा करने वाले राक्षस! तुमने मुझको नहीं हराया, जबकि काल ने मुझको स्वयं विपन्न कर दिया है। तुम तो केवल निमित्त मात्र हो। अपने प्राणों को त्यागते समय मैं तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता हूं, परन्तु हे राक्षस! मैंने युद्ध से मुंह नहीं मोड़ा। मैं युद्ध करते हुए ही तेरे द्वारा मारा गया हूं। तुमने अपने व्यंग्य-वचनों से इक्ष्वाकु-वंश का अपमान किया है। अतः मैं तुमको शाप देता हूं कि यदि मैंने होम, दान-पुण्य और तप किए हैं तथा कार्यों का धर्मपूर्वक पालन किया है, तो मेरा यह वचन सत्य होकर रहेगा।
रावण को शाप
उत्पत्स्यते कुले तस्मिन्निक्ष्वाकृूणां महात्मनाम् |
रामो दाशरथिरनाम स ते प्राणान् हरिष्यति ।।760।।
ततो जलधरोदग्रस्ताडितो देवदुन्दुभि: ।
तस्मिन्नुदाहते शापे पुष्पवृष्टि रवाच्चयुता ।|76॥।
ततः स राजा राजेन्द्र गतः स्थान त्रिविष्टपम् ।
स्वर्गते च नूपे तस्मिन् राक्षस: सो5पसर्पत ।।762।।
महात्मा इक्ष्वाकु के कुल में ही दशरथ पुत्र श्रीराम का जन्म होगा। वही तुझे यमराज के पास
पहुंचाएंगे। राजा द्वारा रावण को शाप दिए जाने पर आकाश में गरजते बादलों की तरह देवताओं की दुन्दुभी बज उठी और आकाश से पुष्प रूपी वर्षा होने लगी। हे श्रीराम! इसके पश्चात् राजा अनरण्य परलोक सिधार गए। तब रावण भी वहां से अन्य जगह भ्रमण करने के लिए चला गया।
ततो वित्रासयन मर्त्यान् पृथिव्यां राक्षसाधिप: ।
आससाद घने तस्मिन् नारदं मुनिपुड्रवम् ।763।।
तस्याभिवादन: कृत्वा दशग्रीवो निशाचर: ।
अब्रवीत् कुशल पृष्टवा हेतुमागमनस्य च ।।764।।
नारदस्तु महातेजा देवर्षिरमितप्रभ: ।
अब्रवीन्मेघपृष्ठस्थो रावणं पुष्पके स्थितम् ।।765।।
राक्षसाधिपते सौम्य तिष्ठ विश्रवसः सुत ।
प्रीतो5स्म्यभिजंतेपते विक्रमै रूरजितैस्तव ।।766।।
विष्णुनादैत्यघातैश्व गन्धर्वोरगधर्षणै: ।
त्वयां सम॑ विमर्दैश्व भुशं हि परितोषित: ।।767।। इसके बाद वह राक्षसराज लोगों को भयभीत करता हुआ पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। बादलों के बीच भ्रमण करते हुए रावण की भेंट नारदजी से हुई। राक्षस रावण ने नारदजी का अभिवादन करने के बाद उनकी सकुशलता पूछी। तब बादलों की पीठ पर बैठे हुए तेजस्वी नारदजी ने पुष्पक विमान पर सवार रावण से कहा-हहेै-निश्रवा के पुत्र राक्षसआाधिपति, तनिक ठहरो! मैं तुम्हारे अत्यन्त विशाल पराक्रम को देखकर बहुत प्रसन्न हूं। नागों को युद्ध क्षेत्र में पछाड़ के तुमसे तथा दैत्यों से संग्राम करके श्री विष्णु--दोनों से ही पूर्ण रूप से मैं संतुष्ट हूं।
नारद के वचन
किंचिद् वक्ष्यामि तावत् तु श्रोतव्यं श्रोप्यसे यदि । तन्मे निगदतस्तात समार्धि श्रवणे कुरु |।768।। किमयं वध्यते तात त्वयावध्येन दैवते: ।
हत एव हायं लोको यदा मृत्युवशं गत: ।।769।।
देव दानव दैत्यानां यक्षगन्धर्वराक्षसाम् ।
अवध्येन त्ववालोक: क्लेष्टूं योग्यो न मानुष: ।।770।।
नित्यं श्रेयसि सम्मूढं महदभिव््यसनैर्वृतम् |
हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ।।77॥। तैस्तैरनिष्टोपगमैरजस्तरं यत्र कुत्र कः ।
मतिमान् मानुषे लोके युद्धेन प्रणयी भवेत् ।।772॥। क्षीयमाणं दैवहतं क्षुत्पिपासाजरादिभि: ।
विषाद शोकसम्मूढं लोकं त्वं क्षपयस्व मा |773।। पश्य तावन्महाबाहो राक्षसेश्वर मानुषम् |
मूढमेवं विचित्रार्थ यस्य न ज्ञायते गति: ।।774।। क्वचिद् वादित्रनृत्यादि सेव्यते मुदितैर्जनै: ।
रुघते चापरैरार्तैर्धाराश्रुनयनाननै: ।।775।। मातृपितृसुत स्नेह भार्याबन्धु मनौरमै: ।
मोहितो5यं जनोध्वस्तः क्लेशं स्वं नावबुध्यते 776।। तत्किमेवं परिक्लिश्य लोक॑ मोह निराकृतम् ।
जित एवत्वया सौम्य मर्त्यलोको न संशय: ।।777।। अवश्यमेभि: सर्वैश्व गन्तव्यं यमसादनम् । तन्निगृह्नीष्व पौलस्य यमं परपुरंजय ।।778।। तस्मिज्जिते जिते सर्वभवत्येव न संशय: । एवमुक्तस्तु लड्केशो दीप्यमानं स्वतेजसा ।।779।। अब्रवीन्नारदं तत्र सम्प्रहस्याभिवाद्य च ।
महर्षेदिव गन्धर्व विहार समरप्रिय ।।780।।
है तात! तुम तो देवताओं से भी पराजित नहीं हो सकते? फिर तुम इन पृथ्वीवासियों का वध
क्यों कर रहे हो? मृत्यु के अधीन होने के कारण ये तो स्वयं ही मरे हुए हैं। देवता, दानव, दैत्व, गन्धर्व, यक्ष, राक्षम--इन सभी श्रेणी से तुम अवध्य हो। फिर तुम इन संसारी प्राणियों को कष्ट क्यों पहुंचा रहे हो। यह तुम्हारे यश को शोभा नहीं देता। जब मनुष्य केवल अपने ही बारे में सोचने के कारण महान् व्यसनों से परिपूर्ण है तथा रोग एवं वृद्धावस्था आदि अनेक संकटों से घिरे हुए हैं, तो उन्हें कोई वीर योद्धा क्यों मारे? जहां पर लोग अनिष्टों से पीड़ित तथा यहां-वहां ग्रस्त दिखाई पड़ते हैं, भला उस मनुष्य लोक के लोगों को कोई बुद्धिमान एवं युद्ध-प्रिय वीर क्यों मारना चाहेगा? यह पृथ्वी तो भूख, प्यास, बुढ़ापे आदि अनेक मुश्किलों के कारण क्षीण होती जा रही है। तुम ऐसे शोकग्रस्त एवं विषाद लोक का विनाश मत करो। है बलवान राक्षसराज! तुम मनुष्यों को जरा ध्यान से देखो। ये मनुष्य अनेक प्रकार से अपने स्वार्थ कार्यों को निकालने में लगे रहते हैं। इनको अपनी दुर्गति होने का ख्याल नहीं होता। कुछ लोग तो गायन-वादन आदि से संबंधित कार्य करते हुए प्रसन्नचित्त बने रहते हैं तो कुछ लोग अपने जीवन में आने वाले दुःखों की वजह से आंसू बहाते रहते हैं। यह मनुष्य माता, पिता, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री एवं पत्नी के मोह में ध्वस्त हो जाते हैं। उनको किसी बंधन जनित क्लेश का भी किसी प्रकार से कोई अनुभव नहीं होता। अतः मोह के कारण जो लोग स्वयं कष्ट भोग रहे हों, उनको कष्ट देकर तुमको क्या मिलेगा? हे सौम्य! मृत्युलोक पर तो तुमने विजय प्राप्त कर ही ली है, इसमें कोई संदेह नहीं है। हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले पौलस्त्य! पृथ्वी के इन सभी लोगों को यमलोक में जाना ही पड़ता है। यदि तुम बलवान तथा पराक्रमी हो तो यमलोक में यमराज पर अपनी विजय की पताका लहराओ। यदि तुमने उनको जीत लिया तो तुम निस्संदेह सभी को जीत जाओगे। नारदजी के यह कहने पर अपने तेज से प्रदीप्त लड़कापति ने नारदजी को प्रणाम करते हुए
कहा--हे महर्षि! आप गन्धर्वों तथा देवताओं के लोकों में भ्रमण करते हैं तथा युद्ध देखने की इच्छा रखते हैं। अब मैं रसातल में विजय प्राप्त करने के लिए जा रहा हूं। तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करके देवताओं और नागों को वश में करूंगा।
समुद्रममृतार्थ च मथिष्यामि रसालयम् ।
अथाब्रवीद् दशग्रीवं नारदो भगवानृषि: ।।78॥।
क्व खल्विदानी मार्गेण त्वयेहान्येन गम्यते ।
अयं खलु सुदुर्गम्य: प्रेतराजपुरं प्रति |782।।
मार्गो गच्छति दुर्धर्ष यमस्यामित्रकर्शन ।
सतु शारदमेद्यामं हासंमुक्त्वा दशानन: ।।783।।
उवाच कृतमित्येव वचन चेदमब्रवीत ।
तस्मादेवमहं ब्रह्मन् वैवस्वतवधोद्यत: ।।784।।
गच्छामि दक्षिणामाशां यत्र सूर्यात्मजो नृपः ।
मया हि भगवन् क्रोधात् प्रतिज्ञातं रणार्थिना ।785।।
अवजेष्यामि चतुरो लोकपालानिति प्रभो ।
तदिह प्रस्थितो5हं वै पितृराजपुरं प्रति |786।।
प्राणिसंक्लेशकर्तारं योजयिष्यामि मृत्युना ।
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मुनिं तमभिवाद्य च ।।787।।
प्रययौ दक्षिणामाशां प्रविष्ट: सह मन्सत्रिभि: ।
नारदस्तु महातेजा मुहूर्त ध्यानमास्थित: ।।788।।
चिन्तयामास विप्रेन्द्रो विधूम इव पावक: ।
येन लोकास्त्रय: सेन्द्रा: क्लिश्यन्ते सचराचरा: |।789॥।
क्षीणे चायुषि धर्मेण स कालो जेष्यते कथम् ।
स्वदत्तकृतसाक्षी यो द्वितीय इव पावक: ।।790॥।
लब्धसंज्ञा विचेष्टन्ते लोका यस्य महात्मन: ।
यस्य नित्यं त्रयो लोका विद्रवन्ति भयाद्दिता: ।।79।।
त॑ कथंराक्षसेन्द्रो&सौ स्वयमेव गमिष्यति ।
यो विधाता च धाता च सुकूंत दुष्कृतं तथा ।।792।।
त्रैलोेक्यं विजितं येन तं कथं विजयिष्यते ।
अपरं किं तु कृत्वैवं विधानं संविधास्यति ।।793।।
कौतूहलं समुत्पन्नो यास्यामि यमसादनम् ।
विमर्द द्रष्टमनयोर्यमराक्षसयो: स्वयम् ।।794।।
अब मैं अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन करूंगा। जब रावण ने यह कहा तो देवर्षि नारद बोले--यदि तुम रसातल जा रहे हो तो रसातल का मार्ग छोड़कर, दूसरे मार्ग से क्यों जा रहे हो? जिस मार्ग से तुम जा रहे हो, वह तो प्रेतताज लोक की तरफ जा रहा है। यह रास्ता तो यमराज के यमलोक की तरफ होकर जाता है। नारदजी के यह वाक्य सुनकर रावण शरद् ऋतु के गरजते हुए बादलों के समान हंसता हुआ बोला--मैं आपके कहे वचनों को समझ गया हूं। इसके पश्चात् वह बोला-हे ब्रह्म! अब मैं यमराज का वध करने के लिए उत्सुक होकर, उसी दक्षिणी दिशा में जा रहा हूं, जहां पर यमराज निवास करते हैं। मैंने यमराज से युद्ध करने की प्रतिज्ञा ली है। अब मैं इस ब्रह्मांड के चारों लोकपालों को युद्ध क्षेत्र में परास्त करूंगा। इसलिए मैं सर्वप्रथम यमलोक को प्रस्थान करता हूं। जो यमराज प्राणियों को कष्ट देता है, मैं उसको मृत्यु के साथ बांध दूंगा। यह कहने के पश्चात् रावण ने देवर्षि का अभिवादन किया। इसके बाद वह अपने मंत्रियों के साथ दक्षिण दिशा की ओर चला गया। उस समय परम तेजस्वी देवर्षि नारदजी कुछ घड़ी के लिए अंतर्धान हो गए। धूम्र-रहित अग्नि
के समान परम तेजस्वी देवर्षि नारदजी यह सोचने लगे कि जो यमराज आयु क्षीण होने पर इन्द्र सहित तीनों लोकों के सचराचर जीवों को दण्ड देने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं, उन्हें यह राक्षसराज रावण किस तरह से जीत सकेगा? जो यमराज दूसरी अग्नि के समान परम तेजस्वी हैं तथा जीवों को दान देने वाले एवं उनके कर्म के साक्षी हैं, जिनसे तीनों लोकों के समस्त प्राणी भयभीत होकर दूर भागते हैं तथा जिन महात्मा से चेतना पाकर लोग कई प्रकार की चेष्टा करते हैं, उन परम तेजस्वी यमराज के पास यह राक्षस रावण स्वयं कैसे पहुंच जाएगा? जो जन्म देने वाले, पालन करने वाले और लोगों को पाप-पुण्यों का फल प्रदान करने वाले हैं तथा जिन यमराज ने तीनों लोकों पर अपने विजय की पताका लहरायी है, उन पर यह रावण कैसे विजय प्राप्त कर सकेगा? यह राक्षसराज रावण काल के अतिरिक्त किसी अन्य उपाय का सहारा लेकर उनको परास्त करेगा? मेरे मन में भी अब आशंका पैदा होने लगी है। अब मैं भी यमराज और राक्षसराज रावण का घोर युद्ध देखने के लिए यमलोक की ओर चलता हूं।
रावण का यमलोक पर आक्रमण
एवं संचिन्त्य विप्रेन्द्री जगाम लघुविक्रम: ।
आख्यातुं तद् यथावृत्तं यमस्य सदनं प्रति ||795।।
अपश्यत् स यम॑ तत्र देवमग्निपुरस्कृतम् ।
विधानमनुतिष्ठन्तं प्राणिनो यादूशम् ।।796।।
सतु दृष्टवा यम: प्राप्तं महर्षि तत्र नारदम् |
अब्रवीत् सुखमासीनमर्ध्यमावेध धर्मत: ।।797।।
कच्चित् क्षेम॑ नु देवर्षे कच्चिद् धर्मो न नश्यति ।
किमागमन कृत्य॑ ते देवगन्धर्व सेवित ।।798।।
अब्रवीत तु तदा वाक््यं नारदो भगवानृषि: ।
श्रूयतामभिधास्यामि विधानं च विधीयताम् ।।799॥।
एव नाम्ना दशग्रीवः पितृराज निशाचर: ।
उपयाति वंश नेतुं विक्रमैस्त्यां सुदुर्जयम् ।800।।
एतेन कारणेनाहं त्वरितो ह्यागतः प्रभो ।
दण्डप्रहरण स्याद्य तव कि नु भविष्यति ।।804॥।
देवर्षि नारदजी अपने मन में यह विचार करके रावण द्वारा यमलोक पर आक्रमण का
समाचार लिए यमलोक जा पहुंचे। नारदजी ने वहां पहुंचकर देखा कि यमराज अग्नि के समान खड़े हुए हैं तथा प्राणियों ने जैसा कर्म किया है, उसी प्रकार के फल प्रदान कर रहे हैं। नारदजी को वहां आया हुआ देखकर यमराज ने अर्घ्य के द्वारा उनका आदर-सत्कार करवाते हुए उन्हें धर्मपूर्वक श्रेष्ठ आसन पर बैठाया। यमराज ने कहा--हे देवता तथा गन्धर्वों से सेवित देवर्षि! सब कुछ ठीक प्रकार से है? कहीं धर्म का विनाश तो नहीं हो रहा है? आज आपका यमलोक में आना किस उद्देश्य को प्रकाशित करता है। यमराज के यह वाक्य सुनकर देवर्षि नारदजी ने कहा--मैं आज आपको एक विशेष समाचार देने आया हूं। आपको शीघ्र ही इसका कोई उपाय सोचना है। हे पितृराज! दुर्जेय एवं पापी राक्षसराज दशग्रीव आप पर विजय पाने के उद्देश्य से यमलोक आने वाला है। हे प्रभो! मैं इसी कारण शीघ्रता से यहां आपके पास चला आया हूं। आप तो स्वयं काल को धारण करने वाले हैं, अतः उस राक्षस रावण के प्रहार से आपको क्या हानि होगी?
एतस्मिन्नन्तरे दूरादंशुमन््तमिवोदितम् |
दहशुदीरपप्तमायान्तं विमान तस्य रक्षस: ।802॥।
तं देशं प्रभया तस्य पुष्पकस्य महाबल: |
कृत्वा वितिमिरं सर्वसमीपभ्यवर्तत ।॥803।।
सो<5पश्यत््स महाबाहुर्दशग्रीव स्ततस्तत: ।
प्राणिन: सुकृंत चैव भुग्जानांश्वैव दुष्कृतम् ।।804॥।।
अपश्यत् सैनिकांश्वास्य यमस्यानुचरै: सह: ।
यमस्य पुरुषैरुग्रैथोरिरुपैर्भयानकै: ।।805।।
ददर्श वध्यमानांश्व क्लिभ्यमानांश्व देहिनः ।
क्रोशतश्न महानादं तीव्रनिष्टनतत्परान् ।।806।।
कृमिभिर्भक्ष्ममाणांश्व सारमेयैश्व दारुणै: । श्रोत्रायासकरा वाचो वदतश्न भयावहा: ।॥807।। अभी यह वार्तालाप चल ही रहा था कि सूर्य के समान तेजस्वी उस राक्षसराज का विमान
आता हुआ दिखाई दिया। पराक्रमी राक्षस रावण उस स्थान के अंधकार को अपने पुष्पक विमान की प्रभा से काटता हुआ अत्यंत समीप आ पहुंचा। महाबली रावण ने यमलोक में आकर देखा कि सभी प्राणी अपने-अपने पाप तथा पुण्यों के फल भोग रहे हैं। रावण ने वहां पर यमराज को अपने सैनिकों तथा अनुचरों के साथ देखा। इसके अलावा उसने उग्र प्रकृति तथा प्रचंड रूप वाले भयानक यमदूतों को भी देखा, जो देहधारियों को बांधकर उन्हें कई प्रकार के कष्ट दे रहे थे। वे यमदूतों के प्रहार के कारण जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। किसी प्राणी को कुत्ते नोच रहे थे तथा 8३ को कीड़े खा रहे थे। परिणामस्वरूप वे कानों को कष्टदायक एवं भयानक शोर प्रदान कर रहे थे।
संतार्यमाणान् वैतरणीं बहुश: शोणितोदकाम् ।
बालुकासुच तप्तासु तप्यमानान् मुहुर्मुहु: ।।808।।
असिपत्रवने चैव मिद्यमानान धार्मिकान् |
रौरवै क्षारनद्यां च क्षुरधारासु चैव हि ।।809॥।
पानीयं याचमानांश्व तृषितान् क्षुधितानपि ।
शवभूतान् कृशान् दीनान् विवर्णान् मुक्तमूर्थजान् ।।80।।
मलपड्कधरान् दीनान् रुक्षांश्व परिधावत: ।
ददर्शरावणो मार्गे शशशो5थ सहख्रश: ।।84॥।
कांश्विच्च गृहमुख्येषु गीतवादित्रनिःस्वनै: ।
प्रमोदमानानद्राक्षीद् रावण: सुकृतैः स्वकैः ।॥8 2।।
गोससं ग्रोप्रदातारो हान्न॑ चैषान्नदापिन: ।
गहांश्व गृहदातार: स्वकर्मफलमश्नतः ।॥83।।
सुवर्ण मणिमुक्ताभि: प्रमदाभिरलंकृतान् ।
धार्मिकानपरांस्तत्र दीप्यमानान् स्वतेजसा ।।84॥।
किसी को तपती हुई बालू पर बार-बार चलाकर कष्ट दिया जाता था तो किसी को खून से
भरी हुई वैतरणी नदी पार करने के लिए विवश किया जाता था। कुछ पापियों को तलवार की तरह नुकीले तीक्ष्ण पत्तों वाले असिपत्र वन में विदीर्ण किया जा रहा था, तो कुछ को रौरव नरक के खारे पानी में अर्थात् खारे पानी की नदियों में डुबाया तथा कंटीले क्षुर धार पर दौड़ाया जा रहा था। अनेक भूखे-प्यासे लोग भोजन तथा पानी की मांग कर रहे थे। कोई शव, कड़्काल, दीन, विवर्ण, कृश तथा बिखरे बालों वाला था। कई प्राणी तो कीच तथा मल में अपने शरीर को लपेटे यत्र-तत्र दौड़ रहे थे। इस प्रकार रावण ने सैकड़ों प्राणियों तथा लोगों को भयंकर यातनाएं सहते हुए देखा। दूसरी तरफ रावण ने वह दृश्य भी देखा जहां पर लोग उत्तम घरों में निवास करते हुए गायन तथा वादन आदि मनोरंजन से आनन्दित हो रहे थे। जो लोग गाय, गोरस, अनाज तथा गृह आदि का दान करते थे, वह लोग अपनी दान की वस्तुओं का कुशलतापूर्वक उपभोग कर रहे थे। कई लोग मणि-मुक्ता, स्वर्ण और सुन्दर युवतियों से सुशोभित अड़कान्ति से प्रकाशित हो रहे थे।
ददर्श स महाबाहू रावणो राक्षसाधिप: ।
ततस्तान् भिद्यमानांश्व कर्मभिर्दुष्कृते: स्मकै: ।।85।।
रावणो मोचयामास विक्रमेण बलाद् बली ।
प्राणिनों मोक्षितास्तेन दशग्रीवेणरक्षसा ।।86।।
सुखमायुर्मुहूर्तु ते हतर्कितम् चिन्तितम् ।
प्रेतेषु मुच्यमानेषु राक्षसेन महीयसा ।॥87।।
प्रेतगोपा: सुसंक्रुद्धा राक्षसेन्द्रमभिद्रवन् ।
ततो हलहलाशब्द: सर्वदिग्भ्य: समुत्थित: ।।88॥।
महाबली रावण ने उन सभी लोगों को देखा। फिर उसने अपने पाप-पुण्य कर्मों को भोगने
वाले उन लोगों को अपने बल से जबरदस्ती मुक्त कर दिया। इस कारण उन प्राणियों ने कुछ समय के लिए अप्रत्याशित सुखों का अनुभव प्राप्त किया। जब रावण बलपूर्वक प्रेतों को मुक्त करने लगा, तो यमलोक के यमदूत अत्यंत क्रोधित होकर रावण पर टूट पड़े। उस समय सभी दिशाओं में शोर-शराबे का स्वर गूंज उठा।
धर्मराजस्य योधानां शूराणां सम्प्रधावताम्
ते प्रासै:ः परिथै: शूलैर्मुसलै: शक्ति तोमरै: ।।89॥।
पुष्पकं समधर्षन्त शूरा: शतसहख्रश: |
तस्यासनानि प्रासादान वेदिकास्तोरणानि च ।।820॥।
पुष्पकस्य बभुज्जुस्ते शीघ्रं मधुकरा इव ।
देवानिष्ठानभूतं तद्विमानं पुष्पकं॑ मृथे 82॥।
भज्यमानं तथैवासीदक्षयं ब्रह्मतेजसा ।
असंख्या सुमहत्यासीत् तस्य सेना महात्मन: ।।822॥।
शूराणामग्रयातृणां सहस्राणि शतानि च |
ततौ वृक्षेश्व शैलैश्व प्रासादानां शतैस्तथा ।।823॥।।
ततस्ते सचिवास्तस्य यथाकामं यथाबलम् ।
अयुध्यन्त महावीरा: स च राजा दशानन: ।॥824।।
ते तु शोणितदिग्धाड़ा सर्वशस्त्रसमाहता: ।
अमात्य राक्षसेन्द्रस्य चक़ुरायोधनं महत् ।825॥।।
यमराज के शूरवीर राक्षस रावण के विमान पर उसी प्रकार टूट पड़े, जिस प्रकार खिले हुए
फूल पर भंवरों के झुंड मंडराते हैं। उन शूरवीरों ने शूल, मूसल, परिघ, तोमर तथा शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रों को लेकर पुष्पक पर आक्रमण कर दिया। उन हजारों-सैकड़ों वीर योद्धाओं ने पुष्पक विमान के आसनों, प्रासाद, तोरणों और वेदी को ध्वस्त कर दिया। लेकिन तोड़-फोड़ करने के पश्चात् भी वह देवताओं का अधिष्ठान-भूत पुष्पक विमान दोबारा वैसा ही हो गया, जैसा तोड़- फोड़ के पहले था। क्योंकि वह विमान ब्रह्मतेज के कारण अक्षय था। यमराज के शूरवीर योद्धा आगे बढ़कर घोर युद्ध करने लगे। यह देखकर राक्षसराज रावण तथा उसके मन्त्रीगण भी यमलोक के पर्वत, पेड़ एवं अन्य प्रासादों को उखाड़ कर उसकी पूरी शक्ति के साथ शत्रुओं पर फेंकने लगे। उनके शरीर के अंगों से रक्त का रिसाव हो रहा था। वे भयानक शश्त्रों के प्रहार से बुरी तरह घायल हो चुके थे, लेकिन तब भी रावण के सभी मंत्री घोर युद्ध कर रहे थे।
रावण पर बाण-वर्षा
अन्योन्यं ते महाभागा जष्नु: प्रहरणैर्भशम ।
यमस्य च महाबाहो रावणस्य च मन्त्रिण: ।।826।।
अमात्यांस्तांस्तु संत्यज्य यमयोधा महाबला: ।
तमेव चाभ्यधावन्त शूलवर्षैर्दशाननम् ।॥827।।
ततः शोणितदिग्धाड़: प्रहारैर्जर्जरीकृत: ।
फुल्लाशोक इवाभाति पुष्पके राक्षसाधिप: ।।828॥।।
स तु शूलगदा प्रासाउछंक्ति तोमरसायकान् ।
मुसत्नानि शिलावृक्षान् मुमोचास्त्रबलादू बली ।।829।।
तरूणां च शिलानां च शस्त्राणां चातिदारुणम् ।
यमसैन्येषु तद् वर्ष पपात धरणीतले ।॥830।।
तांस्तु सर्वान् विनिर्भिद्य तदस्त्रमपहत्य च ।
जष्नुस्ते राक्षसं घोरमेके शतसहस्रश: ।॥83|।
परिवार्य च त॑ सर्वे शैलं मेघोत्करा इव ।
भिन्दिपालैश्व शूलैश्व निरुच्छवासमपोथयन् ।॥832।।
विमुक्त कवच: क्रुद्ध: सिक्त: शोणितविस्रवै: ।
ततः स पुष्पकं त्यकत्वा पृथिव्यामवतिष्ठत ।।833।।
ततः स कार्मुकी वाणी समेर चाभिवर्धत ।
लब्धसंज्ञो मुहूर्तेन क़ुद्धस्तस्थौ यथान्तक: ।॥834।।
ततः पाशुपतं दिव्यमस्त्रं संधाय कार्मुके ।
तिष्ठ तिष्ठेति तानुक्त्वा तच्चापं व्यपकर्षत ।।835॥।।
आकर्णात् स विकृष्याथ चापमिन्द्रारिराहवे ।
मुमोच त॑ शरं क़ुद्धस्त्रिपुरे शंकरो यथा ।।836।।
तस्य रूपं शरस्यासीत् सधूमज्वालमण्डलम् ।
वन॑ दहिष्यतो धर्मे दावाग्नेरिव मूर्च्छत: |।837।।
ज्वालामाली स तु शर:ः क्रव्यादानुगतो रणे ।
मुक्तो गुल्मान् द्रुमांश्रापि भस्म कृत्वा प्रधावति ।838॥।
ते तस्य तेजसा दग्धा: सैन्या वैवस्वतस्य तु ।
रणे तस्मिन् निपतिता माहेन्द्रा इव केतव: ।।839॥।
ततस्तु सचिवै: सार्थ राक्षसों भीमविक्रम: ।
ननाद सुमहानादं कम्पयन्निव मेदिनीम् ।।840।।
हे महाप्रभो श्रीराम! रावण और यमराज के मंत्रियों ने एक-दूसरे पर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार
शुरू कर दिया। इसके बाद यमराज के शूरवीर योद्धाओं ने रावण के मन्त्रियों को छोड़कर रावण के ऊपर बाण-वर्षा शुरू कर दी। रावण का पूरा शरीर उस समय अस्त्र-शस्त्रों के प्रहार से ध्वस्त- जर्जर हो गया। उसके सभी अंगों से खून बहने लगा। राक्षसराज रावण अपने पुष्पक विमान पर अशोक वृक्ष के समान, खून से लथपथ दिखाई देने लगा। इसके पश्चात् पराक्रमी रावण ने भी
अपने बाणों, शिला, शक्ति, तोमर, मूसल, शूल, गदा, प्रास तथा वृक्षों की वर्षा शुरू कर दी। शस्त्रों की वह भयंकर वर्षा वहां पर खड़े यमराज के सैनिकों पर पड़ने लगी। तब सैकड़ों की तादाद में वह सैनिक, रावण द्वारा बरसाए गए श'स्त्रों का सामना करते हुए, रावण पर अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करने लगे। जिस प्रकार पर्वत पर मेघों का झुरमुट चारों तरफ से जल वर्षा करता है, उसी प्रकार उन सैकड़ों सैनिकों ने राक्षस रावण को शूलों और भिन्दपालों से भेदना शुरू कर दिया। तब रावण को सांस लेने का भी मौका नहीं मिला। कवच कट जाने तथा शरीर से रक्त बहाव होने पर क्रोधित रावण पुष्पक विमान को छोड़ पृथ्वी पर खड़ा हो गया। कुछ क्षण रावण अपने आपको संभालने के पश्चात् यमराज की तरह क्रोधित हो उठा। रावण
ने अपने धनुष पर “पाशुपत” अस्त्र को चढ़ाकर तथा यमराज के सैनिकों को “ठहरो” कहते हुए अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची। जिस तरह भगवान् शिव ने क्रोध में आकर शुक पर पाशुपत अस्त्र छोड़ा था, उसी प्रकार रावण ने अपने धनुष की प्रत्यंचा को खींचकर यमराज की सेना पर छोड़ दिया। उस ज्वाला और धूम्र के मण्डल युक्त बाण से ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे ग्रीष्म काल में वनों में चारों तरफ दावानल फैल गई हो। ज्वालाओं से घिरा हुआ वह बाण युद्ध क्षेत्र के वृक्षों तथा झाड़ियों को काटता हुआ शीघ्रता से आगे बढ़ रहा था। उसके पीछे सैनिक तथा जीव- जन्तु भी चल रहे थे। यमराज के सभी सैनिक उस बाण के डर से भयभीत होकर इन्द्र वज्ञ की भांति युद्ध क्षेत्र में गिर पड़े। इसके पश्चात् वह परम तेजस्वी-महापराक्रमी राक्षस रावण अपने मन्त्रियों के साथ जोर-जोर से गरजने लगा, जिसकी भयानक आवाज से संपूर्ण पृथ्वी कांप उठी।
स तस्य तु महानादं श्रुत्वा वैवस्व॒त: प्रभु: ।
शत्रुं विजयिन॑ मेने स्वबलस्य च संक्षयम् ।।84॥।
सहि योधान् हतान् मत्वा क्रोधसंरक्त लोचन: ।
अब्रवीत् त्वरित: सूतं रथो मे उपनीयताम् ।।842।।
तस्य सूतस्तदा दिव्यमुपस्थाप्य महारथम् ।
स्थित: स च महातेजा अध्यारोहत तं॑ रथम् ।॥843।।
प्रास मुद्गर हस्तश्न मृत्युस्तस्याग्रत: स्थित: ।
येन संक्षिप्यते सर्व त्रेलोक्यमिदमव्ययम् ।।844।।
कालदण्डस्तु पारश्वस्थो मूर्तिमानस्य चाभवत् |
यम प्रहरणं दिव्यं तेजसा ज्वलदग्निवत ।॥845।।
तस्य पाश्चेषु निच्छिद्रा: कालपाशा: प्रतिष्ठिता: ।
पावकस्पर्शसंकाश: स्थितो मूर्तश्चमुदूगर ।।846।।
ततो लोकत्रयं क्षुब्धमकम्पन्त दिवौकस: ।
काल दृष्टवा तथा क्ुद्धं सर्वलोक भयावहम ।॥847।।
ततस्त्वचोद्यत सूतस्तानश्चान् रुचिर प्रभान् ।
प्रययौं भीमसंनादो यत्र रक्ष:पति: स्थित: ।।848।।
मुहूर्तेन यमं ते तु हया हरिघ्योपमा: ।
प्रापयन् मनसस्तुल्या यत्र तत् प्रस्तुतं रणम् ।।849।।
दृष्टवा तथैव विकृतं रथं मृत्युसमन्वितम ।
सचिवा राक्षसेन्द्रस्य सहसा विप्रदुद्रुवु: ।850॥।
रावण की उस घोर गर्जना को सुनकर भगवान यम ने यह समझा कि शत्रु विजयी हुआ है और मेरी सेना नष्ट हो गई है। उसने मेरे योद्धा मार डाले--यह जानकर यमराज के नेत्र क्रोध से लाल हो गए। तदुपरांत उन्होंने अपने सारथी से कहा--मेरा रथ शीघ्र ले आओ।
तब सारथी ने एक दिव्य तथा विशाल रथ उपस्थित कर दिया। फिर महा तेजस्वी यमराज उस रथ पर आरूढ़ हो गए। उनके अग्रभाग में प्रास तथा मुद्गर हाथ में लिए मृत्युदेव खड़े थे, जो इस सम्पूर्ण त्रिभुवन के प्राणियों का संहार करते रहते हैं। उनके पार्श्व भाग में साकार कालदण्ड खड़ा हुआ था, जो यमराज का मुख्य आयुध था। वह अपने तेज से अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। उनके दोनों बगल में छिद्र रहित काल पाश खड़े हुए थे तथा अग्नि तुल्य दुस्सह स्पर्श वाला मुद्गर भी साकार रूप धारण किए खड़ा था।
काल को कुपितावस्था में देखकर चारों तरफ हलचल-सी हो गई। सभी देवतागण भयभीत होकर कांप उठे। सुंदर कान्ति वाले रथ के घोड़ों को हांकता हुआ सारथी आगे को बढ़ चला। घोर भयंकर शब्द करता हुआ वह रथ वहां जा पहुंचा, जहां राक्षस रावण खड़ा हुआ था। उस रथ के मन के समान शीघ्रगामी और इन्द्र के घोड़ों के समान तेजस्वी घोड़ों ने यमराज को क्षण भर में ही उस स्थान पर पहुंचा दिया, जहां पर युद्ध हो रहा था। उस विकराल एवं भयानक आकार के रथ सहित मृत्युदेवता यमराज को देखकर रावण के मन्त्रीगण युद्ध क्षेत्र छोड़कर भाग गए।
यमराज का क्रोधित होना
लघुसत्त्वतया ते हि नष्टसंज्ञा भयार्दिता: ।
मेह योद्धुं समर्था:स्म इत्युक्त्वा प्रययुर्दिश: ।85।। सतुतं तादृशं दृष्टवा रथं॑ लोकभयावहम् |
नाक्षुभ्यत दशग्रीवो न चापि भयमाविशत् ।।852।। स तु रावणमासाद्य व्यसृजच्छक्तितोमरान् ।
यमो मर्माणि संक़्ुद्धो रावणस्य न्यकृन्तत ।।853॥। रावणस्तु ततः स्वस्थ: शरवर्ष मुमोच ह ।
तस्मिन् वैषस्वतरथे तोयवर्षमिवाम्बुद: ।854॥। ततो महाशक्ति शतैः पात्यमानैर्महोरसि ।
नाशक्रोत् प्रति कर्तु स राक्षस: शल्यपीडितः ।॥855।। एवं नाना प्रहरणैर्यमेनामित्रकर्षिणा ।
सप्तरात्रं कृत: संख्ये विसंज्ञो विमुखो रिपु: ।।856॥। तदा<<सीत् तुमुल॑ युद्ध यमराक्षसयोर्द्धयो: । जयमाकांक्षतोर्वीर समरेष्वनिवर्तिनो: ।॥857।।
ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्व परमर्षय: ।
प्रजापति पुरस्कृत्य समेतास्तव्रणाजिरे |।858॥। संवर्त इव लोकानां युध्य तोरभवत् तदा ।
राक्षसानां च मुख्यस्य प्रेतनामी श्वरस्य च ।।859।। राक्षसेन्द्रोडपि विस्फार्य चापमिन्द्राशनि प्रथम् ।
निरन्तर मिवाकाशं कुर्वन बांणांस्ततो5सृजत् ।॥860।। रावण के मंत्री अल्पशक्ति के थे, अतः वे भयभीत हो, अपने होश-हवास खोकर यह कहते
हुए चारों तरफ भाग रहे थे कि हम यह युद्ध करने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन पूरे संसार को भयभीत करने वाले उस विशाल रथ को देखकर भी रावण तनिक क्षुब्ध तथा भयभीत नहीं हुआ। यमराज ने वहां पहुंचते ही रावण पर क्रोधित होकर तोमरों एवं शक्तियों का प्रहार कर उसके मर्मस्थलों को भेद डाला। इसके बाद रावण ने भी संभलकर यमराज पर अपने बाणों का प्रहार शुरू कर दिया, जैसे मेघ वर्षा कर रहे हों। तब यमराज ने रावण की छाती पर अनेक शक्तियों का ऐसा प्रहार किया कि वह अत्यन्त पीड़ित हो उठा तथा बदला लेने में असमर्थ हो गया। परिणामस्वरूप रावण अपनी सुध-बुध खोकर युद्ध से विमुख हो गया। इसके पश्चात् राक्षसराज रावण तथा यमराज आपस में तुमुल युद्ध करने लगे। वे दोनों ही विजय प्राप्त करने के अभिलाषी थे और युद्ध क्षेत्र से अपने आपको हटाना नहीं चाहते थे। तब ब्रह्माजी को आगे कर देवता, गंधर्व, सिद्ध तथा महर्षिगण उस युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचे। उस समय राक्षसराज रावण और यमराज के युद्ध के कारण तीनों लोकों में प्रलयकाल जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया था। राक्षसराज रावण भी इन्द्र की आशनि की तरह अपने धनुष को खींच भयंकर बाणों की वर्षा कर रहा था। लानत सारा आकाश बाणों के प्रहार से भर चुका था तथा वहां पर कोई भी रिक्त स्थान नहीं था।
मृत्युं चतुर्भिषिशिरवै: सूतं सप्तभिरार्दयत् ।
यमं शत सहस्रेण शीघ्र मर्मस्वताडयत् ।।86॥।
ततः क्रुद्धस्य वदनाद् यमस्य समजायत् ।
ज्वालामाली सनिः:श्वास: सधूम: कोपपावक: ।॥862॥।
तदाश्चर्यमथो दृष्टवा देवदानवसंनिधौ ।
प्रहर्षितौ सुंसरब्धौ मृत्युकालौ बभूवतु: ।।863।।
ततो मृत्यु:क्रुद्धतरो वैवस्वतमभाषत ।
मुछ्च मां समरे यावद्धन्मीमं पापराक्षसम् ।।864॥।
नैषा रक्षो भवेदद्य मर्यादा हि निसर्गतः ।
हिरण्यकशिपु: श्रीमान् नमुचि: शम्बरस्तथा ।।865॥।
निसन्दिर्धूमकेतुश्च॒ बलिवैंरोचनो5पि च ।
शम्भुर्देत्यो महाराजो वृत्रो बाणस्तथैव च ।।866।।
राजर्षय: शास्त्रविदो गन्धर्वा: समहोरगा: ।
ऋषय:पन्नगा दैत्या यक्षाश्र ह्मप्सरोगणा: ।।867।।
युगान्तपरिवर्ते च पृथिवी समहार्णवा |
क्षयं नीता महाराज सपर्वतसरिदद्ुमा ।।868॥।।
एते चान्ये च बहवो बलवन्तो दुरासदा: ।
विनिपन्ना मया दृष्टा: किमुतायं निशाचर: ।।869॥।
मुछ्च मां साधु धर्मज्ञ यावदेनं निहन्म्यहम् ।
नहि वल्रिन्मया दृष्टो बलवानपि जीवति ।॥870।।
रावण ने चार बाण मारकर मृत्यु को तथा सात बाण मारकर यमराज के सारथी को घायल
कर दिया। इसके पश्चात् रावण ने एक लाख बाणों से यमराज के मर्मस्थलों पर चोट पहुंचाई। उस समय यमराज बहुत अधिक क्रोधित हो उठे। उनका वह क्रोध अग्नि के रूप में प्रकट हुआ, जिसके कारण वह स्वरूप ज्वाल-माला नि:श्वास तथा धूम्राच्छन्न दिखाई देने लगी। उस अद्भुत आश्चर्य को देखकर देवता तथा दानवों के पास रोष से भरे हुए मृत्युदेव और सारथी बहुत खुश हुए। इसके पश्चात् क्रोध में आकर मृत्युदेव यमराज ने मनु से कहा--आप मुझे छोड़ दीजिए तथा आज्ञा दीजिए कि मैं इस दुष्ट, पापी, राक्षस रावण को युद्ध क्षेत्र में मृत्यु को सौंप सकूं। हे श्रीमान! यह तो स्वाभाविक है कि यह राक्षस मुझसे युद्ध करके जीवित नहीं बच सकता। कितने ही राजर्षि, सास्त्रज्ञ, गन्धर्व, बड़े विशाल नाग, ऋषि, दैत्य, पन्नग, यक्ष, अप्सराएं, हिरण्यकशिपु, नमुचि, निसन्दि, शम्बर, धूम्रकेतु, विरोचन पुत्र बलि, शम्भु दैत्य, महाराज वृत्र, वाणासुर आदि कई राजर्षि, युगान्त के बदलते समय समुद्रों, सरिताओं और वृक्षों सहित पृथ्वी--ये सभी मेरे द्वारा विनाश को प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा कई शूरवीर-बलवान् योद्धा भी केवल मेरी दृष्टिमात्र से ही विनाश को प्राप्त हो गए, फिर यह राक्षस किस गणना में आता है। हे साधु! हे धर्मज्ञ! जब तक मैं उसको मार नहीं देता, तब तक आप मुझको मुक्त कर दें। ऐसा कोई भी पराक्रमी नहीं है जो एक बार मेरी दृष्टि पड़ने के बाद मेरे हाथों जीवित बच सके।
ब्रह्माजी का हस्तक्षेप
बल॑ मम न खल्वेतन्मयदिषा निसर्गतः ।
स दृष्टो न मया काल मुहूर्तमपि जीवति ।।87॥। तस्यैवं वचन श्रुत्वा धर्मराज: प्रतापवान् ।
अब्रवीत् तत्र त॑ मृत्युं त्वं तिष्ठैन॑ं निहन्म्यहम् ।।872।। ततः संरक्त नयनः क्ुद्धों वैवस्वतः प्रभु: । कालदण्डममोघं तु तोलयामास पाणिना ।।873॥। यस्य पार्श्रषु निहिता: कालपाशा: प्रतिष्ठिता: । पावकाशनिसंकाशो मुदगरो मूर्तिमान् स्थित: ।।874।। दर्शनादेव य: प्राणान् प्राणिनामपि कर्षति ।
कि पुनः स्पृशमानस्य पात्यमानस्य वा पुनः: ।।875।। स ज्वाला परिवारस्तु निर्दहन्निव राक्षसम् ।
तेन स्पृष्टो बलवता महाप्रहरणो5स्फुरत् ।।876।। ततो विदुद्रुव: सर्वे तस्मात् त्रस्ता रणाजिरे ।
सुराश्च क्षुभिता: सर्वे दृष्टवा दण्डोद्यतं यमम् ।877।। तस्मिन् प्रहर्तुकामे तु यमे दण्डेन रावणम् |
यम॑ पितामह:ः साक्षाद् दर्शयित्वेवमब्रवीत् ।।878॥। वैवस्पत महाबाहो न खल्वमिताविक्रम् |
न हन्तव्यस्त्वयैतेन दण्डेनेष निशाचर: ।॥879।।
वर: खलु मयै तस्मै दत्तस्त्रिदशपड़व ।
स त्वया नानृतः कार्यो यन्मया व्याहृतं वच: ।।880।।
मेरी मृत्यु की दृष्टि पड़ते ही यह दुष्ट, पापी एवं दुर्लज दो घड़ी भी जीवित नहीं बच सकेगा। मैं अपने बल का बखान नहीं कर रहा बल्कि यह तो मेरी स्वाभाविक प्रकृति है। मृत्यु के इन वाक्यों को सुनकर धर्मराज बोले--हे मृत्यु! तुम ठहरो! मैं इसको अभी मार डालता हूं। इसके बाद यमराज ने क्रोधित हो अपनी आंखों को सुर्ख लाल करते हुए अमोघ कालदण्ड उठाया। उस अमोघ अस्त्र के पार्श्वभाग में काल पाश विराजमान थे। उस समय तेजस्वी मुद्गर अग्नि तुल्य मूर्तिमान बना हुआ था। कालदण्ड पर दृष्टि पड़ते ही वह प्राणियों के प्राण छीन लेता था। जिससे उसका छूना हो जाए अथवा जिसके ऊपर उसका प्रहार हो जाए, वह क्या परिणाम करवाएगा, उसका तो वर्णन करना व्यर्थ मात्र है।
ज्वालाओं से परिपूर्ण वह कालदण्ड राक्षसराज रावण को जलाकर भस्म करने के लिए तैयार था। अपने महान् तेज से युक्त वह कालदण्ड यमराज के हाथों में प्रकाशित हो उठा। युद्ध क्षेत्र में लड़ रहे सभी योद्धा उस अमोघ के उठते ही युद्ध क्षेत्र छोड़कर भाग खड़े हुए। कालदण्ड को यमराज द्वारा उठाया हुआ देखकर सभी देवतागण क्षुब्ध हो उठे। यमराज उस कालदण्ड का प्रहार रावण पर करना ही चाहते थे, उसी समय ब्रह्माजी प्रकट हो गए। यमराज को दर्शन देते हुए ब्रह्माजी इस प्रकार बोले--हे अमित पराक्रमी महाबाहो वैवस्त! तुम अपने हाथों से अमोघ कालदण्ड द्वारा राक्षस रावण का वध मत करो। हे देवश्रेष्ठ! मैंने इस रावण को देवताओं द्वारा न मारे जाने का वरदान दिया है। अतः मैंने जो वचन दिया है, तुम उसको निष्फल या असत्य मत <